भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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द्वादशोऽध्यायः] शोणितस्रावविधिः 275

होने पर और न ही शरीर के अत्यन्त सन्तप्त होने पर रक्तस्राव कराना उचित है। इससे विपरीत दशा में भी 'यवागू' पिलाकर रक्तस्राव कराना चाहिये। रक्तातिस्राव-परिहार अतिस्विन्नस्योष्णकाले तथैवातिशिराव्यधात्। अतिप्रवर्तते रक्तं तत्र कुर्यात् प्रतिक्रियाम्।।३०।। अत्यन्त स्वेदन होने पर तथा उष्णकाल में तथा सिरा के अधिक कट जाने से रक्त अधिक निकलने लगता है। ऐसी स्थिति में निम्नलिखित प्रतिकार (उपाय) करना चाहिये। रक्त की अतिप्रवृत्ति में चिकित्सा अतिप्रवृत्ते रक्ते च लोध्रसर्जरसाञ्जनैः। यवगोधूमचूर्णैर्वा धवधन्वन्गैरिकैः।।३१।। सर्पनिर्मोकचूर्णैर्वा भस्मना क्षौमवस्त्रयोः। मुखं व्रणस्य बध्वा च शीतैश्चोपचरेद् व्रणम्।।३२।। विध्येदूर्ध्वं शिरां तां च दहेत् क्षारेण वाग्निना। रक्त की अतिप्रवृत्ति होने पर लोध, राल और रसवत के चूर्ण से अथवा जौ, तथा गेहूँ के चूर्ण से अथवा धाय के फल, धामिन तथा गेरू के चूर्ण से अथवा साँप की केंचुली के चूर्ण से अथवा रेशमी तथा सूती वस्त्र की भस्म से व्रण के मुख को अवचूर्णित करें अर्थात् उक्त चूर्णों की व्रण पर बुरक दें अथवा व्रण पर कपड़े की गद्दी रखकर बाँध दें अथवा शीतद्रव्यों (शीतल जल तथा बर्फ आदि) से उपचार करें अथवा (इतने पर भी रक्त न रुके तो) उसी। को थोड़ी दूर ऊपर से वेध दे अथवा क्षार से या अग्नि से सिरा का दाह कर दें। रक्त्तरोधन के उपाय व्रणं कषायः सन्धत्ते रक्तं स्कन्दयते हिमम्।।३३।। व्रणास्यं पाचयेत् क्षारो दाहः सङ्कोचयेच्छिराम्। कषायरस (युक्त द्रव्य) व्रण का सन्धान (घाव को बन्द) कर देता है, शीत द्रव्य रक्त को जमा देता है, क्षार व्रण के मुख को पका देता है और दाह शिरा को संकुचित कर देता है। इन क्रियाओं से रक्त रुक जाता है। अग्निदाह-विधि वामाण्डशोथे दक्षस्य करस्याङ्गुष्ठमूलजाम्।।३४।। देहेच्छिरां व्यत्यये तु वामाङ्गुष्ठशिरां दहेत्। शिरादाहप्रभावेण मुष्कशोथः प्रणश्यति।।३५।। विषूच्यां पार्ष्णिदाहेन जायतेऽग्नेः प्रदीपनम्। सङ्कुचन्ति यतस्तेन रसश्लेष्मबहाः शिराः।।३६।।


यदा वृद्धिर्यकृत्प्लीह्नोः शिशोः सञ्जायतेऽसृजः। तदा तत्स्थानदाहेन सङ्कुचन्त्यसृजः शिराः।।३७।। अण्डवृद्धि वाले रोगी के यदि बायें अण्डकोश में सूजन हो तो दाहिने हाथ के अँगूठे के मूल की शिरा पर और यदि दाहिने अण्डकोश में सूजन हो तो बायें अँगूठे के मूल की शिरा पर दाहकर्म करें। सिरादाह के प्रभाव से शीघ्र ही अण्डकोश का शोथ नष्ट हो जाता है। विसूची (हैजा) में पार्ष्णि (एड़ी) में दाहकर्म करने से अग्नि दीप्त हो जाती है, क्योंकि इससे रस तथा कफ के वहने वाली सिरायें संकुचित हो जाती हैं। जब किसी बालक के यकृत् तथा प्लीहा रक्त के दोष से बढ़ जाते हैं तो उस स्थान (यकृत् तथा प्लीहा) पर दाहकर्म करने से रक्तवाही सिरा सकुचित हो जाती है। जिसके कारण यकृत् और प्लीहा भी संकुचित होकर अपने वास्तविक रूप को धारण कर लेते हैं। वक्तव्य-आजकल बड़े-बड़े नगरों में चिकित्सा करने वाले पढे-लिखे चिकित्सक भी दाह कर्म को नहीं कर रहे हैं। उन्हें चाहिये कि चिकित्साशास्त्र के इस महत्त्वपूर्ण एवं सुप्रसिद्ध कर्म को पुनः प्रारम्भ कर आयुर्वेद की इस देन का यथासम्भव प्रचार करें। हर्ष का विषय है कि देहातों में रहने वाले परम्परागत ग्रामीण वैद्य इस दाहकर्म को आज भी सफलतापूर्वक करते हैं। इस अग्निकर्म को 'गुल लगाना' भी कहते हैं। इसमें लोहे की सलाई अथवा ताँबे के पैसे अथवा सोने की सलाई को तपाकर उचित स्थान पर लगा देते हैं, जिससे फफोला उठता है और दो-तीन दिन में फूट कर निकल जाता है और रोग शान्त हो जाता है। किन्तु इसके लिए यथाविधि कर्माभ्यास अवश्य प्राप्त कर लेना चाहिये। देखें-सु० सू० अ० 12। अधिक रक्तस्राव का निषेध रक्ते दुष्टेऽवशिष्टेऽपि व्याधिर्नैव प्रकुप्यति। अतः स्राव्यं सावशेषं रक्तं नातिक्रमो हितः।।३८।। आन्ध्यमाक्षेपकं तृष्णां तिमिरं शिरसो रुजम्। पक्षाघातं श्वासकासौ हिक्कां दाहं च पाण्डुताम्।।३९।। कुरुतेऽतिस्रुतं रक्तं मरणं वा करोति च। दूषित रक्त के कुछ अवशिष्ट रह जाने पर भी व्याधि का प्रकोप (वृद्धि) नहीं होता है, इसलिये सावशेष (कुछ शेष रखकर) रक्तस्राव कराना उचित होता है, क्योंकि रक्तस्राव विधि में अतिक्रम (अतियोग) हितकर नहीं होता। रक्त के