भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

274 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे

[वाम स्तम्भ]

रक्तस्राव की विधियाँ

एषु रोगेषु शृङ्गैर्वा जलौकालाम्बुकैरपि। अथवाऽपि शिरामोक्षैः कुर्याद् रक्तस्रुतिं नरः।। 18 ।। उक्त रोगों में शृंग (सिंगी) से, जलौका (जोंक) से, अलाबु (तुम्बी या गिलास) से अथवा सिरावेध से रक्तस्राव करें।

किनका रक्त नहीं निकालना चाहिये

न कुर्वीत सिरामोक्षं कृशस्यातिव्यवायिनः। क्लीबस्य भीरोर्गर्भिण्याः सूतिकापाण्डुरोगिणाम् ।। 19 ।। पञ्चकर्मविशुद्धस्य पीतस्नेहस्य चार्शसाम्। सर्वाङ्गशोथयुक्तानामुदरश्वासकासिनाम् ।। 20 ।। छर्द्यतीसारदुष्टानामतिस्विन्नतनोरपि । ऊनषोडशवर्षस्य गतसप्ततिकस्य च ।। 21 ।। आघातस्रुतरक्तस्य शिरामोक्षो न शस्यते। एषां चात्यायिके रोगे जलौकाभिस्तु निर्हरेत् ।। 22 ।। तथा च विषदुष्टानां शिरामोक्षोऽपि शस्यते। निम्नलिखित व्यक्तियों का शिरावेध (शिरामोक्ष) नहीं करना चाहिये-कृश, अतिमैथुनशील, नपुंसक, भीरु (डरपोक), गर्भवती, प्रसूता, पाण्डुरोगी जो पञ्चकर्म (वमन, विरेचन, नस्य, निरूहण, अनुवासन) से शुद्ध हो चुका है जिसने स्नेहपान किया है, जो अर्शारोग, सर्वाङ्गशोथ, उदररोग, श्वास, कास, कै एवं अतिसार से पीड़ित हो, जिसको अत्यन्त स्वेदन हो चुका हो, जिसकी अवस्था सोलह से कम और सत्तर से अधिक हो और जिसका चोट लगने के कारण रक्त निकल गया हो। यदि इन रोगियों का रक्त निकालना अत्यन्त आवश्यक हो तो इनका रक्त जोंक से निकालना चाहिये और यदि ये लोग विष से पीड़ित हों तो ‘सिरावेध’ भी प्रशस्त है। **वक्तव्य—**जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि उक्त व्यक्तियों का ‘सिरावेध’ करना उचित नहीं है, तथापि विशेष परिस्थत में इनका भी जोंक द्वारा रक्त निकाला जा सकता है और विष-विकारों में तो सिरामोक्ष भी किया जा सकता है।

रक्तस्रावण यन्त्र

गोशृङ्गेण जलौकाभिरलाबुभिरपि त्रिधा ।। 23 ।। वातपित्तकफैर्दुष्टं शोणितं स्रावयेद् बुधः। द्विदोषाभ्यां तु सन्दुष्टं त्रिदोषैरपि दूषितम् ।। 24 ।। शोणितं स्रावयेद् युक्त्या शिरामोक्षैः पदैस्तथा। विद्वान् चिकित्सक वायु से दूषित रक्त को गोशृंग (सिंगी)...

[दक्षिण स्तम्भ]

...से, पित्त से दूषित रक्त को जोंक से तथा कफ से दूषित रक्त को अलाबु (तुम्बी) से निकालें और द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रोगियों का युक्तिपूर्वक सिरामोक्ष अथवा पद (पच्छ) से रक्तस्राव करें।

शृंग आदि द्वारा रक्तस्रावण

गृह्णाति शोणितं शृङ्गं दशाङ्गुलमितं बलात् ।। 25 ।। जलौका हस्तमात्रं तु तुम्बी च द्वादशाङ्गुलम्। पदमङ्गुलमात्रस्य शिरा सर्वाङ्गशोधिनी ।। 26 ।। शृंग (सिंगी) दस अंगुल तक के रक्त को, जोंक एक हाथ (24 अंगुल) तक के रक्त को, तुम्बी बारह अंगुल तक के रक्त को तथा पद (पच्छ) एक अंगुल तक के रक्त को निकाल देता है और सिरावेध सम्पूर्ण शरीर को शुद्ध कर देता है अर्थात् सम्पूर्ण शरीर के अशुद्ध रक्त को निकाल देता है। **वक्तव्य—**रक्तस्राव के सिंगी, जोंक, तुम्बी आदि साधनों द्वारा शरीर के उन-उन अवयवों से जो रक्तविकार से पीड़ित हैं रक्त निकलवाना चाहिये और सम्पूर्ण शरीरगत रक्तविकार ये सिरावेध कराना आवश्यक है। शरीर के भीतरी अवयवों (हृदय, मस्तिष्क आदि) जिनमें उक्त साधन प्रयुक्त नहीं किये जा सकते हैं, उनमें सिरावेध का ही प्रयोग करना चाहिये।

रक्तस्राव के अयोग्य काल एवं रोगी

शीते निरन्ने मूर्च्छायां तन्द्राभीतिमदश्रमौः। युतानां न स्रवेद् रक्तं तथा विण्मूत्रसङ्गिनाम् ।। 27 ।। शीतकाल में, भोजन न करने पर अर्थात् भूखे मनुष्य का, मूर्च्छा में और तन्द्रा, भय, मद तथा श्रम (थकावट) से युक्त मनुष्यों का, पुरीष तथा मूत्र के निरोध से पीड़ित मनुष्यों का रक्त उचित रूप से नहीं निकलता है।

रक्तस्रावकारक उपाय

अप्रवर्तितरक्ते च कुष्ठत्रिकटुसैन्धवैः। मर्दयेद् व्रणवक्त्रं च तेन सम्यक् प्रवर्तते ।। 28 ।। यदि उचित रूप से रक्तस्राव न हो तो व्रण (घाव जो कि रक्तस्राव कराने के लिए किया गया है) के मुख को कूठ, त्रिकटु एवं सेंधा नमक के चूर्ण से मर्दन करें। ऐसा करने से रक्त भली-भाँति निकलने लगता है।

रक्तस्राव का समय

तस्मान्न शीते नात्युष्णे न स्विन्ने नातितापिते। पीत्वा यवागूं तृप्तस्य स्रावयेच्छोणितं बुधः।। 29 ।। इसलिए न शीतकाल, न अत्यन्त उष्णकाल, न स्वेदन...