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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 279 रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (1) त्रिफलालोध्रयष्टीभिः शर्कराभद्रमुस्तकैः ।। 9 ।। पिष्टैः शीताम्बुना सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः । त्रिफला, लोध, मुलेठी, खाँड तथा नागरमोथा को पीसकर जल में भिगा दें, फिर जल को छानकर आँखों पर सेक करें। उससे रक्तजनित अभिष्यन्द का नाश हो जाता है। रक्ताभिष्यन्द सेचन (2) लाक्षामधुकमञ्जिष्ठालोध्रकालानुसारिवाः ।। 10 ।। पुण्डरीकयुतः सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः । लाख, मुलेठी, मजीठ, लोध, कालीसारिवा तथा कमल इन द्रव्यों को पीसकर जल में भिगा दें, फिर छानकर सेक करें। इससे भी रक्तजनित अभिष्यन्द नष्ट हो जाता है। वक्तव्य-उक्त योगों का प्रयोग दुःखती हुई आँखों पर करना चाहिये। ये योग आश्चर्यजनक लाभ करते हैं। नेत्रशूलनाशक योग श्वेतलोध्रं घृते भृष्टं चूर्णितं पटविस्रुतम् ।। 11 ।। उष्णाम्बुना विमृदितं सेकाच्छूलघ्नमम्बके । सफेद लोध को घी में भूनकर चूर्ण बनायें, फिर उष्ण जल में भिगोकर और मलकर कपड़े से छान लें। इस जल का आँख पर सेक करने से नेत्रशूल नष्ट हो जाता है। आश्च्योतन-विधि अथाश्च्योतनकं कार्यं निशायां न कथञ्चन ।। 12 ।। उन्मीलितेऽक्षिणि दृङ्मध्ये बिन्दुभिर्द्व्यङ्गुलाद्धितम् । बिन्दवोऽष्टौ लेखनेषु स्नेहने दश बिन्दवः ।। 13 ।। रोपणे द्वादश प्रोक्तास्ते शीते कोष्णरूपिणः । उष्णे च शीतरूपाः स्युः सर्वत्रैवैष निश्चयः ।। 14 ।। रात्रि में आश्च्योतन कभी नहीं करना चाहिये। आश्च्योतन की विधि-उन्मीलित (खुली हुई) आँख में दृष्टि के मध्य में दो अंगुल ऊँचे से औषध द्रव की बूँदें टपकायी जाती हैं। बिन्दुओं की संख्या इस प्रकार है। यथा-लेखन द्रवों की आठ बूँदें, स्नेहन द्रवों की दस बूँदें और रोपण द्रवों की बारह बूँदें आँख में टपकानी चाहिये। शीतकाल में उक्त द्रवों को गुनगुना तथा उष्णकाल में शीतल करके डालना उचित है। यह सर्वसम्मत निश्चय है। वातादि भेद से आश्च्योतन वाते तिक्तं तथा स्निग्धं पित्ते मधुरशीतलम् । तिक्तोष्णरूक्षं च कफे क्रमादाश्च्योतनं हितम् ।। 15 ।। वातजनित नेत्ररोगों में तिक्त एवं स्निग्ध, पित्तज नेत्ररोगों में मधुर एवं शीतल तथा कफज रोगों में तिक्त, उष्ण एवं रूक्ष द्रव्यों का आश्च्योतन लाभदायक होता है। आश्च्योतन का धारण काल आश्च्योतनानां सर्वेषां मात्रा स्याद्वाक्शतं हिता । निमेषोन्मेषणं पुंसामङ्गुल्योश्छोटिकाऽथवा ।। 16 ।। गुर्वक्षरोच्चारणं वा वाङ्मात्रेयं स्मृता बुधैः । सभी प्रकार के आश्च्योतनों की मात्रा (धारणकाल) सौ वाक् परिमित (लगभग 4 मिनट) होती है। आँख का निमेषोन्मेष (बन्द करके खोलना) अथवा चुटकी बजाना अथवा गुरु (दीर्घ स्वर वाले) अक्षर का उच्चारण करना एक 'मात्रा' मानी जाती है। आश्च्योतन के योग ( 1 ) बिल्वादिपञ्चमूलेन बृहत्येरण्डशिग्रुभिः ।। 17 ।। क्वाथ आश्च्योतने कोष्णो वाताभिष्यन्दनाशनः । बेल आदि पंचमूल (बेल, अरणी, सोनापाठा, पाढ़ल तथा गम्भार की छाल) तथा वनभण्टा, एरण्ड तथा सहजन का क्वाथ बनायें और गुनगुना होने पर आँख में टपकायें। यह वातजनित अभिष्यन्द को नष्ट करता है। आश्च्योतन के योग ( 2 ) अम्बुपिष्टैर्निम्बपत्रैस्त्वचं लोध्रस्य लेपयेत् ।। 18 ।। प्रताप्य वह्निना पिष्ट्वा तद्रसो नेत्रपूरणात् । वातोत्थं रक्तपित्तोत्थमभिष्यन्दं विनाशयेत् ।। 19 ।। नीम के पत्तों को जल में पीसकर लोध की गीली या हरी छाल पर लेप कर दें, फिर उसे अग्नि में तपाकर और पीसकर रस निकाल लें। यह रस आँख में डालने से वातज, रक्तज तथा। पित्तज अभिष्यन्द नष्ट होता है। आश्च्योतन के योग ( 3 ) त्रिफलाश्च्योतनं नेत्रे सर्वाभिष्यन्दनाशनम् । स्त्रीस्तन्याश्च्योतनं नेत्रे रक्तपित्तानिलार्तिजित् ।। 20 ।। क्षीरसर्पिर्घृतं वापि वातरक्तरुजं जयेत् । त्रिफला के रस का आश्च्योतन सभी प्रकार के अभिष्यन्दों को नष्ट करता है। स्त्री के दूध का आश्च्योतन रक्त, पित्त तथा वायु की पीड़ा को जीतता है। कच्चे दूध से निकाला हुआ घी अथवा दही से निकाला हुआ घी वातरक्त की पीड़ा को जीतता है।

280 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे [बायाँ स्तम्भ] पिण्डिकाविधान पिण्डी कवलिका प्रोक्ता बध्यते पट्टवस्त्रकैः ॥२१॥ नेत्राभिष्यन्दयोग्या सा व्रणेष्वपि निबध्यते । अभिष्यन्देऽधिमन्थे च सञ्जाते श्लेष्मसम्भवे ॥२२॥ स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य शिरस्तीक्ष्णैर्विरेचयेत् । अधिमन्थेषु सर्वेषु ललाटे वेधयेच्छिराम् ॥२३॥ अशान्ते सर्वथा मन्थे भ्रुवोरुपरि दाहयेत् । अभिष्यन्देषु सर्वेषु बध्नीयात् पिण्डिकां बुधः ॥२४॥ पिण्डी तथा कवलिका ये दो नाम पोट्टली के हैं। इसकी विधि यह है-औषधि के चूर्ण की रेशमी कपड़े में बाँधकर 'नेत्राभिष्यन्द' (दुखती आँख) पर प्रयुक्त किया जाता है (इस पोट्टली को गुलाबजल अथवा जल में भिगाकर प्रयोग करते हैं) और यह व्रणों पर भी बाँधी जाती है। कफजनित अभिष्यन्द तथा अधिमन्थ में शिर पर स्नेहन तथा स्वेदन करके तीक्ष्ण द्रव्यों द्वारा (नस्य देकर) शिरोविरेचन करना चाहिये और सभी प्रकार के अधिमन्थों में मस्तक की शिरा का वेध करें। यदि किसी प्रकार भी अधिमन्थ शान्त न हो तो भ्रू (भौंह) के ऊपर दाह क्रिया करे और सब प्रकार के अभिष्यन्दों में पिंडी का प्रयोग करें। वक्तव्य-पिण्डी का प्रयोग अधिमन्थ रोग की सफल चिकित्सा है। देहातों में आज भी चिकित्सक इसका प्रयोग करते हैं। पिण्डी के योग (१) वाताभिष्यन्दशान्त्यर्थं स्निग्धोष्णा पिण्डिका भवेत्। एरण्डपत्रमूलत्वङ्निर्मिता वातनाशिनी ॥२५॥ वातजनित अभिषन्द की शन्ति के लिए स्निग्ध तथा उष्ण द्रव्यों की पिण्डी उपयुक्त होती है और एरण्ड के पत्ते, मूल तथा छाल की बनायी हुई पिण्डी वातजनित अभिष्यन्द को नष्ट कर देती है। पिण्डी के योग (२) पित्ताभिष्यन्दनाशाय धात्रीपिण्डी सुखावहा । महानिम्बफलोद्भूता पिण्डी वा पित्तनाशिनी ॥२६॥ पित्तजनित अभिष्यन्द का नाश करने के लिए आँवलों की पिण्डी सुखद होती है और बकायन के फलों की पिण्डी भी पित्ताभिष्यन्द को नष्ट करती है। पिण्डी के योग (३) शिग्रुपत्रकृता पिण्डी श्लेष्माभिष्यन्दनाशिनी । निम्बपत्रकृता पिण्डी श्लेष्मपित्तहरा भवेत् ॥२७॥ [दायाँ स्तम्भ] सहजन के पत्तों का पिण्डी कफजनित अभिष्यन्द को नष्ट करती है और नीम के पत्तों की पिण्डी कफजनित अभिष्यन्द को हरती है। पिण्डी के योग (४) त्रिफलापिण्डिका प्रोक्ता नाशने श्लेष्मपित्तयोः । पिष्ट्वा काञ्जिकतोयेन घृतभृष्टा च पिण्डिका ॥२८॥ लोध्रस्य हरति क्षिप्रमभिष्यन्दमसृग्भवम् । शुण्ठी निम्बदलैः पिण्डी सुखोष्णा स्वल्पसैन्धवा ॥२९॥ धार्या चक्षुषि संयोगाच्छ्वोथकण्डूव्यथापहा । त्रिफला की पिण्डी कफपित्तजनित अभिष्यन्द को नष्ट करती है और लोध्र को काँजी में पीसकर एवं थोड़े से घी में तलकर बनायी हुई पिण्डी रक्तजनित अभिष्यन्द को शीघ्र ही हरती है। सोंठ तथा नीम के पत्तों में थोड़ा सा नमक मिलाकर तथा सबको पीसकर तथा गर्मकर आँख के ऊपर रखने सेजन, खुजली तथा व्यथा का नाश होता है। वक्तव्य-इन द्रव्यों की पोटली बाँधकर गुलाबजल अथवा जल में भिगोकर उससे बार-बार आँखों को भिगोते रहते हैं। इससे शीघ्र लाभ होता है। विडालक-विधि बिडालको बहिर्लेपो नेत्रे पक्ष्मविवर्जितः ॥३०॥ तस्य मात्रा परिज्ञेया मुखलेपविधानवत् । पक्ष्म (बरौनियों) को छोड़कर नेत्र के बहिर्भाग में वर्मों (पलकों) पर जो लेप किया जाता है, उसका नाम 'बिडालक' है। इसकी मात्रा (मोटाई तथा धारणकाल) मुखलेप के समान ही होती है। विडालक के योग (१) यष्टीगैरिकसिन्धूत्थदार्वाताक्ष्र्यैः समांशकैः ॥३१॥ जलपिष्टैर्बहिर्लेपः सर्वनेत्रामयापहः। मुलेठी, गेरू, सेंधा नमक, दारुहल्दी तथा रसवत को समभाग लेकर और जल में पीसकर आँखों के बाहर (चारों ओर) लेप करने से नेत्रों में होने वाले (अभिष्यन्द आदि) सम्पूर्ण रोगों का नाश हो जाता है। वक्तव्य-इस योग में नेत्र-चिकित्सक कपूर, हरड़ तथा अफीम भी मिला देते हैं। यह दुखती आँखों की उत्तम औषधि है। विडालक के योग (२) रसाञ्जनेन वा लेपः पथ्याविश्वदलैरपि ॥३२॥

