भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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[header] 276 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे [/header]

[बायाँ स्तम्भ]

अधिक निकल जाने से अन्धापन, आक्षेपक, तृष्णा, तिमिर (धुन्ध), शिरोरोग, पक्षावात, श्वास कास, हिक्का, दाह एवं पाण्डुरोग उत्पन्न हो सकता है अथवा मृत्यु भी हो जाती है। वक्तव्य- रक्त को निकालते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि वह मात्रा से अधिक न निकले। यदि थोड़ा शेष भी रह जाता है, तो वह बाद में संशमन-क्रिया द्वारा शुद्ध कर लिया जा सकता है। उसके अधिक निकल जाने पर उक्त रोगों के होने की सम्भावना रहती है तथा मृत्यु भी हो सकती है। रक्त का महत्त्व देहस्योत्पत्तिरसृजा देहस्तेनैव धार्यते।।40।। विना तेन व्रजेज्जीवो रक्षेद् रक्तमतो बुधः। रक्त से ही शरीर की उत्पत्ति होती है। रक्त से ही शरीर का धारण तथा पोषण होता है। रक्त के बिना जीव भी चला जाता है। इसलिये रक्त की रक्षा अवश्य करनी चाहिये। वक्तव्य- महर्षि सुश्रुत ने तो रक्त को स्पष्ट शब्दों में 'जीव' कहा है। यथा-रक्तं जीव इति स्थितिः'। देखें-सु० सू० अ० 14। रक्तस्रावजनित दोष का प्रतिकार शीतोपचारैः कुपिते स्रुतरक्तस्य मारुते।।41।। कोष्णेन सर्पिषा शोथं सव्यथं परिषेचयेत्। क्षीणस्यैणशशोरभ्रहरिणच्छागमांसजः ।।42।। रसः समुचितः पाने क्षीरं वा षष्ठिका हिताः। रक्त निकलने पर शीतक्रिया करने से वायु कुपित हो जाता है, जिससे सिरावेध के व्रण में शोथ तथा पीड़ा उत्पन्न हो जाती है। इस दशा में व्रण पर गुनगुने घृत का सेचन करना चाहिये, इससे पीड़ा शान्त हो जाती है। क्षीण मनुष्य को काला हरिण, खरगोश, उरभ्र (भेड़ा) हीरण तथा बकरे के मांस का रस पीने के लिए देना चाहिये। अथवा इसमें दूध तथा साठी के चावल भी लाभदायक होते हैं। रक्तस्राव का फल पीडाशान्तिर्लघुत्वं च व्याधेरुद्रेकसङ्क्षयः।।43।। मनःस्वास्थ्यं भवेच्चिह्नं सम्यग्विस्त्रावितेऽसृजि। उचित रूप से रक्तस्राव हो जाने पर पीड़ा की शान्ति शरीर में लघुता, व्याधि के उद्रेक (वृद्धि या दौरा) का क्षय और मन को स्वस्थता (उन्माद आदि मानसिक रोगों की शान्ति) ये लक्षण होते हैं।


[दायाँ स्तम्भ]

[R1] रक्तमोक्षण में अपथ्य [R2] व्यायाममैथुनक्रोधशीतस्नानप्रवातकान् ।।44।। [R3] एकाशनं दिवास्वप्नं क्षाराम्लकटुभोजनम्। [R4] शोकं वादमजीर्णं च त्यजेदाबलदर्शनात् ।।45।। [R5] इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां [R6] शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे शोणितस्त्रावविधिर्नाम [R7] द्वादशोऽध्यायः।।12।। [R8] रक्तस्राव के पश्चात् जब तक स्वाभाविक बल उत्पन्न न [R9] हो जाये तब तक व्यायाम, मैथुन, क्रोध, शितिल जल से [R10] स्नान, प्रवात, एक समय का भोजन (दिनभर में केवल दो [R11] समय खाना चाहिये), ये दिवास्वप्न (दिन में सोना) क्षार, [R12] अम्ल तथा कटु पदार्थों का सेवन, शोक, वाद (अधिक [R13] बोलना) तथा अजीर्ण का परित्याग करना चाहिये। [R14] वक्तव्य- सिरावेध का विशद वर्णन सु०शा०अ० 8 में [R15] किया गया है। उनमें से कतिपय बातें यहाँ कही जा रही हैं। [R16] रक्तस्राव की सभी क्रियाओं को उन लोगों के सम्पर्क में [R17] रहकर सीखना चाहिये जो इन क्रियाओं को सदैव किया करते [R18] हैं। यथा-सिंगी या तुम्बी का प्रयोग प्रायः नीच जाति के लोग [R19] सफलतापूर्वक करते हैं। सिरावेध में यूनानी-पद्धति के [R20] चिकित्सक तथा प्रच्छन (पच्छ) लगाने में भारतीय नाई अधिक [R21] कुशल देखे जाते हैं। सिंगी लगाने वाले गाय के सींग को [R22] भीतर से साफ करके उसके शिर में एक छोटा-सा छिद्र बना [R23] लेते हैं। इसको उचित स्थान पर रखकर मुख से चूसते हैं, [R24] और तत्काल उस छिद्र को मकड़ी के जाला से बन्द कर उसे [R25] 15-20 मिनट लगा रहने देते हैं, फिर हटा लेते हैं। इसी प्रकार [R26] रुग्ण स्थान पर सिंगियों का प्रयोग किया जाता है। इसको [R27] कच्ची सिंगी कहा जाता है। इस सिंगी से उक्त स्थान की [R28] दूषित वायु खींच ली जाती हैं, जिससे वातजनित पीड़ा शान्त [R29] हो जाती है। एक पक्की सिंगी होती है, इसमें पहले कच्ची [R30] सिंगी लगाकर उस स्थान की वायु खींचकर फिर उस स्थान [R31] पर उस्तरा से पच्छ लगा (छील) कर इस सिंगी द्वारा रक्त [R32] निकाल लिया जाता है। [R33] तुम्बी प्रयोग विधि- पीड़ा युक्त स्थान पर दीपक रख [R34] कर और उसके ऊपर तुम्बी अथवा गिलास आदि का मुख [R35] नीचे की ओर करके उसे गरम किया जाता है। जब पर्याप्त [R36] गरम हो जाता है तो उसे हटा देते हैं। इस विधि से भी वेदना [R37] का शमन तथा रक्तनिर्हरण किया जाता है।