भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

षष्ठोऽध्यायः

निरूहणवस्तिविधिः


[वाम स्तम्भ / Left Column]

निरूहण-वस्ति-परिचय निरूहवस्तिर्बहुधा भिद्यते कारणान्तरैः। तैरेव तस्य नामानि कृतानि मुनिपुङ्गवैः॥ 1 ॥ निरूहस्यापरं नाम प्रोक्तमास्थापनं बुधैः। स्वस्थानस्थापनाद्दोषाधातूनां स्थापनं मतम्॥ 2 ॥

कारण-भेद से निरूहवस्ति कई प्रकार का मानी जाती है और उन्हीं कारणों से आचार्यों ने उसके अनेक नाम भी रख दिये हैं। निरूहण का दूसरा नाम 'आस्थापन' है और इसका यह नाम दोष तथा धातुओं को अपने-अपने स्थान पर स्थापित कर देने के कारण रखा गया है।

वक्तव्य— व्यवहार के लिए अथवा उनकी विशेषताओं को सूचित करने के लिए एक वस्तु के अनेक नाम रख दिये जाते हैं, तदनुसार निरूहणवस्ति के भी विविध नाम निश्चित किये गये हैं। यथा—दोषहर, संशमन, शोधन, लेखन तथा पिच्छिलवस्ति।

निरूहण-वस्ति की मात्रा निरूहस्य प्रमाणं च प्रस्थं पादोत्तरं परम्। मध्यमं प्रस्थमुद्दिष्टं हीनं च कुडवास्त्रयः॥ 3 ॥

निरूहणवस्ति का उत्तम परिमाण सवा प्रस्थ (1 सेर), मध्यम एक प्रस्थ (64 तोला) तथा हीन परिमाण तीन कुड़व (48 तोला) कहा गया है।

वक्तव्य— यह उस द्रव्य का परिमाण या तौल है, जो उक्त वस्ति द्वारा गुद के भीतर पहुँचाया जाता है।

निरूहण के अयोग्य रोगी अतिस्निग्धोत्क्लिष्टदोषौ क्षतोरस्कः कृशस्तथा। आध्मानच्छर्दिहिक्कार्शःकासश्वासप्रपीडितः॥ 4 ॥ गुदशोफातिसारार्तो विषूचीकुष्ठसंयुतः। गर्भिणी मधुमेही च नास्थाप्यश्च जलोदरी॥ 5 ॥


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

जिसका शरीर अत्यन्त स्निग्ध है, जिसके दोष उत्क्लिष्ट (वमन द्वारा निकलने को) हों, जिसके उरःक्षत हों, जो कृश हों, जो आध्मान (अफरा), छर्दि (उलटी या कै), हिचकी, बवासीर, कास तथा श्वास से पीड़ित हो, जो गुद, शोथ तथा अतिसार से पीड़ित हो, जो विसूची (हैजा) तथा कुष्ठ से युक्त हो, गर्भवती (सात मास तक का गर्भ हो), मधुमेह का रोगी और जलोदर वाला रोगी, इनको आस्थापन या निरूहण वस्ति देना उचित नहीं है।

वक्तव्य— देखें—सुश्रुतसंहिता चि० अ० 35।

निरूहण-वस्ति के योग्य रोगी वातव्याधावुदावर्ते वातासृग्विषमज्वरे। मूर्च्छावृष्णोदरानहमूत्रकृच्छ्राश्मरीषु च॥ 6 ॥ वृद्धासृग्दरमन्दाग्निप्रमेहेषु निरूहणम्। शूलेऽम्लपित्ते हृद्रोगे योजयेद् विधिवद् बुधः॥ 7 ॥

वातव्याधि, उदावर्त, वातरक्त, विषमज्वर, मूर्च्छा, तृष्णा, उदररोग, अनाह, मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, बढ़े हुये रक्तप्रदर, मन्दाग्नि, प्रमेह, शूल, अम्लपित्त तथा हृदयरोगों में विधिपूर्वक निरूहणवस्ति का प्रयोग करना चाहिये।

वक्तव्य— निरूहणवस्ति देने का प्रकार भी वही है, जो पिछले अध्याय में अनुवासनवस्ति देने का निर्दिष्ट है।

निरूहण की विधि उत्सृष्टानिलविण्मूत्रं स्निग्धस्विन्नमभोजितम्। मध्याह्ने गृहमध्ये च यथायोग्यं निरूहयेत्॥ 8 ॥ स्नेहवस्तिविधानेन बुधः कुर्यान्निरूहणम्। जाते निरूहे च ततो भवेदुकटकासनः॥ 9 ॥ तिष्ठेन्मुहूर्तमात्रं तु निरूहागमनेच्छया। अनायातं मुहूर्तं तु निरूहं शोधनैर्हरेत्॥ 10 ॥ निरूहैरेव मतिमान् क्षारमूत्राम्लसैन्धवैः।