त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 281 कुमारिकाग्निपत्रैर्वा दाडिमीपल्लवैरपि। वचाहरिद्रानिम्बैर्वा तथा नागरगैरिकैः।। ३३।। रसवत का लेप अथवा हरड़, सोंठ तथा तेजपत्ता का लेप अथवा घीकुआर का गूदा तथा चीता के पत्तों का लेप अथवा अनार के पत्तों का लेप अथवा वच, हल्दी तथा नीम के पत्तों का लेप अथवा सोंठ और गेरू का लेप उक्त विधि से करने पर नेत्र रोगों का नाश हो जाता है। विडालक के योग (३) दग्ध्वा ससैन्धवं लोध्रं मधूच्छिष्टयुते घृते। पिष्टमञ्जनलेपाभ्यां सद्यो नेत्ररुजापहम्।। ३४।। सेंधा नमक तथा लोध को जलाकर भस्म बना लें फिर उसको मोममिश्रित घी में मिलाकर रख लें। इसका अञ्जन तथा लेप शीघ्र ही नेत्र की पीड़ा को हरता है। वक्तव्य-भस्म को भली-भाँति पीसकर और मोम को घी में डालकर पिघला कर लेप तैयार कर लें। इसको आँख के भीतर अंजन के रूप में तथा बाहर लेप के रूप में लगाया जाता है। विडालक के योग (४) लोहस्य पात्रे सङ्घृष्टो रसो निम्बफलोद्भवः। किञ्चिद् घनो बहिर्लेपान्नेत्रबाधां व्यपोहति।। ३५।। लोहे की कड़ाही में नीम के पत्तों का रस डालकर घोटना चाहिये। जब कुछ गाढ़ा हो जाये तो आँख के बाहर लेप कर दें। यह भी नेत्र की पीड़ा को नष्ट करता है। विडालक के योग (५) सञ्चूर्ण्य मरिचं केशराजस्वरसमर्दनात्। लेपनादर्मणां नाशं करोत्येष प्रयोगराट्।। ३६।। मरिच के चूर्ण को भाँगरा के रस में पीसकर लेप कर यह उत्तम योग सब प्रकार के अर्म रोगो का नाश करता है। विडालक के योग (६) स्विन्नां भित्त्वा विनिष्पीड्य भिन्नामञ्जननामिकाम्। शिलैलानतसिन्धूत्थैः सक्षौद्रैः प्रतिसारयेत्।। ३७।। बरौनी पर होने वाली 'अञ्जन' नाम की फुन्सी का पहले स्वेदन करें फिर भेदन कर निष्पीड़न करें। इसके पश्चात् मैनसिल, इलायची, तगर तथा सेंधा नमक का चूर्ण मधु में मिलाकर उस पर रगड़ देने से वह ठीक हो जाती है। तर्पण-विधि अथ तर्पणकं वच्मि नेत्रतृप्तिकरं परम्। यदृक्षं परिशुष्कं च नेत्रं कुटिलमाविलम्।। ३८।। शीर्णपक्ष्मशिरोत्पातकृच्छ्रोन्मीलनसंयुक्तम् । तिमिराजुर्नशुक्राद्यैरभिष्यन्दाधिमन्थकैः ।। ३९।। शुष्काक्षिपाकशोथाभ्यां युक्तं वातविपर्ययैः। तन्नेत्रं तर्पणे योज्यं नेत्ररोगविशारदैः ।। ४०।। अब मैं 'तर्पण' की विधि का वर्णन करता हूँ, जो नेत्र को तृप्त करने का परमोत्तम उपाय है। जो नेत्र, रूक्ष, शुष्क, कुटिल, आविल (मलिन), जिसके बाल झड़ते हों या झड़ गये हों, जिसमें शिरोत्पात रोग हो (इस रोग से आँख की सिरायें लाल हो जाती हैं), जो आँख कठिनता से खुलती हो, जो तिमिर (धुन्ध), अर्जुन, शुक्र, (फूला), अभिष्यन्द, अधिमन्थ शुष्काक्षिपाक, शोथ तथा वातविपर्यय नामक रोग से पीड़ित हो, उसमें चतुर नेत्र-चिकित्सक का 'तर्पण' कर्म का प्रयोग करना चाहिये। तर्पण का निषेध दुर्दिनात्युष्णशीतेषु चिन्तायासभ्रमेषु च। अशान्तोपद्रवे चाक्षिण तर्पणं न प्रशस्यते ।। ४१।। दुर्दिन (जिस दिन आकाश में बादल छाये हों) में, अत्यन्त उष्ण तथा शांतिकाल में और चिन्ता, शोक तथा भ्रम रोग से पीड़ित रोगियों की आँख में तथा आम दोष के उपद्रव के लक्षणों से युक्त नेत्र में तर्पण का प्रयोग उचित नहीं होता है। वक्तव्य-नेत्र रोगों के उपद्रव-नेत्र में पीड़ा का उत्पत्ति, लालिमा, शोथ (सूजन), रगड़ लगना, चुभने की-सी पीड़ा का होना, शूल तथा आँखों का आँसुओं से भरा रहना। तर्पण-विधि वातातरजोज्ञीने देशे चोत्तानशायिनः। आधारौ माषचूर्णेन क्लिन्नेन परिमण्डलौ ।। ४२।। समौ दृढावसम्बन्धौ कर्त्तव्यौ नेत्रकोशयोः। पूरयेद् घृतमण्डेन विलीनेन सुखोदकैः ।। ४३।। अथवा शतधौतेन सर्पिषा क्षीरजेन वा। निमग्नान्यक्षिपक्ष्माणि यावत्स्युस्तावदेव हि।। ४४।। पूरयेन्मीलिते नेत्रे तत उन्मीलयेच्छनैः। धारयेद् वर्त्मरोगेषु वाङ्मात्राणां शतं बुधः ।। ४५ ।। स्वच्छे कफे सन्धिरोगे मात्रापञ्चशतं हितम्। शुक्ले च षट्शतं कृष्णे रोगे सप्तशतं मतम् ।। ४६।।

282 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ उत्तरखण्डे

282 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ उत्तरखण्डे


[वाम स्तम्भ / Left Column]

दृष्टिरोगेष्वष्टशतमधिमन्थे सहस्त्रकम्। सहस्रं वातरोगेषु धार्यमेवं हि तर्पणम् ।। 47 ।। वायु, धूप तथा धूल से रहित स्थान में रोगी को चित्त (सीधा) लिटा दें और उसकी आँख के चारों ओर दृढ़, बाधारहित तथा उड़द की पीठी के गोल आधार (थाले) बना दें, फिर इसे उष्ण जल द्वारा पिघलाये हुये घी अथवा सौ बार ये धोये हुये घृत से अथवा दूध से निकाले हुये घी से भर दें। उक्त पदार्थ उतना ही भरना चाहिये, जितने से आँख के वाल डूब जायें। यह द्रव आँख को बन्द कर भरना चाहिये। तत्पश्चात् रोगी आँख को धीरे-धीरे खोलने का यत्न करें। वर्त्म (बरौनी) के रोगों में सौ मात्रा (3-4 मिनट), कफ के रोगों में अथवा सन्धि के रोगों में पाँच सौ मात्रा (15-20 मिनट), शुक्ल भाग के रोगों में छः सौ मात्रा कृष्णभाग के रोगों में सात सौ मात्रा, दृष्टि रोगों में आठ सौ तथा अधिमन्थ तथा वायु के रोगों में एक हजार मात्रा परिमित समय तक तर्पण को धारण करना चाहिये।

तर्पण के पश्चात् कर्म

स्विन्नेन यवपिष्टेन स्नेहवीर्य्येरितं ततः। यथास्वं धूमपानेन कफमस्य विशोधयेत् ।। 48 ।। तर्पण के पश्चात् स्नेह की शक्ति से बढ़े हुये कफ को गर्म की हुई जौ की पीठी (जौ के आटे को जल से सानकर और गर्मकर बनायी हुई पीठी) के उबटन से अथवा धूमपान से शोधन कर दें।

तर्पणकाल तथा सम्यक् तर्पण का लक्षण

एकाहं वा त्र्यहं वापि पञ्चाहं चेष्यते परम्। तर्पणे तृप्तिलिङ्गानि नेत्रेष्वेतानि भावयेत् ।। 49 ।। सुखस्वप्नावबोधत्वं विशदं वर्णपाटवम्। निवृत्तिर्व्याधिशान्तिश्च क्रियालाघवमेव च ।। 50 ।। तर्पण का प्रयोग एक दिन तीन दिन अथवा पाँच दिन तक करना चाहिये और तर्पण करने से ये 'तृप्ति लक्षण' उत्पन्न हो जाते हैं। यथा-सुख से नींद आना तथा अवबोध (जागना) होना, आँख में विशदता (चिपचिपाहट न रहना), व्रण स्थान का स्वाभाविक हो जाना, रोग की ओर से निश्चिन्त हो जाना, व्याधि का शान्त हो जाना और नेत्र की क्रिया में लघुता (देखने की शक्ति का प्राप्त होना)। वक्तव्य— जब तक उक्त लक्षण उत्पन्न न हो जायें तब तक तर्पण का प्रयोग करते रहें।


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

अतितर्पण-हीनतर्पण तथा उनका उपचार

अथ साश्रु गुरु स्निग्धं नेत्रं स्यादतितर्पितम्। रूक्षमस्राविलं रुग्णं नेत्रं स्याद्धीनतर्पितम् ।। 51 ।। रूक्षस्निग्धोपचाराभ्यामेतयोः स्यात् प्रतिक्रिया। तर्पण के अतियोग से नेत्र अश्रुयुक्त, भारी तथा स्निग्ध हो जाते हैं और हीनयोग से रूक्ष, आँसुओं से व्याप्त तथा रुग्ण (रोगी) हो जाते हैं। इन दोनों का प्रतिकार क्रमशः रूक्ष तथा स्निग्ध चिकित्सा-विधियों द्वारा करना चाहिये।

पुटपाक-विधि

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि पुटपाकस्य साधनम् ।। 52 ।। द्वौ बिल्वमात्रौ मांसस्य पिण्डौ स्निग्धौ सुपेषितौ। द्रव्याणां बिल्वमात्रं तु द्रवाणां कुडवो मतः ।। 53 ।। तदेकस्थं समालोड्य पत्रैः सुपरिवेष्टितम्। पुटपाकेन तत् पक्त्वा गृह्णीयात् तद् रसं बुधः ।। 54 ।। तर्पणोक्तविधानेन यथावदुपचारयेत्। दृष्टिमध्ये निषेच्यः स्यान्नित्यमुत्तानशायिनः ।। 55 ।। इसके पश्चात् 'पुटपाक' का साधन कहा जाता है। दो पल मांस लेकर उसे पीसकर पिण्ड बना लें और उपयोगी द्रव्य एक-एक पल लेकर उनको भी पीस लें। फिर दोनों को एक साथ मिलाकर पत्तों से लपेट दें, तत्पश्चात् पुटपाक की विधि से पकाकर उसका रस निचोड़ लें, फिर इस रस को तर्पण की विधि से थाला बनाकर प्रयोग करें अथवा चित्त लिटाये हुये रोगी का आँख प्रतिदिन निषेचन (सेक) करें।

