शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना 199
वङ्गभस्म त्रिभागं स्यात् सर्वमेकत्र मर्दयेत् । प्रवालं मौक्तिकं चैव रससाम्येन दापयेत् ।। 144 ।। भावना गव्यदुग्धेन रसैर्घृष्टवाटकरूषकैः । हरिद्रावारिणा चैव मोचकन्दरसेन च ।। 145 ।। शतपत्ररसेनापि मालत्याः स्वरसेन च। पश्चान्मृगमदश्चन्द्रतुलसीरसभावितः ।। 146 ।। कुसुमाकर इत्येष वसन्तपदपूर्वकः । गुञ्जाद्वयं ददीतास्य मधुना सर्वमेहनुत् ।। 147 ।। सिताचन्दनसंयुक्तश्चाम्लपित्तादिरोगजित् । सुवर्णभस्म दो भाग (2 तोला), अभ्रकभस्म दो भाग (2 तोला) लोहभस्म तीन भाग (3 तोला), रससिन्दूर चार भाग (4 तोला), बंगभस्म तीन भाग (3 तोला), प्रवालभस्म (मूँगाभस्म) तथा मोतीभस्म (अथवा गुलाबजल में पिसा हुआ) चार-चार भाग (4-4 तोला) लेकर सबको एक साथ मर्दन करें और गोदुग्ध, अडूसा का पत्ती का रस, हल्दी का रस, सेमल की मुसली का रस, कमल अथवा गुलाब की पँखुड़ियों का रस तथा चमेली के फूलों का रस इन सबका पृथक्-पृथक् भावना दें। अन्त में कस्तूरी (2 तोला) तथा देशी कपूर (2 तोला) मिलाकर तुलसी के पत्तों के रस की भावना देकर 2-2 रत्ती की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लें। यह रस 'वसन्तकुसुमाकर' नाम से प्रसिद्ध है। दो रत्ती की मात्रा मधु के साथ देने से सब प्रकार के प्रमेहों को जीतता है और खाँड तथा चन्दन (घिसा हुआ) के साथ देने से अम्लपित्त आदि रोगों को जीतता है। वक्तव्य-इसमें मिलाने के लिए अभ्रक तथा लोह की भस्में शतपुटी अवश्य होनी चाहिये। इसकी मान्यता विलासी पुरुषों में बहुत अधिक है। मात्रा एक रत्ती ही पर्याप्त है।
राजमृगांक रस सूतभस्म त्रयो भागा भागैकं हेमभस्मकम् ।। 148 ।। मृतताम्रस्य भागैकं शिलागन्धकतालकम् । प्रतिभागद्वयं शुद्धमेकीकृत्य विचूर्णयेत् ।। 149 ।। वराटानू पूरयेत् तेन छागीक्षीरेण टङ्कणम्। पिष्ट्वा तेन मुखं रुद्ध्वा मृद्भाण्डे तन्निरोधयेत् ।। 150 ।। शुष्कं गजपुटे पक्त्वा चूर्णयेत् स्वाङ्गशीतलम् । रसो राजमृगाङ्कोऽयं चतुर्गुञ्जः क्षयापहः ।। 151 ।। दशपिप्पलिकामौद्रैरेकोनत्रिंशदूषणैः । सघृतं दापयेत् पथ्यं स्त्रीकोपाग्निश्रमाँस्त्यजेत् ।। 152 ।। पथ्यं वा लघुमांसादि CC-0. Rajendra Sharma Academy, रससिन्दूर तीन भाग (3 तोला), सुवर्णभस्म एक भाग (1 तोला), ताम्रभस्म एक भाग (1 तोला), शुद्ध मैनसिल, शुद्ध गन्धक तथा शुद्ध हरिताल प्रत्येक दो-दो भाग (2-2 तोला) लेकर एक साथ खरल में डालकर चूर्ण करें और इस चूर्ण से कौड़ियाँ भर दें, तत्पश्चात् बकरी के दूध में पिसे हुये टंकण से कौड़ियों का मुख बन्द कर दें, फिर मिट्टी के पात्र में भरकर कपड़मिट्टी कर दें। सूखने पर गजपुट दें। स्वांगशीतल हो जाने पर पीसकर रख लें। इस रस का नाम 'राजमृगाङ्क' है। चार रत्ती की मात्रा से क्षय को नष्ट करता है। अनुपान में दस पीपल, मधु तथा उनतीस कालीमिरच देनी चाहिये। पथ्य में पर्याप्त घी देना चाहिये। मैथुन, क्रोध, अग्निसेवन (तापना) तथा परिश्रम का त्याग करना चाहिये। राजयक्ष्मा की शान्ति के लिए रोगी को हल्के (बकरा आदि के) मांसों का पथ्य देना चाहिये।
स्वयमग्नि रस शुद्धं सूतं द्विधा गन्धं कुर्यात् खल्वेन कज्जलीम् ।। 153 ।। तयोः समं तीक्ष्णचूर्णं मर्दयेत् कन्यकाद्रवैः । द्वियामान्ते कृतं गोलं ताम्रपात्रे विनिक्षिपेत् ।। 154 ।। आच्छाद्यैरण्डपत्रेण यामार्धेऽत्युष्णता भवेत् । धान्यराशौ न्यसेत्पश्चादहोरात्रात् समुद्धरेत् ।। 155 ।। सञ्चूर्ण्य गालयेद्वस्त्रे सत्यं वारितरं भवेत् । (भावयेत् कन्यकाद्रावैः सप्तधा भृङ्गजैस्तथा ।। 156 ।। काकमाचीकुरण्टोत्थद्रवैर्मुण्ड्याः पुनर्नवैः । सहदेव्यामृतानीलिनीर्गुण्डीचित्रजैस्तथा ।। 157 ।। सप्तधा तु पृथग्द्रावैर्भाव्यं शोष्यं तथातपे । सिद्धयोगो ह्ययं ख्यातः सिद्धानां च मुखागतः ।। 158 ।। अनुभूतो मया सत्यं सर्वरोगगणापहः । स्वर्णादीन् मारयेदेवं चूर्णीकृत्य तु लोहवत् ।। 159 ।।) त्रिफलामधुसंयुक्तः सर्वरोगेषु योजयेत् । त्रिकटुत्रिफलैलाभिर्जातीफललवङ्गकैः ।। 160 ।। नवभागोन्मितैरेतैः समः पूर्वरसो भवेत् । सञ्चूर्ण्य लोडयेत् क्षौद्रैर्भक्ष्यं निष्कद्वयं द्वयम् ।। 161 ।। स्वयमग्निरसो नाम्ना क्षयकासनिकृन्तनः । शुद्ध पारद एक भाग (4 तोला) और शुद्ध गन्धक दो भाग (8 तोला) दोनों को खरल में डालकर कज्जली बनायें। तत्पश्चात् दोनों के समान भाग (12 तोला) तीक्ष्ण लोह (फौलाद) का सूक्ष्म चूर्ण मिलाकर घीकुआर के रस के साथ मर्दन करें, दो पहर के अनन्तर गोला बनाकर ताम्र पात्र में Jammu. Digitized by eGangotri