भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 356 में से

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पृष्ठ 314

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त्रयोदशोऽध्यायः

नेत्रप्रसादनविधिः


[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]

नेत्ररोगनाशक उपचार सेक आश्च्योतनं पिण्डी बिडालस्तर्पणं तथा। पुटपाकोऽञ्जनं चैभिः कल्पैर्नेत्रमुपाचरेत् ।।1।। निम्नलिखित सात कल्पों (विधियों) से नेत्ररोगों का उपचार (चिकित्सा) करना चाहिये-1. सेक, 2. आश्च्योतन, 3. पिण्डी, 4. विडाल, 5. तर्पण, 6. पुटपाक तथा 7. अञ्जन। वक्तव्य—रक्तमोक्षण, विधि का वर्णन करने के पश्चात् अब हम नेत्ररोगों की चिकित्सा की विविध विधियों. का वर्णन करेंगे। ऊपर कहे गये सात कल्पों का परिचय भी आगे दिया जायेगा। सेचन-विधि सेकस्तु सूक्ष्मधाराभिः सर्वस्मिन्नयने हितः। मीलिताक्षस्य मर्त्यस्य प्रदेयश्चतुरङ्गुलात्।।2।। स चापि स्नेहनो वाते रक्ते पित्ते च रोपणः। लेखनश्च कफे कार्यस्तस्य मात्राऽधुनोच्यते।।3।। षड्वाक्शतैः स्नेहनेषु चतुर्भिश्चैव रोपणे। वाक्शतैश्च त्रिभिः कार्यः सेको लेखनकर्मणि।।4।। कार्यस्तु दिवसे सेको रात्रौ चात्ययिके गदे। सम्पूर्ण नेत्रव्यापी (अभिष्यन्द आदि) रोगों में 'सेक' या सेचन किया जाता है। इसकी विधि यह है—रोगी मनुष्य की निमीलित (बन्द की हुई) आँख या आँखों पर किसी भी उपयुक्त द्रव की सूक्ष्म धाराएँ चार अंगुल ऊपर से गिरायी जाती हैं और वह द्रव वातज रोगों में स्नेहन, रक्तज तथा पित्तज रोगों में रोपण तथा कफज रोगों में लेखन होना चाहिये। अब उसकी मात्रा कही जा रही है—स्नेहन द्रवों का सेक या सेचन छः सौ वाक्-मात्रा परिमित समय (लगभग 20 मिनट) तक, रोपण द्रवों का सेक चार सौ वाक्-मात्रा परिमित


[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]

(लगभग 15 मिनट) तक तथा लेखन द्रवा का सेक तीन सौ वाक्-मात्रा परिमित (लगभग 10 मिनट) तक करना चाहिये। यह सेक दिन में करना चाहिये, किन्तु अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर रात्रि में भी किया जा सकता है। वाताभिष्यन्द पर सेचन (1) एरण्डत्वक्पत्रमूलैः शृतमाजं पयो हितम्।।5।। सुखोष्णं सेचनं नेत्रं वाताभिष्यन्दनाशनम्। एरण्ड की छाल अथवा पत्ते अथवा जड़ के साथ पकाया हुआ बकरी के सुखोष्ण (गुनगुना) दूध का आँखों पर सेचन करने से वातजनित अभिष्यन्द नष्ट हो जाता है। वाताभिष्यन्द पर सेचन (2) परिशेको हितो नेत्रे पयः कोष्णं ससैन्धवम्।।6।। रजनीदारुसिद्धं वा सैन्धवेन समन्वितम्। वाताभिष्यन्दशमनं हितं मारुतपर्यये।।7।। शुष्काक्षिपाके च हितमिदं सेचनकं सदा। सेंधा नमक मिश्रित बकरी का दूध अथवा हल्दी, देवदारु, सेंधा नमक से युक्त गर्म किये हुये बकरी के दूध का सेचन करने से 'वातविपर्यय' नामक नेत्ररोग में लाभ होता है। यह वायु के अभिष्यन्द को शान्त करता है और 'शुष्काक्षिपाक' नामक नेत्ररोग में भी उक्त सेचन सर्वदा हितकर होता है। वाताभिष्यन्द सेचन (3) साबरं मधुकं तुल्यं घृतभृष्टं सुचूर्णितम्।।8।। छागीक्षीरे घृतं सेकात् पित्तरक्ताभिघातजित्। लोध अथवा मुलेठी को समान भाग में लेकर चूर्ण बनाकर उसे घी में भूनकर बकरी के दूध में भिगा दें, थोड़ी देर (2-3 घण्टा) के बाद मलकर दूध छान लें। इस दूध का सेचन करने से पित्त तथा रक्त का अभिष्यन्द रोग नष्ट हो जाता है।

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