पुटपाक के भेद

स्नेहनो लेखनश्चैव रोपणश्चेति स त्रिधा। हितः स्निग्धोऽतिरूक्षस्य स्निग्धस्यापि हि लेखनः ।। 56 ।। दृष्टेर्बलार्थमितरः पित्तासृग्व्रणवातनुत्। पुटपाक तीन प्रकार का होता है— 1. स्नेहन (स्निग्ध करने वाला), 2. लेखन (रूक्ष करने वाला) और 3. रोपण (आँख के व्रणों को भरने वाला)। अतिरूक्ष नेत्र में स्नेहन, अतिस्निग्ध में लेखन, दृष्टि का बलवर्द्धन करने तथा पित्त एवं रक्त के व्रणों को नष्ट करने के लिए रोपण पुटपाक का प्रयोग करें।

पुटपाक के योग

सर्पिर्मांसवसामज्जामेदःस्वाद्वौषधैः कृतः ।। 57 ।। स्नेहनः पुटपाकस्तु धार्यो द्वे वाक्शते दृशोः। जाङ्गलौनां यकृन्मांसैर्लेखनद्रव्यसंयुतैः ।। 58 ।।

त्रयोदशोऽध्यायः ] नेत्रप्रसादनविधिः 283 [ बायाँ स्तम्भ ] कृष्णालोहरजस्ताम्रशङ्खविद्रुमसिन्धुजैः । समुद्रफेनकासीसस्रोतोजदधिमस्तुभिः ॥५९॥ लेखनो वाक्शतं धार्यस्तस्यैतावद् विधारणम्। स्तन्यजाङ्गलमध्वाज्यतिक्तकद्रव्यपाचितः ॥६०॥ लेखनात् त्रिगुणो धार्यः पुटपाकस्तु रोपणः। वितरेत् तर्पणोक्तां तु क्रियां व्यापत्तिदर्शने॥६१॥ घी, मांस, वसा, मज्जा, मेदा तथा मधुर द्रव्यों (शतावरी तथा मुलेठी आदि) का पुटपाक 'स्नेहन' होता है और वह दो सौ वाक्मात्रा (7-8 मिनट) तक धारण करना चाहिये। जंगल (मरुस्थल के) प्राणियों के यकृत्, मांस तथा लेखन द्रव्यों का पुटपाक लेखन होता है। उसको सौ मात्रा (3-4 मिनट) तक धारण करें। लेखन द्रव्य ये हैं-लोहचूर्ण, ताम्रचूर्ण (अथवा भस्म), शंख, प्रवाल, सेंधा नमक, समुद्रफेन, कासासी, काला सुरमा तथा दही का पानी, स्त्री का दूध जंगली जीवों का मांस, मधु, घी तथा तिक्त द्रव्यों (निम्बपत्रादि) का पुटपाक रोपण होता है। इसकी तीन सौ मात्रा (10-12 मिनट) तक धारण करें। यदि इसके अतियोग अथवा हीन योग से कोई हानि दिखलायी दे तो तर्पणोक्त विधि से चिकित्सा करें। वक्तव्य-उपर्युक्त उपयोगी द्रव्यों का पुटपाक विधि से पाक करके उनका रस निकाल लेते हैं और उस रस का प्रयोग नेत्रों में किया जाता है। अञ्जन-विधि अथ सम्पक्वदोषस्य प्राप्तमञ्जनमाचरेत्। हेमन्ते शिशिरे चैव मध्याह्नेऽञ्जनमिष्यते ॥६२॥ पूर्वाह्ने चापराह्ने च ग्रीष्मे शरदि चेष्यते। वर्षासु नाभ्रे नात्युष्णे वसन्ते च सदैव हि॥६३॥ दोषों का पाक हो जाने पर आवश्यकतानुसार 'अञ्जन' का प्रयोग करें। हेमन्त ऋतु (माघ तथा फाल्गुन) में दिन के मध्य भाग (दोपहर) में अञ्जन लगाना चाहिये और शरद् ऋतु (आश्विन तथा कार्तिक) तथा ग्रीष्म ऋतु (ज्येष्ठ तथा आषाढ़) में प्रातःकाल अथवा सायंकाल में अञ्जन लगाना चाहिये। वर्षा ऋतु (सावन तथा भादों) में जब बादल तथा अत्यन्त गर्मी न हो तब अञ्जन लगायें और वसन्त ऋतु (चैत्र तथा वैशाख) में किसी भी समय अञ्जन लगाया जा सकता है। वक्तव्य-नेत्रों में होने वाले दोषपाक का लक्षण- 'मन्दवेदनता कण्डूः संरम्भाश्रुप्रशान्तता। प्रशस्तवर्णता चाक्ष्णोः सम्पक्वं दोषमादिशेत्'। जब तक ये लक्षण दिखलायी न दें तब तक अञ्जन लगाना उचित नहीं है। [ दायाँ स्तम्भ ] अञ्जन के भेद लेखनं रोपणं चैव तथा स्यात् स्नेहाञ्जनम्। लेखनं क्षारतीक्ष्णाम्लरसैरञ्जनमिष्यते॥६४॥ कषायतिक्तरसयुक् सस्नेहं रोपणं मतम्। मधुरं स्नेहसम्पन्नमञ्जनं च प्रसादनम्॥६५॥ अञ्जन तीन प्रकार का होता है-1. लेखन, 2. रोपण तथा 3. स्नेहन। क्षार (जौखार आदि), तीक्ष्ण (कटु द्रव्य) तथा अम्ल रस युक्त द्रव्यों का अञ्जन 'लेखन' माना जाता है, कषाय तथा तिक्त रस से युक्त द्रव्यों का स्नेहयुक्त अञ्जन 'रोपण' माना जाता है और मधुर द्रव्यों का स्नेह युक्त अञ्जन 'प्रसादन' अर्थात् स्नेहन होता है। अञ्जन के अन्य तीन भेद गुटिकासच्चूर्णानि त्रिविधान्यञ्जनानि च। कुर्याच्छलाकयाऽङ्गुल्या हीनानि च यथोत्तरम्॥६६॥ अञ्जन के तीन प्रकार और होते हैं। यथा-1. गुटिका (लम्बी-लम्बी गोलियां जैसे चन्द्रोदयावर्ति), 2. रस (द्रवस्वरूप) और 3. चूर्ण। ये यथासम्भव सलाई अथवा अंगुली से लगाये जाते हैं। गुटिका घिसकर लगायी जाती है। ये उत्तरोत्तर हीनगुण वाले होते हैं। अञ्जन का निषेध श्रान्ते प्ररुदिते भीते पीतमद्ये नवज्वरे। अजीर्णे वेगघाते च नाञ्जनं सम्प्रशस्यते॥६७॥ श्रान्त (थका हुआ), प्ररुदित (रोया हुआ) भीत (डरा हुआ) तथा पीतमद्य (मद्य पिया हुआ) मनुष्य और नवज्वर में, अजीर्ण से तथा वेगरोध से पीड़ित मनुष्य अञ्जन न लगायें। गुटिकाञ्जन की मात्रा हरेणुमात्रां कुर्वीत वर्तिं तीक्ष्णाञ्जने भिषक्। प्रमाणं मध्यमेऽध्यर्धं द्विगुणं तु मृदौ भवेत्॥६८॥ चिकित्सक का कर्तव्य है, कि तीक्ष्ण द्रव्यों से निर्मित गुटिकाञ्जन की वर्ति (बत्ती), हरेणु (मटर) के समान बनाये और मध्यम (रोपण द्रव्य निर्मित गुटिकाञ्जन) में डेढ़ हरेणु के समान और मृदु (स्नेहन) में दो हरेणु के समान बत्ती बनायें। रसरूप अञ्जन की मात्रा रसक्रिया तूत्तमा स्यात् त्रिविडङ्गमिता हिता। मध्यमा द्विविडङ्गा स्याद्धीना त्वेकविडङ्गिका॥६९॥ रसरूप अञ्जन की उत्तम मात्रा वायविडिंग के तीन दानों के बराबर मध्यम दो वायविडिंग और हीन मात्रा एक वायविडिंग के बराबर होनी चाहिये।

