भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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198 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे


पीना चाहिये। पथ्य में दही-भात देना चाहिये और जलग्रोग कराना चाहिये। मधु के साथ रस का सेवन करने से कफ जनित रोग शान्त हो जाते हैं। जठराग्नि की वृद्धि के लिए मधु और अदरक के रस का अनुपान देना चाहिये और पथ्य में पर्याप्त घी तथा मांस का भक्षण करना चाहिये। इससे जठराग्नि बलवान् हो जाती है।

उन्मत्त रस

रसं गन्धकतुल्यांशं धत्तूरफलजद्रवैः। मर्दयेद् दिनमेकं तु तत्तुल्यं त्रिकटु क्षिपेत्॥ १३५॥ उन्मत्ताख्यो रसो नाम्ना नस्ये स्यात् सन्निपातजित्।

पारद और गन्धक को समान भाग में लेकर (कज्जली बनाकर) धतूरा के फल के रस से एक दिन तक मर्दन करें, तत्पश्चात् इसके समान भाग त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) का चूर्ण मिला दें। यह रस 'उन्मत्त' नाम से प्रसिद्ध है और नस्य देने से सन्निपात को जीतता है।

**वक्तव्य—**सन्निपात में आवश्यकतानुसार निम्नलिखित क्रियाएँ की जाती हैं। यथा—'लङ्घनं बालुकास्वेदो नस्यं निष्ठीवनं तथा। अवलेहोऽञ्जनं चैव प्राक् प्रयोज्यं त्रिदोषजे।।' अर्थात् सन्निपात ज्वर में सबसे पहले लंघन या उपवास, बालु द्वारा सफेद स्वेदन, किसी नस्य, निष्ठीवन या लार टपकाना, किसी अवलेह तथा अञ्जन का प्रयोग करना चाहिये।

सन्निपाताञ्जन

निस्त्वग्जैपालबीजं च दशनिष्कं विचूर्णयेत्॥ १३६॥ मरिचं पिप्पलीं सूतं प्रतिनिष्कं विमिश्रयेत्। भाव्यो जम्बीरजैर्द्रवैः सप्ताहं सम्प्रयत्नतः॥ १३७॥ रसोऽयमञ्जने दत्तः सन्निपातं विनाशयेत्।

छिला हुआ जमालघोटा का बीज दस निष्क (40 माशा) लेकर चूर्ण बनायें और मरिच, पीपल तथा रससिन्दूर प्रत्येक एक-एक निष्क (4-4 माशा) लेकर और पीसकर मिला दें। फिर नींबू के रस की सात भावनाएँ यत्नपूर्वक देनी चाहिये। यह अञ्जन आँख में लगाने से सन्निपात को नष्ट करता है।

**वक्तव्य—**सन्निपात से मूर्च्छित रोगी की आँख में उक्त औषध लगाने से मूर्च्छा दूर हो जाती है और चिकित्सा करने में सरलता हो जाती है।

नाराच रस

सूतं टङ्कणं तुल्यं मरिचं सूततुल्यकम्॥ १३८॥ गन्धकं पिप्पलीं शुण्ठीं द्वौ द्वौ भागौ विचूर्णयेत्। सर्वतुल्यं क्षिपेद् दन्तीबीजं निस्तुषितं भिषक्॥ १३९॥ द्विगुञ्जं रेचनं सिद्धं नाराचोऽयं महारसः। आध्मानं मलविष्टम्भानुदावर्तं च नाशयेत्॥ १४०॥

पारद तथा टंकण समान भाग और मरिच पारद के समान अर्थात् तीनों द्रव्य एक-एक भाग (1-1 तोला), गन्धक, पीपल तथा सोंठ प्रत्येक दो-दो भाग (2-2 तोला) और तुषरहित जमालघोटा का बीज सबके समान (9 तोला) लेकर एक साथ चूर्ण बनायें। इसकी दो रत्ती की मात्रा से भली-भाँति विरेचन हो जाता है। इस उत्तम रस का नाम 'नाराच रस' है। यह आध्मान (अफरा), मलविष्टम्भ (मल की रुकावट या कब्जियत) तथा उदावर्त्त को नष्ट करता है।

**वक्तव्य—**जमालघोटा छिला हुआ ही नही, अपितु शुद्ध किया हुआ प्रयोग करना चाहिये। शोधन-विधि इसी अध्याय के अन्त में दी गयी है।

इच्छाभेदी रस

दरदं टङ्कणं शुण्ठी पिप्पली चैककार्षिकाः। हेमाह्वा पलमात्रा स्याद् दन्तीबीजं च तत्समम्॥ १४१॥ विचूर्ण्यकत्र सर्वाणि गोदुग्धेनैव पाययेत्। त्रिगुञ्जं रेचनं दद्याद् विष्टम्भाध्मानरोगिषु॥ १४२॥

शुद्ध शिंगरफ, टंकण (भुना सुहागा), सोंठ तथा पीपल प्रत्येक एक-एक कर्ष (1-1 तोला), चोक (सत्यानाशी की जड़) एक पल (4 तोला) तथा शुद्ध जयपाल (जमालघोटा) भी चोक के समान भाग (4 तोला) में लेकर सबको एक साथ पीसकर चतुर्गुण (64 तोला) गाय के दुग्ध के साथ सिद्ध करें। जब पकते-पकते गाढ़ा हो जाये तो तीन-तीन रत्ती की गोलियाँ बना लें। एक गोली विरेचन के लिए विष्टम्भ (अँतड़ी को गति की रुकावट) तथा अफरा के रोगी को दें।

**वक्तव्य—**उक्त पाठ की व्याख्या श्रीआढमल्ल के अनुसार की गयी है, किन्तु ग्रन्थान्तर में 'साधयेत्' के स्थान पर 'पाययेत्' पाठ है। जिसका अर्थ होता है कि उक्त रस को गोदुग्ध के साथ पिलाना चाहिये। यही उचित भी प्रतीत होता है।

वसन्तकुसुमाकर रस

द्वौ भागौ हेमभूतेश्च गगनं चापि तत्समम्। लोहभस्म त्रिभागं च वङ्गाश्चत्वारो रसभस्मनः॥ १४३॥