भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 356 में से

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पृष्ठ 274

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[पृष्ठ शीर्ष] 238 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे


[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]

पहले आवश्यकतानुसार स्नेहन-स्वेदन कराकर और अपानवायु, पुरीष तथा मूत्र का परित्याग कराकर तथा भोजन न कराकर रोगी को दोपहर वस्ति के समय पर घर (एकान्त) में निरूहणवस्ति देना उचित है। अनुवासनवस्ति के समान ही निरूहणवस्ति का प्रयोग किया जाता है। निरूहणवस्ति का प्रयोग हो जाने पर उत्कटक आसन (जैसे शौच करते समय बैठा जाता है) से बैठ जाना उचित है और निरूहणवस्ति द्वारा किये हुये द्रव्य के निकलने की प्रतीक्षा करते हुये (इच्छाशक्ति का प्रभाव डालता हुआ) दो घड़ी तक बैठा रहे, यदि दो घड़ी में निरूहण द्रव न निकले तो विद्वान् चिकित्सक उस (निरूहण) को क्षार, मूत्र, अम्ल (काँजी आदि) तथा सेंधा नमक के घोल से बने हुये शोधन निरूहों का प्रयोग करके निकाल दें। **निरूहण के उपद्रव—**विकृत वायु द्वारा अवरुद्ध अतएव अधिक समय तक रुका हुआ निरूहण द्रव उदर में शूल, बेचैनी, ज्वर, आनाह तथा मृत्यु को उत्पन्न कर सकता है। **सावधानी—**भोजन के पश्चात् तत्काल निरूहण का प्रयोग करना उचित नहीं है, क्योंकि इससे विसूची, छर्दि अथवा वात आदि दोषों का प्रकोप हो सकता है। अतः भोजन किये बिना ही निरूहण का प्रयोग करें, यह निश्चित मत है। रोगी तथा रोग आदि की सभी अवस्थाओं (दशाओं) में निरूहण किया जा सकता है, क्योंकि मल निकल जाने पर दोषों का बल क्रमशः घट जाता। सुनिरूढ के लक्षण यस्य क्रमेण गच्छन्ति विट्पित्तकफवायवः ।। ११ ।। लाघवं चोपजायेत सुनिरूढं तमादिशेत्। जिस रोगी के पुरीष, पित्त, कफ तथा वायु क्रमशः निकल जायें और शरीर में हल्कापन उत्पन्न हो जायें, उसको 'सुनिरूढ' (अर्थात् उसको उत्तम प्रकार से निरूहणवस्ति का लाभ प्राप्त हो चुका है) समझना चाहिये। दुर्निरूढ के लक्षण यस्य स्याद् वस्तिरल्पाल्यवेगो हीनमलानिलः ।। १२ ।। मूर्च्छार्त्तिजाड्यारुचिमान् दुर्निरूढं तमादिशेत्। जिसका वस्ति द्वारा दिया हुआ द्रव बहुत थोड़ा-थोड़ा निकले, उसके साथ मल तथा वायु भी बहुत थोड़ी निकले और रोगी को मूर्च्छा, पीड़ा, सुस्ती तथा अरुचि हो जाये तो उसको 'दुर्निरूढ' समझना चाहिये।


[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]

**अतिनिरूढ के लक्षण—**विरेचन का अतियोग होने पर जो लक्षण इसी (शा०सं०, उ०खं०अ० ५) में कहे गये हैं, वे सब लक्षण निरूहणवस्ति का अतियोग होने पर भी होते हैं। **आस्थापन तथा निरूहण का प्रयोग—**भली भाँति ज्ञान (मूर्च्छादि का दूर होना), मन की प्रसन्नता, शरीर का स्निग्ध होना, रोगों का नाश, ये सब आस्थापन (निरूहण) तथा अनुवासन-वस्ति के समुचित प्रयोग का लक्षण है। दोषभेद से वस्ति-विधान—सस्नेह एकः पवने पित्ते द्वौ पयसा सह। कषायकटुरूक्षाद्याः कफे कोष्णास्त्रयो हिताः'।। वायु की प्रधानता में स्नेहमिश्रित एक वस्ति पित्त की प्रधानता में दुग्धमिश्रित दो वस्तियाँ और कफ की प्रधानता में कषायरस युक्त त्रिफला आदि कटुरस युक्त क्षार आदि तथा रूक्ष द्रव्यों से मिश्रित कुछ गर्म-गर्म तीन वस्तियाँ लाभदायक होती हैं। **दोष-भेद से भोजन-व्यवस्था—**इसके पश्चात् सुनिरूढ प्राणी को स्नान कराकर पित्त, कफ तथा वायु से पीड़ित प्राणी को क्रमशः दूध, यूष तथा मांस रस के साथ उचित भोजन खिलाये अथवा सभी को विकाररहित जाङ्गल (हरिण आदि) प्राणियों के मांभरस के साथ भोजन खिलाये और दोष तथा जठराग्नि का विचार कर भोजन की मात्रा त्रिभागहीन (सेर भर खाने वाले को एक पाव), आधा (सेर भर खाने वाले को आधा सेर) और हीन मात्रा (सेर भर खाने वाले को तीन पाव) होनी चाहिये तथा इसके पश्चात् उसी दिन यथायोग्य स्नेहवस्ति का प्रयोग भी करना चाहिये। **विशेष वक्तव्य—**जिस दिन निरूहणवस्ति दी जाती है, उस दिन वातदोष का अधिक भय रहता है। इस कारण उस दिन खाने के लिए मांभरस तथा भात देना उचित है और अनुवासन वस्ति का प्रयोग भी अत्यावश्यक है। फिर जठराग्नि के बल तथा वायु की गति का विचार कर भोजन द्वारा जठराग्नि के बलवान् हो जाने पर आवश्यकतानुसार स्नेह-वस्ति का प्रयोग करना चाहिये। एकाधिक वस्तियों का विधान अनेन विधिना युञ्ज्यान्निरूहं वस्तिदानवित् ।। १३ ।। द्वितीयं वा तृतीयं वा चतुर्थं वा यथोचितम्। वस्ति देने में कुशल चिकित्सक इसी विधि से आवश्यकतानुसार दूसरी तीसरी अथवा चौथी निरूहणवस्ति का प्रयोग कर सकता है। **वक्तव्य—**जिस प्रकार आवश्यकतानुसार एक से अधिक

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