284 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे

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284 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे चूर्णरूप अञ्जन की मात्रा वैरेचनिकचूर्णं तु द्विशलाकं विधीयते। मृदौ तु त्रिशलाकं स्याच्चतस्रः स्नेहिकेऽञ्जने।।70।। विरेचन (लेखन) चूर्णाञ्जन की मात्रा दो सलाई भर, मृदु (रोपण) की तीन सलाई तथा स्नेहन की चार सलाई भर मात्रा मानी जाता है। वक्तव्य—सुरमे की शीशी में सलाई को डालने पर उसके एक अंगुल अग्रभाग पर जितना सुरमा लग जाता है, वह मात्रा एक शलाका कही जाता है। शलाका-निर्माण-विधि मुखयोः कुण्ठिता श्लक्ष्णा शलाकाष्टाङ्गुलोन्मिता। अश्मजा धातुजा वा स्यात् कलायपरिमण्डला।।71।। ताम्रलोहाश्मसञ्जाता शलाका लेखने मता। सुवर्णरजतोट्भूता शलाका स्नेहने मता।।72।। अङ्गुलीव मृदुत्वेन कथिता रोपणे बुधैः। अञ्जन (सुरमा) लगाने की 'शलाका' (सलाई) आठ अंगुल लम्बी हो, दोनों ओर से कुण्ठित (गोलाईदार हो), श्लक्ष्ण (खुरदरी न हो), उसके दोनों मुख मटर के समान मोटे हों तथा वह पत्थर तथा स्वर्ण आदि धातु की बनानी चाहिये। लेखन-अञ्जन के लिए ताँबा, लोहा तथा पत्थर की, स्नेहन अञ्जन के लिए सोना तथा चाँदी को शलाका होनी चाहिये और रोपण अञ्जन में मृदु होने के कारण अंगुली को ही उत्तम माना जाता है। वक्तव्य—यषद (जस्ता) का शलाका उत्तम होती है। आचार्य शार्ङ्गधर ने इसी प्रकरण में आगे शलाका बनाने की विधि भी कही है। अञ्जन प्रयोग विधि एवं काल सायं प्रातर्वाञ्जनं स्यात् तत्सदा नैव कारयेत्।।73।। नातिशीतोष्णवाताभ्रवेलायां सम्प्रशस्यते। कृष्णभागादधः कुर्यादपाङ्गं यावदञ्जनम्।।74।। अञ्जन सायंकाल अथवा प्रातःकाल लगाना चाहिये। इसके अतिरिक्त समयों में अञ्जन लगाना उचित नहीं है। अत्यन्त शतिकाल में, अत्यन्त उष्णकाल में, प्रवात (जब अत्यन्त हवा चलती हो) में तथा अभ्रकाल (जब आकाश में बादल छाये हों) में अञ्जन नहीं लगाना चाहिये। कृष्ण-भाग के नीचे तथा अपाङ्ग (नेत्र के बाहरी कोण) तक अञ्जन लगाना चाहिये। वक्तव्य—अञ्जन लगाने का समुचित विधि के लिए देखें-सु० उ० अ० 18 श्लो० 64-65। इन श्लोकों का तात्पर्य यह है, कि कोया से लेकर अपांग (आँख के कोने) तक अञ्जन लगी हुई। शलाका को आँख के भीतर डालकर घुमा लेना चाहिये। चन्द्रोदयावर्ति शङ्खनाभिर्विभीतस्य मज्जा पथ्या मनःशिला। पिप्पली मरिचं कुष्ठं वचा चेति समांशकम्।।75।। छागीक्षीरेण सम्पेष्य वर्तिं कृत्वा यवोन्मिताम्। हरेणुमात्रां सङ्घृष्य जलैः कुर्यात्तथाञ्जनम्।।76।। तिमिरं मांसवृद्धिं च काचं पटलमर्बुदम्। रात्र्यन्ध्यं वार्षिकं पुष्पं वर्तिश्चन्द्रोदया जयेत्।।77।। शंखनाभि, बहेड़ा की मींगी, बड़ी हरड़, मैनसिल, पीपल, मरिच, कूठ तथा वच इन सब द्रव्यों को समान भाग लेकर अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण बनाये और फिर उसको बकरी के दूध में भली-भाँति पीसकर जौ जैसप लम्बी-लम्बी बत्तियाँ बना लें और हरेणु परिमित औषधि जल के साथ घिसकर अञ्जन करें। यह तिमिर (धुन्ध), मांसवृद्धि (अर्म आदि), काच (मोतिया), पटलगत दोष, अर्बुद (नेत्रार्बुद), रतौंधी तथा वर्ष भर के पुष्प (फूलों) को जीतता है। वक्तव्य—उक्त योग में विचारणीय विषय यह है, कि जौ भर की तो बत्ती बनाने का विधान है और हरेणु भर औषध लगाने का ? हरेणु नाम मटर का है तदनुसार सुश्रुत के भाष्यकार डल्हणाचार्य तथा शार्ङ्गधर के टीकाकार श्रीआढमल्ल ने उसका अर्थ भी किया है। हमारा विचार है कि 'हरेणु' के पर्यायों में बड़ा चना, मटर, पित्तपापड़ा तथा हरेणुका भी देखे जाते हैं। अतः यथोचित निर्णय लेकर मात्रा का विधान करें। करञ्जवर्ति पलाशपुष्पस्वरसैर्बहुशः परिभाविता। करञ्जबीजवर्तिस्तु दृष्टेः पुष्पं विनाशयेत्।।78।। करञ्ज के बीजों का कपड़छन चूर्ण बनाकर उसको पलाश के फूलों के स्वरस का अनेक (सात) भावनायें दें, फिर इसकी वर्ति बना लें। यह भी फूली को नष्ट करती है। समुद्रफेनादिवर्ति समुद्रफेनसिन्धूत्थशङ्खदक्षाण्डवल्कलैः । शिग्रुबीजयुतैर्वर्तिः शुक्रादींश्छत्रवल्लिखेत्।।79।। समुद्रफेन, सेंधा नमक, शंख, मुरगी के अण्डों के छिलके

[त्रयोदशोऽध्यायः ] नेत्रप्रसादनविधिः 285

[बायाँ स्तम्भ]

और सहजन के बीज-इन सभी द्रव्यों को पीसकर (सहजन के रस से) वर्ति बनायें। यह भी शुक्रादि नेत्ररोगों को शस्त्र के समान काट देती है।

दन्तवर्ति दन्तैर्दन्तिवराहोष्ट्रगोहयाजखुरोद्भवैः । शङ्खमुक्ताम्भोधिफेनयुतैः सर्वैर्विचूर्णितैः ।। 80 ।। दन्तवर्तिः कृता श्लक्ष्णा शुक्राणां नाशिनी परा। हाथी, सूअर, ऊँट, गाय, घोड़ा, बकरी, तथा गधा इनके दाँत, शंख, मोती तथा समुद्री झाग इन सब द्रव्यों को समभाग लेकर और अत्यन्त बारीक पीसकर (किसी भी उपयुक्त द्रव से) वर्ति बना लें। यह भी शुक्र नामक नेत्ररोगों को नष्ट करती है।

नीलोत्पलवर्ति नीलोत्पलं शिग्रुबीजं नागकेशरकं तथा ।। 81 ।। एतत्कल्कैः कृता वर्तिरतितन्द्रां निवारयेत्। नीलकमल, सहजन के बीज तथा नागकेसर इन सबको पीसकर वर्ति बनायें। यह अतिनिन्द्रा को रोकती है।

कुसुमिकावर्ति तिलपुष्पाण्यशीतिः स्युः षष्टिः पिप्पलतण्डुलाः ।। 82 ।। जातीकुसुमपञ्चाशन्मरिचानि च षोडश। सूक्ष्मं पिष्ट्वा जले वर्तिः कृता कुसुमिकाभिधा ।। 83 ।। तिमिरार्जुनशुक्राणां नाशिनी मांसवृद्धिहृत्। ( एतस्याश्चाञ्जने मात्रा प्रोक्ता सार्धहरेणुका ।। 84 ।।) तिल के फूल 80, पीपल के चावल (जो उसे कूटने पर मिलते हैं) 60, चमेली के फूल 50 और कालीमरिच 16 दाना इन सबको बारीक पीसकर जल से बत्ती बनाये। इसका नाम 'कुसुमिकावर्ति' है। यह तिमिर, अर्जुन तथा शुक्र नामक नेत्र रोगों का नाश करती है और मांसवृद्धि को हरती है। इसकी मात्रा अञ्जन करने में डेढ़ हरेणु भर का कही गयी है।

रसाञ्जनवर्ति रसाञ्जनं हरिद्रे द्वे मालतीनिम्बपल्लवाः। गोशकृद्रससंयुक्ता वर्तिर्नक्तान्ध्यनाशिनी ।। 85 ।। रसवत, हल्दी, दारुहल्दी, चमेली और नीम के पत्ते-इन सबको अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर गाय के गोबर के रस से वर्ति बनाये। यह रतौंधी को नष्ट करती है।

धात्र्यादिवर्ति धात्र्यक्षपथ्याबीजानि एकद्वित्रिगुणानि च।


[दायाँ स्तम्भ]

पिष्ट्वा वर्तिं जलैः कुर्यादञ्जनं द्विहरेणुकम् ।। 86 ।। नेत्रस्रावं हरत्याशु वातरक्तरुजं तथा। आँवला के बीज एक भाग, बहेड़ा के बीज दो भाग और हरड़ के बीजों की गिरी तीन भाग लेकर और भली-भाँति पीसकर जल से वर्ति बना लें। इसका दो हरेणु भर अञ्जन करें। यह नेत्रस्राव (उलका) तथा वातरक्त की पीड़ा को शीघ्र ही हरती है।

वक्तव्य-उक्त सभी उदाहरण वर्ति स्वरूप गुटिकाञ्जन के हैं। अब इसके आगे रस रूप में प्रयुक्त होने वाले अञ्जनों के उदाहरण कहे जायेंगे।

तुत्थादि-रसक्रिया तुत्थमाक्षिकसिन्धूत्थं सिताशङ्खमनःशिला ।। 87 ।। गैरिकोदधिफेनं च मरिचं चेति चूर्णयेत्। संयोज्य मधुना कुर्यादञ्जनार्थं रसक्रियाम् ।। 88 ।। वर्त्मरोगार्मतमिरकाचशुक्रहरां पराम्। शुद्ध तूतिया, सुवर्णमाक्षिक, सेंधा नमक, खाँड, शंख, मैनसिल, गेरू, समुद्रफेन तथा मरिच इन सबको अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर और मधु के साथ मिलाकर रस रूप अञ्जन बना लें। यह वर्त्मरोग (रोहा आदि), अर्म, तिमिर, काच (मोतिया) तथा शुक्र नामक नेत्ररोग का विनाश करने के लिए उत्तम योग है।

वटक्षीर-रसाञ्जन वटक्षीरेण संयुक्तो मुख्यः कर्पूरजः कणः ।। 89 ।। क्षिप्रमञ्जनतो हन्ति कुसुमं तु द्विमासिकम्। शुद्ध कपूर को बरगद के दूध में पीसकर अञ्जन करने से दो महीने का पुराना फूला भी शीघ्र नष्ट हो जाता है।

अतिनिद्रानाशक योग क्षौद्राश्वलालासङ्घृष्टैर्मरिचैर्नेत्रमञ्जयेत् ।। 90 ।। अतिनिद्रा शमं याति तमः सूर्योदयादिव। कालीमरिच को मधु तथा घोड़े की लार में घिसकर नेत्र में अञ्जन करें। इससे अतिनिद्रा उस प्रकार शान्त हो जाती है जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अन्धकार।

तन्द्रानाशक योग जातीपुष्पं प्रवालं च मरिचं कटुकी वचा ।। 91 ।। सैन्धवं बस्तमूत्रेण पिष्टं तन्द्राघ्नमञ्जनम्। चमेली के फूल तथा पत्ते, मरिच, कुटकी, वच तथा

286 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे

सेंधा नमक इन सबको समभाग लेकर और बकरे के मूत्र में पीसकर अञ्जन लगाने से तन्द्रा (उँघाई) नष्ट हो जाती है।

प्रबोधाञ्जन शिरीषबीजगोमूत्रकृष्णामरिचसैन्धवैः ॥ ९२॥ अञ्जनं स्यात् प्रबोधाय सरसोनशिलावचैः।

सिरस (शिरशि) के बीज, पीपल, मरिच, सेंधा नमक, लहसुन, मैनसिल तथा वच इन सबको समान भाग लेकर गोमूत्र में पीसकर अञ्जन लगाने से मूर्च्छित रोगी संज्ञावान् (चैतन्य) हो जाता है।

दार्व्यादि रसक्रिया दार्वा पटोलं मधुकं सन्निम्बपद्मकोत्पलम् ॥ ९३॥ प्रपौण्डरीकं चैतानि पचेत् तोये चतुर्गुणे। विपाच्य पादशेषं तु शृतं नीत्वा पुनः पचेत् ॥ ९४॥ शीते तस्मिन्मधु सितां दद्यात् पादांशिकां नरः। रसक्रियैषा दाहाश्रुरक्तरागरुजो हरेत् ॥ ९५॥

दारुहल्दी, परवल की पत्ती, मुलेठी, नीम के पत्ते, पद्मकाठ, लाल कमल तथा सफेद कमल इन सब द्रव्यों को कूटकर चौगुने जल में पकायें, चतुर्थांश जल शेष रह जाने पर छान लें। इस क्वाथ को फिर पकायें जब गाढ़ा हो जाये तो उतार लें। शीतल हो जाने पर उसमें मधु तथा खाँड (क्वाथ्य द्रव्यों के) चतुर्थांश मिला दें। यह रसक्रिया दाह, आँसू तथा पीड़ा को हरती है।

