शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 279 रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (1) त्रिफलालोध्रयष्टीभिः शर्कराभद्रमुस्तकैः ।। 9 ।। पिष्टैः शीताम्बुना सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः । त्रिफला, लोध, मुलेठी, खाँड तथा नागरमोथा को पीसकर जल में भिगा दें, फिर जल को छानकर आँखों पर सेक करें। उससे रक्तजनित अभिष्यन्द का नाश हो जाता है। रक्ताभिष्यन्द सेचन (2) लाक्षामधुकमञ्जिष्ठालोध्रकालानुसारिवाः ।। 10 ।। पुण्डरीकयुतः सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः । लाख, मुलेठी, मजीठ, लोध, कालीसारिवा तथा कमल इन द्रव्यों को पीसकर जल में भिगा दें, फिर छानकर सेक करें। इससे भी रक्तजनित अभिष्यन्द नष्ट हो जाता है। वक्तव्य-उक्त योगों का प्रयोग दुःखती हुई आँखों पर करना चाहिये। ये योग आश्चर्यजनक लाभ करते हैं। नेत्रशूलनाशक योग श्वेतलोध्रं घृते भृष्टं चूर्णितं पटविस्रुतम् ।। 11 ।। उष्णाम्बुना विमृदितं सेकाच्छूलघ्नमम्बके । सफेद लोध को घी में भूनकर चूर्ण बनायें, फिर उष्ण जल में भिगोकर और मलकर कपड़े से छान लें। इस जल का आँख पर सेक करने से नेत्रशूल नष्ट हो जाता है। आश्च्योतन-विधि अथाश्च्योतनकं कार्यं निशायां न कथञ्चन ।। 12 ।। उन्मीलितेऽक्षिणि दृङ्मध्ये बिन्दुभिर्द्व्यङ्गुलाद्धितम् । बिन्दवोऽष्टौ लेखनेषु स्नेहने दश बिन्दवः ।। 13 ।। रोपणे द्वादश प्रोक्तास्ते शीते कोष्णरूपिणः । उष्णे च शीतरूपाः स्युः सर्वत्रैवैष निश्चयः ।। 14 ।। रात्रि में आश्च्योतन कभी नहीं करना चाहिये। आश्च्योतन की विधि-उन्मीलित (खुली हुई) आँख में दृष्टि के मध्य में दो अंगुल ऊँचे से औषध द्रव की बूँदें टपकायी जाती हैं। बिन्दुओं की संख्या इस प्रकार है। यथा-लेखन द्रवों की आठ बूँदें, स्नेहन द्रवों की दस बूँदें और रोपण द्रवों की बारह बूँदें आँख में टपकानी चाहिये। शीतकाल में उक्त द्रवों को गुनगुना तथा उष्णकाल में शीतल करके डालना उचित है। यह सर्वसम्मत निश्चय है। वातादि भेद से आश्च्योतन वाते तिक्तं तथा स्निग्धं पित्ते मधुरशीतलम् । तिक्तोष्णरूक्षं च कफे क्रमादाश्च्योतनं हितम् ।। 15 ।। वातजनित नेत्ररोगों में तिक्त एवं स्निग्ध, पित्तज नेत्ररोगों में मधुर एवं शीतल तथा कफज रोगों में तिक्त, उष्ण एवं रूक्ष द्रव्यों का आश्च्योतन लाभदायक होता है। आश्च्योतन का धारण काल आश्च्योतनानां सर्वेषां मात्रा स्याद्वाक्शतं हिता । निमेषोन्मेषणं पुंसामङ्गुल्योश्छोटिकाऽथवा ।। 16 ।। गुर्वक्षरोच्चारणं वा वाङ्मात्रेयं स्मृता बुधैः । सभी प्रकार के आश्च्योतनों की मात्रा (धारणकाल) सौ वाक् परिमित (लगभग 4 मिनट) होती है। आँख का निमेषोन्मेष (बन्द करके खोलना) अथवा चुटकी बजाना अथवा गुरु (दीर्घ स्वर वाले) अक्षर का उच्चारण करना एक 'मात्रा' मानी जाती है। आश्च्योतन के योग ( 1 ) बिल्वादिपञ्चमूलेन बृहत्येरण्डशिग्रुभिः ।। 17 ।। क्वाथ आश्च्योतने कोष्णो वाताभिष्यन्दनाशनः । बेल आदि पंचमूल (बेल, अरणी, सोनापाठा, पाढ़ल तथा गम्भार की छाल) तथा वनभण्टा, एरण्ड तथा सहजन का क्वाथ बनायें और गुनगुना होने पर आँख में टपकायें। यह वातजनित अभिष्यन्द को नष्ट करता है। आश्च्योतन के योग ( 2 ) अम्बुपिष्टैर्निम्बपत्रैस्त्वचं लोध्रस्य लेपयेत् ।। 18 ।। प्रताप्य वह्निना पिष्ट्वा तद्रसो नेत्रपूरणात् । वातोत्थं रक्तपित्तोत्थमभिष्यन्दं विनाशयेत् ।। 19 ।। नीम के पत्तों को जल में पीसकर लोध की गीली या हरी छाल पर लेप कर दें, फिर उसे अग्नि में तपाकर और पीसकर रस निकाल लें। यह रस आँख में डालने से वातज, रक्तज तथा। पित्तज अभिष्यन्द नष्ट होता है। आश्च्योतन के योग ( 3 ) त्रिफलाश्च्योतनं नेत्रे सर्वाभिष्यन्दनाशनम् । स्त्रीस्तन्याश्च्योतनं नेत्रे रक्तपित्तानिलार्तिजित् ।। 20 ।। क्षीरसर्पिर्घृतं वापि वातरक्तरुजं जयेत् । त्रिफला के रस का आश्च्योतन सभी प्रकार के अभिष्यन्दों को नष्ट करता है। स्त्री के दूध का आश्च्योतन रक्त, पित्त तथा वायु की पीड़ा को जीतता है। कच्चे दूध से निकाला हुआ घी अथवा दही से निकाला हुआ घी वातरक्त की पीड़ा को जीतता है।