शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः] रसादिशोधनमारणकल्पना 191 अन्य विधि काष्ठोदुम्बरिकादुग्धे रसं किञ्चिद् विमर्दयेत्।।३८।। तद्दुग्धघृष्टहिङ्गोश्च मूषायुग्मं प्रकल्पयेत्। क्षिप्त्वा तत्सम्पुटे सूतं तत्र मुद्रां प्रकल्पयेत्।।३९।। धृत्वा तं गोलकं प्राज्ञो मृन्मूषासम्पुटेऽधिके। पचेन्मृदुपोटेनैव सूतको याति भस्मताम्।।४०।। पारद को कठगूलर के दूध में मर्दन करें और कठगूलर के दूध में पिसी हुई हींग की दो मूषा बनायें। तत्पश्चात् इनमें उक्त पारद को रखकर मुद्रा कर दें और फिर इसे मिट्टी के मूषा सम्पुट में रखकर भली-भाँति सन्धिरोध कर दें। सूख जाने पर मृदुपुट में पुट दें। इस प्रकार पारद की भस्म हो जाती है। अन्य विधि नागवल्लीरसैर्घृष्टः कर्कोटीकन्दगर्भितः। मृन्मूषासम्पुटे पक्त्वा सूतो यात्येव भस्मताम्।।४१।। पारद को पान के रस में पीसें, जब गोली बन जाये तो खेखसा की जड़ के कल्क में रख दें, फिर इसे मिट्टी के सम्पुट में रखकर पुट दें। इस प्रकार पारद की भस्म हो जाती है। ज्वराङ्कुश रस खण्डितं मृगशृङ्गं च ज्वालामुख्या रसैः समम्। रुद्ध्वा भाण्डे पचेच्चुल्यां यामयुग्मं ततो नयेत्।।४३।। अष्टांशं त्रिकटुं दद्यान्निष्क्रमात्रं च भक्षयेत्। नागवल्लीरसैः सार्धं वातपित्तज्वरापहम्।।४३।। अयं ज्वराङ्कुशो नाम रसः सर्वज्वरापहः। ऐकाहिकं द्व्याहिकं च त्र्याहिकं वा न संशयः।।४४।। मृगशृंग (हरिण के सींग) के छोटे टुकड़ों को ज्वालामुखी (भिलावे) के रस के साथ भाण्ड (मिट्टी के बर्तन) में बन्द करके और चूल्हे पर चढ़ाकर दो पहर पर्यन्त पकायें, तत्पश्चात् स्वांगशीतल होने पर उसे पात्र में से निकालकर पीस लें। इसमें अष्टमांश त्रिकटु (सोंठ, मरिच, तथा पीपल) का चूर्ण मिलाकर रख लें, एक 'निष्फ' (चार मासा) परिमित औषधि लेकर पान के रस के साथ सेवन करें तो वातपित्त ज्वर को नष्ट करता है। इसका नाम 'ज्वरांकुश रस' । यह सब ज्वरों का विनाशक है। यह ऐकाहिक, द्व्याहिक (चातुर्थक विपर्यय) एवं तृतीयक ज्वर को नष्ट करता है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। वक्तव्य-मृगशृंग को उष्ण जल से धोकर तथा आरी से टुकड़े बनाकर ज्वालामुख्यादिक के सन्दिग्ध होने के कारण घीकुआर के रस में मिलाकर चूल्हे पर न पकाकर पुट द्वारा पाक कर दिया जाता है और भस्म बना ली जाती है। यदि एक पुट में मृदुभस्म न बने तो और पुटें दें देना भी उचित होता है। ज्वरारि रस पारदं रसकं तालं तुत्थं टङ्कणगन्धके। सर्वमेतत् समं शुद्धं कारवेल्लीरसैर्दिनम्।।४५।। मर्दयेल्लेपयेत् तेन ताम्रपात्रोदरं भिषक्। अङ्गुल्यर्धप्रमाणेने ततो रुद्ध्वा च तन्मुखम्।।४६।। पचेत् तं बालुकायन्त्रे क्षिप्त्वा धान्यानि तन्मुखे। यदा स्फुटन्ति धान्यानि तदा सिद्धं विनिर्दिशेत्।।४७।। ततो नयेत् स्वाङ्गशीतं ताम्रपात्रोदराद्भिषक्। रसं ज्वरारिनामानं विचूर्ण्य मरिचैः समम्।।४८।। माषैकं पर्णखण्डेन भक्षयेन्नाशयेज्ज्वरम्। त्रिदिनैर्विषमं तीव्रमेकद्वित्रिचतुर्थकम्।।४९।। शुद्ध हरिताल, शुद्ध तूतिया, शुद्ध टंकण (सोहागा) एवं शुद्ध गन्धक, इन सबको समान भाग लेकर करेले की पत्ती अथवा फल के रस के साथ एक दिन मर्दन करे और जब लेई-सी हो जाये तो इसका आधा अंगुल मोटा लेप ताम्रपात्र के उदर (भीतर) में कर दें और पात्र का मुख बन्द करके बालुकायन्त्र में पकायें (एक दूसरे पात्र में उक्त ताम्रपात्र को अधोमुख करके रख दें और ऊपर से बालु भर दें। यही बालुकायन्त्र है) बालु पर धान्य (जौ, चावल आदि) रख दें, जब धान्य स्फुटित हो जाये अर्थात् उसका लावा बन जाये तो समझ लें कि रस सिद्ध हो गया है। तत्पश्चात् स्वांगशीतल होने पर ताम्र पात्र के उदर में से औषध को निकाल लें और उसका चूर्ण बना लें। इसका नाम 'ज्वरारि रस' है। इसको समान भाग मरिच के साथ मिलाकर एक माशा औषध पान के पत्ते में रखकर खायें। यह तीन दिन में भीषण विषम ज्वर अर्थात् एकाहिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक ज्वर को नष्ट करता है। वक्तव्य-पारद और गन्धक की कज्जली पहले ही बना लेनी चाहिये। इसमें दी गयी मात्रा आज की दृष्टि से अधिक है। अतः वैद्य विचार कर मात्रा निर्धारित करें। शीतारि रस तालकं तुत्थकं ताम्रं रसं गन्धं मनःशिलाम्। कर्षं कर्षं प्रयोक्तव्यं मर्दयेत् त्रिफलाम्बुभिः।।५०।।