रसाञ्जनादि रसक्रिया रसाञ्जनं सर्जरसो जातीपुष्पं मनःशिला। समुद्रफेनो लवणं गैरिकं मरिचानि च॥ ९६॥ एतत् समांशं मधुना पिष्ट्वा प्रक्लिन्नवर्त्मनि। अञ्जनं क्लेदकण्डूघ्नं पक्ष्मणां च प्ररोहणम् ॥ ९७॥

रसवत, राल, चमेली के फूल, मैनसिल, समुद्रफेन, सेंधा नमक, गेरू तथा मरिच इन सब द्रव्यों को समभाग लेकर सूक्ष्म पीसकर तथा मधु मिलाकर अञ्जन करें। इससे प्रक्लिन्न- वर्त्म रोग, क्लेद तथा कण्डू (खुजली) का नाश हो जाता है। पक्ष्मों (आँख के बालों) का पुनः प्ररोहण (उत्पन्न) हो जाता है।

गुडूची रसक्रिया गुडूचीस्वरसः कर्षः क्षौद्रं स्यान्माषकोन्मितम्। सैन्धवं क्षौद्रतुल्यं स्यात् सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ ९८॥ अञ्जयेन्नयनं तेन पिल्लार्मतिमिरं जयेत्। काचं कण्डूं लिङ्गनाशं शुक्लकृष्णगतान् गदान्॥ ९९॥

गिलोय का स्वरस एक कर्ष (1 तोला), मधु और सेंधा नमक एक-एक माशा सबको एक साथ पीसकर उसको नेत्रों में लगायें। यह पिल्ल, अर्म, तिमिर, काच, कण्डू, लिंगनाश तथा शुक्ल भाग तथा कृष्ण भाग के नेत्र रोगों को जीतता है।

पुनर्नवा रसाञ्जन दुग्धेन कण्डूं क्षौद्रेण नेत्रस्त्रावं च सर्पिषा। पुष्पं तैलेन तिमिरं काञ्जिकेन निशान्धताम् ॥ १००॥ पुनर्नवा जयेदाशु भास्करस्तिमिरं यथा।

पुनर्नवा की जड़ दूध के साथ घिसकर आँख में लगाने से कण्डू (खुजली) को मधु के साथ नेत्रस्राव को, घी के साथ फूली को, तेल के साथ तिमिर को तथा काञ्जी के साथ रतौंधी को उस प्रकार नष्ट करती है, जैसे सूर्य अन्धकार को।

बब्बूल रसक्रिया बब्बूलदलनिःक्वाथो लेहीभूतस्तदञ्जनात् ॥ १०१॥ नेत्रस्त्रावं जयत्येष मधुयुक्तो न संशयः।

बब्बूल के पत्तों का क्वाथ करके उसे छानकर फिर पकायें, जब गाढ़ा हो जायें तो उसमें मधु मिलाकर अञ्जन करें। यह नेत्रस्राव को जीतता है। इसमें कुछ भी सन्देह नही है।

हिज्जल-रसक्रिया हिज्जलस्य फलं घृष्ट्वा पानीये नित्यमञ्जनम् ॥ १०२॥ चक्षुःस्त्रावोपशान्त्यर्थं कार्यमेतन्महौषधम्।

हिज्जल (समुद्रफल) के फल को जल में घिसकर प्रतिदिन अञ्जन करें। यह नेत्रस्राव की शान्ति के लिए महौषध है।

कतक-रसक्रिया कतकस्य फलं घृष्ट्वा मधुना नेत्रमञ्जयेत् ॥ १०३॥ ईषत्कर्पूरसहितं स्मृतं नेत्रप्रसादनम्।

कतक (निर्मली) के फल को घिसकर मधु तथा कपूर मिलाकर अञ्जन करें। इससे नेत्र का प्रसादन (प्रसन्नता) होता है।

शिरोत्पात में रसक्रिया सर्पिः क्षौद्रं चाञ्जनं स्याच्छिरोत्पातस्य शान्तये ॥ १०४॥

शिरोत्पात (आँख में जो लाल-लाल सिरायें दिखलायी पड़ती हैं) की शान्ति के लिये घी तथा मधु का अञ्जन लगाना चाहिये।

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त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 287


[स्तम्भ १]

कृष्णसर्प वसाञ्जन कृष्णसर्पवसा शङ्खः कतकात्फलमञ्जनम्। रसक्रियेयमचिरादन्धानां दर्शनप्रदा।। 105 ।। शंखनाभि, निर्मली के बीज तथा अञ्जन (कालासुरमा) को भली-भाँति पीसकर काल साँप की वसा में मिला दें। यह अञ्जन अन्धों को भी शीघ्र ही दर्शन-शक्ति प्रदान करता है। वक्तव्य—शंखनाभि तथा अञ्जन को अलग अलग पीस लें और निर्मली के बीजों को कूटकर तथा जल डालकर पृथक् से पीसना चाहिये। इसे पीसने में अधिक परिश्रम लगता है। इन सबका साँप की चर्बी में मिला लें। सर्पवसा सपेरों से मिल जाती है।

लेखनाञ्जन दक्षाण्डत्वक्शिलाकाचशङ्खचन्दनसैन्धवैः । द्रव्यैरञ्जनयोगोऽयं पुष्पार्मादिविलेखनः ।। 106 ।। मुरगी के अण्डों के छिलके, मैनसिल, काँच, शंख, लाल चन्दन तथा सेंधा नमक इन द्रव्यों का अञ्जनयोग (अञ्जन लगाने का निरन्तर अभ्यास), पुष्प (फूल) तथा अर्म आदि को काट देता है। वक्तव्य—काँच को तपाकर निर्मल जल में तब तक बुझाना चाहिये जब तक उसकी चमक नष्ट न हो जाये। इसी काँच के बारीक चूर्ण का अञ्जन में प्रयोग किया जाता है।

कणा-अञ्जन कणा छागयकृन्मध्ये पक्त्वा नेत्रयुगेऽञ्जिता। अचिराद्धन्ति नक्तान्ध्यं तद्वत् सक्षौद्रभूषणम् ।। 107 ।। पिप्पली को बकरे के यकृत् में रखकर पुटपाक विधि से पकायें और फिर घिसकर आँखों में लगायें। यह रतौंधी को शीघ्र ही नष्ट कर देती है। इसी प्रकार मरिच को भी तैयार कर और मधु के साथ मिलाकर लगाना चाहिये। वक्तव्य—उक्त सभी अंजन रसरूप में मिलते हैं। इसके आगे चूर्णरूप अंजन कहे जायेंगे।

चूर्णाञ्जन (लेखन) शाणार्धं मरिचं द्वौ च पिप्पल्यर्णवफेनयोः। शाणार्धं सैन्धवं शाणा नव सौवीरकाञ्जनात् ।। 108 ।। पिष्टं सुसूक्ष्मं चित्रायां चूर्णाञ्जनमिदं शुभम्। कण्डूकाचकफार्तानां मलानां च विशोधनम् ।। 109 ।। मरिच चूर्ण दो माशा, पीपल तथा समुद्रफेन आठ-आठ माशा, सेंधा नमक, दो माशा तथा सफेद सुरमा छत्तीस माशा


[स्तम्भ २]

इन द्रव्यों को चित्रा नक्षत्र में अत्यन्त सूक्ष्म पीसना चाहिये। यह उत्तम चूर्ण अञ्जन है। यह खुजली, काच तथा कफजनित विकारों तथा आँखों के मल (काचड़) को शुद्ध करता है।

चूर्णाञ्जन (रोपण) शिलायां रसकं पिष्ट्वा सम्यगा प्लाव्‍य वारिणा। गृह्णीयात् तज्जलं सर्वं यजेच्चूर्णमधोगतम् ।। 110 ।। शुष्कं च तज्जलं सर्वं पर्पटीसन्निभं भवेत्। विचूर्ण्य भावयेत् सम्यक् त्रिवेलं त्रिफलारसैः ।। 111 ।। कर्पूरस्य रजस्तत्र दशमांशेन निक्षिपेत्। अञ्जयेन्नयने तेन सर्वदोषहरं हि तत् ।। 112 ।। सर्वरोगहरं चूर्णं चक्षुषोः सुखकारि च। खपरिया को शिला (खरल)पर पीसकर और जल में घोलकर रख दें, जब जल नितर जाये तो सावधानी से उसको ले लें और नीचे बैठे हुये चूर्ण को फेंक दें, फिर उस जल को धूप में सुखा लें। जल के सूख जाने पर पपड़ी जैसा पदार्थ उपलब्ध होगा, इसको खरल में डालकर और पीसकर त्रिफला के स्वरस की तीन भावना दें, अन्त में उक्त द्रव्य का दसवाँ भाग कपूर मिलाकर रख लें। इसको आँख में लगाने से यह सभी प्रकार के नेत्र दोषों तथा रोगों को हरता है। यह आँखों के लिए सुखदायक है। वक्तव्य—खपरिया को पीसकर पानी में डाल दें। उसका घुलनशील भाग पीना में घुल जाता है। पानी के सूखने पर वही पर्पटी जैसा प्राप्त होता है।

चूर्णाञ्जन (प्रसादन) अग्नितप्तं हि सौवीरं निषिञ्चेत् त्रिफलारसैः।। 113 ।। सप्तवेलं तथा स्तन्यैः स्त्रीणां सिक्तं विचूर्णितम्। अञ्जयेत् तेन नयने प्रत्यहं चक्षुषोर्हितम् ।। 114 ।। सर्वानक्षिविकारांस्तु हन्यादेतन्न संशयः। सौवीराञ्जन (सफेद सुरमा) को अग्नि में तपाकर त्रिफला के स्वरस में तथा स्त्री के दूध में सात-सात बार बुझायें और फिर पीस लें। इसको प्रतिदिन नेत्रों में लगायें। यह आँख के सभी विकारों को नष्ट कर देता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

शलाका-निर्माण-विधि त्रिफलाभृङ्गशुण्ठीनां रसैस्तद्वच्च सर्पिषा ।। 115 ।। गोमूत्रमध्वजाक्षीरैः सिक्तो नागः प्रतापितः। तच्छलाकाऽञ्जन्त्येन सर्वानेत्रभवान् गदान् ।। 116 ।।

288 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे सीसा धातु को पिघला कर त्रिफला, भाँगरा तथा सौंठ के | जमालगोटा की मज्जा (मीगी) को नींबू के रस को स्वरस में बुझायें और इसी प्रकार घी, गोमूत्र, मधु तथा बकरी | इक्कीस भावना दें और निरन्तर पीसते रहें, फिर इसकी बत्ती के दूध में बुझायें। सीसे की यह शलाका (सलाई) नेत्रों में | बना लें। इस बत्ती को मनुष्य की लार या थूक में घिसकर होने वाल सभी रोगों को अवश्य हरती है। | आँख में लगायें। यह साँप के विष को जीतकर मनुष्य को वक्तव्य-सभी प्रकार के सुरमे तथा अंजन आदि उक्त | पुनः जीवित कर देता है। शीशे की शलाका द्वारा लगाये जाते हैं और शुद्ध करके बनायी | वक्तव्य-यह अञ्जन विशेष करके सर्प द्वारा डसे हुये गयी सीसा की सलाई का प्रयोग भी चक्षुष्य होता है। | व्यक्ति को सचेत कर प्रयुक्त किया जाता है। इससे प्रत्यञ्जन-विधि | आश्चर्यजनक लाभ होते देखा गया है। गतदोषमपेताश्रु सम्पश्यन् सम्यगम्भसा। | नेत्र-प्रसादन-विधि प्रक्षाल्याक्षि यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः ।। 117 ।। | भुक्त्वा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुषोर्दीयते यदि। न वाऽनिर्गतदोषेऽक्षिण धावनं सम्प्रयोजयेत्। | जाता रोगा विनश्यन्ति तिमिराणि तथैव च ।। 123 ।। प्रत्यञ्जनं तीक्ष्णतप्ते नेत्रे चूर्णं प्रसादनम् ।। 118 ।। | भोजन करने के पश्चात् दोनों हाथों को परस्पर घिसकर जब दोष या उपद्रव शान्त हो जाये, आँसू बन्द हो जायें | यदि प्रतिदिन आँखों को मला जायें तो उत्पन्न हुये नेत्र रोग और भली-भाँति देखने लग जायें तब जल से नेत्रों को धोकर | तथा तिमिर रोग नष्ट हो जाते हैं। दोषों के अनुसार प्रत्यञ्जन का प्रयोग करें। जब तक दोष | नेत्र-सिंचन-विधि शान्त न हो जाये तब तक धावन (आँख धोना) का प्रयोग न | शीताम्बुपूरितमुखः प्रतिवासरं यः करें। तीक्ष्ण औषधियों से तपे हुये नेत्र में प्रसादन (नेत्र को | कालत्रयेण नयनद्वितयं जलेन। स्वच्छ करने वाले) अञ्जन का प्रयोग करें। | आसिञ्चति ध्रुवमसौ न कदाचिदक्षि- वक्तव्य-जिसका प्रतिदिन नेत्रों में प्रयोग किया जाता है | रोगव्यथाविधुरतां भजते मनुष्यः ।। 124 ।। और जो प्रतिदिन आँखों को स्वस्थ रखने के लिए प्रयुक्त किया | शीतल जल से मुख को भरकर जो मनुष्य प्रतिदिन तीन जाता है, उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं। विशेष देखें-सु०उ०अ० 18। | बार (प्रातः, दोपहर तथा सायंकाल) दोनों आँखों को जल नयनामृताञ्जन | (शीतल जल) से सींचता है, वह अवश्यमेव कभी भी आँखों शुद्धे नागे दुते तुल्यं शुद्धं सूतं विनिक्षिपेत्। | के रोगों की व्यथा (पीड़ा) से व्याकुलता को प्राप्त नहीं कृष्णाञ्जनं तयोस्तुल्यं सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ।। 119 ।। | होता। दशमांशेन कर्पूरं तस्मिंश्चूर्णे प्रदापयेत्। | नेत्र-रक्षा का महत्त्व एतत् प्रत्यञ्जनं नेत्रगदजिन्नयनामृतम् ।। 120 ।। | चक्षूरक्षायां सर्वकालं मनुष्यै- शुद्ध सीसा धातु को पिघलायें और तत्काल उसमें समभाग | र्यत्नः कर्तव्यो जीविते यावदिच्छा। शुद्ध पारद डाल दें तथा उसका हिलाकर या घोलकर खरल में | व्यर्थो लोकोऽयं तुल्यरात्रिन्दिवानां डाल दें (उसे दो तीन घण्टे तक उसे भली-भाँति घोटें) उसके | पुंसामन्धानां विद्यमानेऽपि वित्ते ।। 125 ।। बाद दोनों के समान भाग में कालासुरमा डालकर देर तक | जब तक जीवित रहने की इच्छा हो तब तक मनुष्यों को पीसें। अत्यन्त सूक्ष्म हो जाने पर सबकी अपेक्षा दसवाँ भाग | नेत्रों की रक्षा का सर्वदा यत्न करते रहना चाहिये, क्योंकि उसमें कपूर मिला दे। यह प्रत्यञ्जन नेत्र के सभी विकारों को | अन्धे मनुष्यों के लिये तो रात-दिन समान होता है। ऐसे लोगों जीतता है। | लिये धन रहने पर भी सम्पूर्ण संसार आँखा के न रहने कारण सर्पविषनाशक अञ्जन | व्यर्थ होता है। जयपालभवां मज्जां भावयेन्निम्बुकद्रवैः। | ग्रन्थकार की प्रार्थना एकविंशतिवेलं तत् ततो वर्तिं प्रकल्पयेत् ।। 121 ।। | आयुर्वेदसमुद्रस्य गूढार्थमणिसञ्चयम्। मनुष्यलालया घृष्ट्वा ततो नेत्रे तयाऽञ्जयेत्। | ज्ञात्वा कैश्चिद् बुधैस्तैस्तु कृता विविधसंहिताः ।। 126 ।। सर्पदष्टविषं जित्वा सञ्जीवयति मानवम् ।। 122 ।। | किञ्चिदर्थं ततो नीत्वा कृतेयं संहिता मया। | कृपाकटाक्षमिक्षेपमस्यां कुर्वन्तु साधवः ।। 127 ।।

त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 289 [वाम स्तम्भ] आयुर्वेद सागर के गूढ़ अर्थ (विषयरूपी) मणियों के सञ्चय (खजाने) को कुछ विद्वानों ने जाना या समझा है। तदनुसार उन्होंने अनेक संहितायें भी रची हैं। उन संहिताओं (चरक, सुश्रुत आदि) में से कुछ अर्थ (विषय) को लेकर मैं (शार्ङ्गधराचार्य) ने यह संहिता बनायी है। सज्जन लोग इस पर सदैव कृपा-दृष्टि डालते रहें। शुभकामना विविधगदार्तिदरिद्रनाशनं या हरिरमणीव करोति योगरत्नैः। विलसतु शार्ङ्गधरस्य संहिता सा कविहृदयेषु सरोजनिर्मलेषु।।128।। जो (संहिता) योगरूपी रत्नों द्वारा हरिरमणी (लक्ष्मी) के समान अनेक प्रकार के रोगों की पीड़ारूपी दरिद्रता का नाश करती है शार्ङ्गधराचार्य द्वारा रचित वह संहिता कवियों तथा कविराजों के कमल के समान निर्मल हृदयों में सदैव विलास करती रहे। ग्रन्थ की उपयोगिता अल्पायुषामल्पधियामिदानीं कृतं समस्तश्रुतिपाठशक्त्या। तदत्र युक्तं प्रतिबीजमात्र- मभ्यस्यतामात्महितं प्रयत्नात्।।129।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे नेत्रप्रसादनविधिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः।।13।। आजकल छोटी आयु तथा छोटी बुद्धि वाले मनुष्य सम्पूर्ण आयुर्वेद के ग्रन्थो को पढ़ने की शक्ति नहीं रखते। इसलिये मैं (शार्ङ्गधराचार्य) ने इस संहिता में आयुर्वेद के बीज (मौलिक भाव) लिख दिये हैं। अतः आप सब अपने लाभ के लिये परिश्रमपूर्वक इसका अभ्यास करें। वक्तव्य-चिकित्सक को चिकित्सा काल में सब प्रकार से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं, इसीलिए कहा गया है-'चिकित्सितात् पुण्यतमं न किञ्चिदपि शुश्रुमः'। सु० क०अ० 8.142। इसमें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि परहित के साथ साथ इससे अपना हित भी इससे हो जाता है, क्योंकि चिकित्सक सर्वदा यही चाहता है-'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः'। [दक्षिण स्तम्भ] प्रतिसंस्कर्ता का निवेदन षड्विंशतिः पद्यशतानि पूर्वं प्रतिश्रुतं शार्ङ्गधरेण यत् सा। सङ्ख्या क्वचित् संस्करणेऽद्य पूर्णा नाऽऽलोक्यते तत्प्रदुनोति चित्तम्।।1।। आचार्य शार्ङ्गधर ने अपनी इस संहिता के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा की थी, कि इस ग्रन्थ की श्लोक संख्या छब्बीस सौ है। परन्तु आज उपलब्ध किसी भी संस्करण में उक्त संख्या दृष्टिगोचर नहीं होती, जिससे मानसिक कष्ट हो रहा था।।1।। उपेक्षया प्रस्तुतसंहिताया आसं मुहुश्चिन्तितमानसः प्राक्। पूर्तिः कथं स्यादिति तर्कयन् द्वाग्गुरोः कृपा प्रादुरभूत् ततो मे।।2।। इस प्रकार विद्वानों द्वारा शार्ङ्गधरसंहिता की उपेक्षा को देखकर मैं पहले अत्यन्त चिन्तित था और सोचा करता था, कि इसकी पूर्ति कैसे हो; तभी मेरे ऊपर गुरुचरणों की कृपा हुई।।2।। ग्रन्थं समालोक्य सुसूक्ष्मबुद्ध्या संस्मृत्य पूर्वान् भिषगुत्तमांश्च। ग्रन्थानुरोधाद् विषयानुरोधात् पूर्तिमयाऽकारि च तत्त्वदृष्ट्या।।3।। तदनन्तर मैंने सूक्ष्म बुद्धि से ग्रन्थ का अवलोकन किया और प्राचीन आयुर्वेदविद् महर्षियों का स्मरण कर उनके ग्रन्थों का अवलोकन किया। तदनन्तर ग्रन्थ तथा विषय को ध्यान में रखकर तात्त्विक दृष्टि से इसकी पूर्ति कर दी।।3।। प्रतिसंस्कारमासाद्य पूर्णेयं कृतिरुत्तमा। रोगिणां रोगनाशाय कल्पतां भिषजां मुदे।।4।। मेरे द्वारा प्रतिसंस्कृत यह उत्तम कृति रोगियों के रोगों का नाश करे और विद्वान् चिकित्सकों को आनन्द प्रदान करे।।4।। पुरा विकृतिमापन्ना श्रीशार्ङ्गधरसंहिता। अधुना संस्कृता श्रीमद् ब्रह्मानन्दत्रिपाठिना।।5।। इसके पहले यह शार्ङ्गधरसंहिता खण्डित (अपूर्ण) थी। अब श्री ब्रह्मानन्द त्रिपाठी ने इसका प्रतिसंस्कार कर इसे पूर्ण कर दिया है।।5।। [अन्तिम पुष्पिका] इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का तेरहवाँ अध्याय समाप्त।। 13 ।। उत्तरखण्ड समाप्त-शार्ङ्गधरसंहिता समाप्त।

अञ्जननिदानम्

।।श्रीः।। महर्षि-अग्निवेशप्रणीतम् अञ्जननिदानम् अबोधतिमिरच्छन्नचक्षुषां भिषजां कृते। | दोषोऽजीर्णाज्ज्वरं कुर्यात् क्षिप्त्वाऽग्निं कोष्ठतस्त्वचि। सूक्ष्मं करोत्यग्निवेशो ग्रन्थमञ्जनमाख्यया।। 1।। | सोऽष्टधा तैः पृथग्द्वन्द्वसर्वैरागन्तुजोऽपि च।। 10।। दोषरोषो रुजां हेतुस्तत्प्रकोपे तु कारणम्। | जृम्भाऽङ्गमर्दावरतिरुग्दाहौ गौरवारुची। प्रत्येकं हीनमिथ्यातिथयोगः काला णाम्।। 2।। | पृथग् ज्वराणां प्राग्रूपं द्वित्रिजे द्वित्रिलक्षणम्।। 11।। कटुतिक्तकषायपयोदहतिश्रमरूक्षहिमान्नभयानशनैः । | कम्पः कण्ठोष्ठविट्शोषोऽक्षवो मूर्द्धोदराङ्गरुक्। स्मरजागरशुक्तरणास्रगमैरपि कुप्यति वेगवधैरनिलः ।। 3।। | वैषम्योऽस्वप्नवैरस्यं जृम्भा वातज्वराकृतिः।। 12।। शिरःशङ्खभ्रूहृत्त्रिकविटपसन्ध्यस्थिकटिरुग् | पीतता दाहतृट्स्वेदो मूर्च्छाऽल्पस्वप्नतिक्तता। विबन्धः पारुष्यं शयनहतिराध्मानचलने। | वमिभ्रमप्रलापाश्च रेकः पित्तज्वराकृतिः।। 13।। कडारा शोणा वा छविसिप कषायोऽस्य च रसः | स्तैमित्योत्क्लेदमाधुर्यं प्रतिश्याऽरुचिगौरवम्। श्रमो रुग्वैषम्यं कुपितमरुतो लक्षणमिदम्।। 4।। | कासालस्ये तृप्तिशौक्ल्यं शैत्यं श्लेष्मज्वराकृतिः।। 14।। तिलशुक्तसुरादधिमीनशरत्- | कण्ठास्यशोषस्तृण्मूर्च्छा दाहोऽस्वप्नो वमिर्भ्रमः। कटुतीक्षणपटूष्णरुडम्लतपैः । | तमः पर्वशिरोरुक् च वातपित्तज्वराकृतिः।। 15।। रतिघस्रनिशाऽर्धविदाहकरैरपि | स्तैमित्यं काससन्तापौ गौरवं पर्वमूर्धरुक्। कुप्यति पित्तमुपोषणतः ।। 5।। | स्वापोऽस्वेदः प्रतिश्यायो वातश्लेष्मज्वराकृतिः।। 16।। भ्रमो दाहो मूर्च्छा मलशिथिलता स्वेददरणं | शीतं दाहो मुहुस्तन्द्रा मोहः कासोऽरुचिश्च तृट्। प्रलापः पीतत्वं मुखनयनविण्मूत्रनखरे। | लिप्ततिक्तास्यता पित्तबलासज्वरलक्षणम्।। 17।। मदस्तृट् तिक्तोष्णाः पदुकटुरसः पाण्डुरहिता | खरा जिह्वाऽक्षिणी भुग्ने स्राविरक्ते तृडस्थिरुक्। द्युतिः पाकश्चेत्याकृतिरुषि पित्तस्य सरुषः ।। 6।। | विकृतेहास्वेदनिद्रा शीतदाहाव्यवस्थितिः।। 18।। दधिदुग्धनवीनजलान्नहिमाध्यशनाम्लपटूपशमाज्यतिलैः। | तन्द्रा प्रलापो मोहाङ्गस्रस्तता कण्ठशूकता। गुरुमत्स्यवसन्तदिवाशयनैर्मधुरैरपि रोषमुपैति कफः।। 7।। | रक्तष्ठीवनमित्यादिः सन्निपातज्वराकृतिः।। 19।। गुरुत्वं स्तैमित्यं श्वयथुचिरकर्तृत्वशयने | अभिन्यासः समस्तैस्तैर्ध्वस्तसर्वैन्द्रियक्रियः। मलाधिक्यं कण्डूरुचिरुपलेपः शिशिरता। | सन्निपातज्वरोऽसाध्यो दोषवृद्ध्याऽग्निहानितः।। 20।। अपक्तिस्तृप्तिश्चास्मृतिरिति बलासस्य सरुषः | सप्तदशाद्वादशाहाद्वानर्वा वृद्धिरस्य तैः। स्फुटं लिङ्गं स्वादुः पटुरपि रसो भा च धवला।। 8।। | तत्तद् द्विगुणघस्रैस्तु तन्मर्यादा स्मृता क्रमात्।। 21।। हेतुप्राग्रूपोपशयाप्तिभिर्हिमामयः । | सन्निपातज्वरस्यादिमध्येऽन्ते कर्णमूलयोः। ज्ञेयो रूपेण चैकेन मुख्यमेतेषु तद्गतः ।। 9।। | शोथोऽसाध्यः कष्टसाध्यः सुखसाध्यः क्रमेण च।। 22।।

[अञ्जननिदानम् | 291]

[अञ्जननिदानम् | 291]


[वाम स्तम्भ]

सन्ततः सततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ । सन्दुष्यास्त्ररसावस्त्रं क्रव्यं मेदोऽस्थि मज्ज च ।। २३ ।। तद्भेदा विषमाः स्युस्ते शीतदाहादयो ज्वराः। सन्तत्या सन्ततस्तिष्ठेत् ते सप्तदशरव्यहान् ।। २४ ।। द्वौ कालौ सततोऽन्येद्युरेकं कुर्यादहर्निशम् । मुक्त्वैकाहं तृतीयोऽथ द्वयहं त्यक्त्वा चतुर्थकः ।। २५ ।। घटीः पञ्चाशदन्येद्युः स्वेऽह्यस्तु तृतीयकः। द्वयहं चतुर्थो व्याप्नोति त्रय एते विपर्ययाः ।। २६ ।। हृद्गास्त्रवमिर्दाहो वैगन्ध्यं चाऽस्थिरुक् क्लमः। शुक्लोत्सर्गश्चेति लिङ्गं क्रमाद्धात्तुगते ज्वरे ।। २७ ।। साध्यावाद्यौ कष्टसाध्यास्तत्परोऽन्यो न सिद्ध्यति । मन्दोऽतिगौरवं स्वेदो ज्वरो नित्यं प्रलेपकः ।। २८ ।। चतुर्धाऽऽगन्तुजः शापाभिचारावेशघातजः। पूर्वयोर्भूरिविस्फोटमोहावावेशजे तु रुट् ।। २९ ।। तत्तद् भूतस्य कामोत्थे ह्रीधीस्वप्नहतिर्ज्वरे। दाहातिसारौ श्वेदोत्थे यथास्वं घातजं वदेत् ।। ३० ।। बहुहेतूपद्रवोऽतिक्षीणधात्विन्द्रियो ज्वरः। असाध्यः शीतलः स्वेदी गात्रान्तर्दाहकृच्च यः ।। ३१ ।। लघुर्गुरुर्निरोमश्च सामः प्राकृतवैकृतौ। बहिरन्तर्वेगिनौ च साध्यासाध्यौ क्रमाज्ज्वरौ ।। ३२ ।। लघुरल्पोपद्रवः स्यादनेकोपद्रवो गुरुः। वर्षाशरद्वसन्तेषु प्राकृतोऽन्यस्तु वैकृतः ।। ३३ ।। हल्लासापाकलालारुक्षत्तन्द्रारुच्यङ्गगौरवैः । वैरस्यालस्यातिसूत्रैः सामोऽन्यस्मान्निरामकः ।। ३४ ।। अन्तर्दाहः प्रलापस्तृट् सन्धिरुग् विड्ग्रहो भ्रमः। श्वासास्वेदौ चिह्न मन्तर्वेगिनोऽन्यस्य चान्यथा ।। ३५ ।। विरेको विड्ग्रहो वा तृट् कासः श्वासोऽङ्गरुग्वमिः। हिक्का मूर्च्छाऽरुचिश्चापि ज्वरस्योपद्रवा दश ।। ३६ ।। अस्वप्नारुच्यरतिस्तृट्स्तम्भीर्याङ्कगौरवम् । यन्त्रणान्नाभिहृन्मध्ये रुक् चाङ्गो धातुपाकिनः ।। ३७ ।। भ्रमातिज्वरतृट्श्वासाः पच्यमानज्वराकृतिः। दोषज्वराङ्गलघुता दोषपाकस्य लक्षणम् ।। ३८ ।। दाहः स्वेदो भ्रमस्तृष्णा कम्पो विड्भिदसंज्ञता। कूजनं चातिवैगन्ध्यमाकृतिर्ज्वरमोक्षणे ।। ३९ ।। देहो लघुर्मुखे पाकः स्वेदः करणसौष्ठवम् । कण्डूः क्षवो बुभुक्षा च विगतज्वरलक्षणम् ।। ४० ।। वृद्धः सविङ्गरसः क्षिप्तवह्निर्वातातिसारितः। अतिसारः स षोढा तैः पृथक् सर्वैः शुचोऽमतः ।। ४१ ।।


[दक्षिण स्तम्भ]

फेनरूक्षारुणं वातात् पित्तात् पीतारुणासितम्। कफात् सान्द्रं श्वेताहमं वर्चः सर्वैस्तु सर्वयुक् ।। ४२ ।। शोचतोऽविट् सविङ् वाऽस्रं बाष्पक्षुद्रोष्मणेरितम्। सृजत्यजीर्णात् तच्चित्रं मुहुर्मुहुः सशब्दरुक् ।। ४३ ।। अतीसारी सृजत्यस्रं पित्तलाहारसेवनात् । अजस्रं विड्वातकफात् प्रवेहेच्चेत्प्रवाहिका ।। ४४ ।। वमिः कृच्छ्रं ज्वरः कासः श्वासस्तृण्मोहशोथरुक् । हिक्काऽरुचिश्चेति लिङ्गं मरणायातिसारिणः ।। ४५ ।। गतेऽतिसारेऽप्यामेन दुष्टा चेद् ग्रहणी मुहुः। वर्चो मुञ्चत्याममेवोच्यतेऽसौ ग्रहणीगदः ।। ४६ ।। कुप्यति ग्रहणी नित्यं दिवा भूयो रुजोऽऽमरुक् । साऽन्या सङ्ग्रहणी नाम्ना याऽऽमं सङ्गृह्य मुञ्चति ।। ४७ ।। शोथाग्निमान्द्यवैवर्ण्यज्वरापाकारुचिक्षयाः । तृड्वीर्यरुग्राध्मानोद्गाराः स्युर्ग्रहणीगदे ।। ४८ ।। पृथक् सर्वैश्चतुर्धाऽसौ तल्लिङ्गमतिसारवत्। विडामं पूत्यप्सु मज्जेत् सद्व्रस्निग्धशब्दरुक् ।। ४९ ।। त्वङ्मांसमेदः सन्दूष्य गुदेऽर्शांस्यङ्कुरान्मलाः । कुर्युः षोढा पृथग् दोषाः सर्वैर्द्वे सहजास्त्रजे ।। ५० ।। शोथाग्निमान्द्याविष्टम्भसक्थिपीडाऽल्पविट्कता । पाण्डुताऽस्रक्षयाबल्याध्मानोद्गारा रुजोऽर्शसाम् ।। ५१ ।। प्रागुक्तदोषचिह्नैस्तु दोषानर्शस्सु लक्षयेत् । त्रिदोषचिह्नं सहजमस्रस्रावि तदस्रजम् ।। ५२ ।। बाह्यमध्यान्त्यवलिजान्येकद्वित्रिमलानि च। तानि साध्यानि कष्टानि न साध्यानि वदेत् क्रमात् ।। ५३ ।। अजीर्णं भुक्तिवैषम्याद्रेको वान्तोऽस्य विड्ग्रहः। स्युर्विष्टब्धविदग्धामाख्यान्यजीर्णानि वै क्रमात् ।। ५४ ।। रसशेषश्चतुर्थं तद्विष्टब्धे शूलविड्ग्रहौ। विदग्धेऽम्लः सधूमश्चोद्गारो ह्याम सा भुक्तवान् ।। ५५ ।। रसशेषेऽन्नविद्वेषः पूर्वत्रिभ्यो विसूचिका। वम्यतीसारतृट्शूलभ्रमोद्वेष्टनतोदनी ।। ५६ ।। मूत्राघातास्त्रज्वरकम्पारतिमोहैर्न सिध्यति । वृद्धातिवृद्धक्षीणैस्तैर्भस्मकोऽत्यशनो गदः ।। ५७ ।। ज्वरो विवर्णता शूलो हृद्रोगः श्वसनं भ्रमः। अन्नद्वेषोऽतिसारश्च सञ्जातकृमिलक्षणम् ।। ५८ ।। अतिव्यवायमद्याम्लदिवास्वप्नमृदादिभिः । पाण्डवः पञ्च तैर्भिन्नैः पञ्चमो मृदः ।। ५९ ।। पाण्डुत्वङ्नेत्रविण्मूत्रनखैः शोथवमिज्वरैः । विण्संज्ञश्वासाग्निमान्द्यैश्च युक्तः स्यात् पाण्डुरोगवान् ।। ६० ।।

292 शार्ङ्गधरसंहिता अन्तःशोथी मध्यकृशो मध्यशोथ्यन्तदुर्बलः । अत्यजीर्णपटुस्निग्धाद्दह्यगर्भकृमिद्रुतैः । किं वा ज्वरातिसारी च पाण्डुरोगी न सिध्यति॥६१॥ दोषैः पृथक् समस्तैश्चाहृद्यैः पञ्चविधा वमिः॥८०॥ पीतत्वङ्‌मूत्रविण्नेत्रबहुपित्तात् तु कामला। श्यामं वातेन पित्तेन पीतं श्वेतं कफेन च। सैव 'वृद्धा कृष्णपीतत्वगादिः कुम्भकामला॥६२॥ सर्वैश्चित्रं वमेद् गर्भाद् बीभत्सादीक्षणादपि॥८१॥ दुष्टं पित्तं विदूष्यास्त्रं सह तेन बहिर्बिलैः। कासः श्वासो ज्वरो हिक्का तृष्णा वैचित्त्यमेव च। ऊर्ध्वं चाधो द्विधा वैति रक्तपित्तं तदुच्यते॥६३॥ हृद्रोगस्तमकश्चैव ज्ञेयाश्छर्देरुपद्रवाः॥८२॥ सश्लेष्मोर्ध्वमधः स्वैरं द्विमार्गं सकफानिलम्। सततं यः पिबेद् वारि न तृप्तिमुपगच्छति। साध्यं याप्यमसाध्यं च रक्तपित्तं क्रमाद् वदेत्॥६४॥ पुनः काङ्क्षति तोयं यस्तं तृष्णाऽर्दितमादिशेत्॥८३॥ ज्वरापाकवमिश्वसतृट्कासाबल्यपाण्डुताः । पित्तं तालुगतं क्रुद्धं सवातं कुरुते तृषाम्। भुक्ते दाहः शिरस्तापो रेकोऽसृक्चास्रपित्ततः॥६५॥ सा सप्तधा पृथक् तैश्च क्षतामक्षयभोजनैः॥८४॥ अतिव्यवायव्यायामव्रणशोकज्वराध्वभिः । शीताद् विवर्धते वातान्न पित्ताज्जाड्यकृत्कफात्। शोषान् कुर्वन्ति ते क्रुद्धा यक्ष्माणं तु कफोल्बणाः॥६६॥ तृट् त्रिलिङ्गाऽऽमजाघातास्रक्षयाभ्यां क्षतोद्भवा॥८५॥ कराङ्घ्रिदाहः पार्श्वार्सरुक्कफास्रवमिज्वरैः। रसक्षयात् सहृत्पीडा पट्वाद्याधिक्यतोऽन्नजा। वैस्वर्यक्षुद्रकश्र्वासकासमस्तकगौरवम् ॥६७॥ मोहज्वरश्वासकासकर्त्री तृष्णा न सिध्यति॥८६॥ शुक्लेक्षणत्वं मांसेच्छा रिरंसा च क्षयाकृतिः। संज्ञास्रोतांसि ते रुद्ध्वा विशन्ति करणानि चेत्। उरःक्षते स्याद्रुक्पूतिकफपूयास्रवान्तियुक्॥६८॥ क्रुद्धपित्तास्तदा मर्त्या मूर्च्छन्ति गतचेतनाः॥८७॥ कासातिसारपार्श्वार्त्तिस्वरभेदारुचिज्वरैः । सप्त मूर्च्छाः पृथक् सर्वैस्तैश्च मद्यविषास्रतः। षड्भिरेभिः क्षयोऽसाध्यः किं वाऽसृक्कसनज्वरैः॥६९॥ दोषवर्णं वियत्पश्यन् दोषैर्मूर्च्छति चासवात्॥८८॥ प्राणः सघोषः सोदानो वक्त्रात् प्रेति यदा सतृट् । असौम्यः सप्रलापोऽथ दाहहृत्कम्पवान्विषात्। स कासः पञ्चधा भिन्नैस्तैः क्षतेन क्षयेण च॥७०॥ पित्तवद्रक्तगन्धेन संन्यासोऽस्तेन्द्रियक्रियः॥८९॥ कासते शुष्कमनिलात् पित्तात् पीतं वमेत् कटु। मद्यं पीतमयुक्त्या तैः कुर्यात् पानात्ययांश्चतुः। कफात् स्वादु कफं चान्त्यावसाध्यावुक्तलक्षणौ॥७१॥ वमिर्मूर्च्छा ज्वरो दाहः प्रलापश्च भ्रमोऽरुचिः॥९०॥ पूर्ववत् कुरुते प्राणो हिक्काः पञ्च गतिक्रमात्। रेकास्वजारतिकफाः पानाजीर्णस्य लक्षणम्। अन्नजाऽऽहारबाहुल्याद्यामिका द्वित्रिवेगिनी॥७२॥ पानोष्मा त्वग्गतो दाहं सपित्तास्रः करोत्यति॥९१॥ हिक्का क्षुद्रा जत्रुमन्दा गम्भीरा नाभिकम्पकृत्। भीशोककामदुष्टान्नः पूज्यदेशावधर्षणैः। कम्पयत्यङ्गमखिलं महत्यन्ते न सिध्यति॥७३॥ मादयन्ति मनोदोषाः स्यादुन्मादस्ततोद्भूताः॥९२॥ अधश्चोर्ध्वं कफो वातो यात्यायाति मुहुर्यदा। अस्थाने हास्यगीताद्यैर्ह्रीधीस्वज्ञविपर्ययैः। कफरुद्धगतिर्विष्षक् तदा श्वासान् करोत्यसौ॥७४॥ रहस्यकथनोद्वेगभ्रमैरुन्मादमादिशेत् ॥९३॥ महोर्ध्वच्छिन्नतमकक्षुद्राख्यान् स्वगतिक्रमात्। दोषैर्व्यस्तैः समस्तैश्च विषशुग्भ्यां स षड्विधः। महंता निःश्वसित्युच्चैरूर्ध्वेनोर्ध्वमधो न तु॥७५॥ दोषाङ्गाः पूर्ववच्छोकभीकामाद्यैस्तु तत्कथः॥९४॥ विच्छिन्नवेगं छिन्नेन तमकेनातिमूर्छकम्। देवदैत्यपिशाचाहिरक्षोगन्धर्वयक्षतः । क्षुद्रेण श्वसनेनाल्पं पूर्वे साध्या न ते त्रयः॥७६॥ पितृतश्च ग्रहैभ्यः स्युरुन्मादाः प्रोक्तलक्षणाः॥९५॥ अत्युच्चभाषणाताद्यैः क्रुद्धैर्दोषैः स्वरामयः। पावित्र्यं देवविद्वेषो नग्नत्वं सर्पवद्गतिः। षोढा पृथक् सद्धस्ते स्यान्मेदसा च क्षयेण च॥७७॥ बहुभुक्त्वं गानदाने श्राद्धं चेति तदाकृतिः॥९६॥ स्वनिदानस्वरूपास्ते न तु साध्यास्त्रयोऽन्तिमाः। कम्पनिद्राफेनवमिद्रुमादिपतनादिभिः । स्वाद्वप्यन्नं मुखे चेन स्वदतेऽसावरोचकः॥७८॥ त्रयोदशेऽब्देऽतीते तु नोन्मादी जातु जीवति॥९७॥ स पञ्चधा पृथक् सर्वैस्तैः परो रुग्भयादिभिः। दोषोद्रेकात् प्रनष्टायां स्मृतौ सत्यामपस्मृतिः। अरोचके मुखं वक्तृदृशं प्राक्तनमन्तिमे॥७९॥ तदाकृदस्तमःप्रवेशदन्तनेत्रादिवैकृतम् ॥९८॥

अञ्जननिदानम् 293

अञ्जननिदानम् 293 चतुर्थाऽसौ पृथक् सर्वैस्तैस्तत्कोपः क्रमादिह। रविपञ्चदशत्रिंशद् दिनेषु सकलेष्वपि ।। 99 ।। अशीतिर्वातजा रोगा भवन्त्याक्षेपाकादयः । अतिप्रसिद्धान् कियतस्तेष्वहं तानिह ब्रुवे ।। 100 ।। आक्षेपको गतिक्षेपात् खल्ली जङ्घोरुपादरुक् । सरुङ्नाभेत्थो ग्रन्थिरष्ठीला रुद्धमूत्रविट् ।। 101 ।। प्रत्यष्ठीलोदरे चेत्सा सपीड़ा तिर्यगुत्थिता। आध्मानं स्याद् यदाऽऽध्मातं साटोपमुदरं सरुक् ।। 102 ।। कफव्याकुलिते वाते प्रत्याध्मानं प्रजायते। विण्मूत्राशयजा पीड़ाऽधोगता तूणिकोच्यते ।। 103 ।। गुदोपस्थोत्थिता रुक् चेद्यात्यूर्ध्वं प्रतितूणिका । वक्रीकरोति वक्त्रार्धं वातश्चेत् सरुगर्दितम् ।। 104 ।। गृध्रसीस्फिक्पायुकटिजानुजङ्घापदव्यथा । क्रोष्टुशीर्षं जानुशोथो विश्वाची भुजयोर्व्यथा ।। 105 ।। खञ्जः स्यान्निग्रहात् सक्थ्नः पङ्गुत्वमुभयोस्तयोः । अत्युद्गारस्त्र्ध्ववातो नष्टवाक्त्वं तु मूकता ।। 106 ।। कलायखञ्जः स भवेत् प्रकामं वेपते तु यः । आमूलमेकबाहोश्चेद्र्यथा स्यादपबाहुकः ।। 107 ।। विवृतं संवृतं वाऽऽस्यं यः कुर्यात् स हनुग्रहः । सर्वाङ्गैकाङ्गरोगौ स्तः सर्वाङ्गैकाङ्गनिग्रहात् ।। 108 ।। मुहुर्मुहुर्नमनमयेन्मोहयेच्चापतन्त्रकः । जिह्वास्तम्भः स येनान्नपानवाक्येष्वनीशता ।। 109 ।। बाह्यायामान्तरायामौ बहिरन्तश्च कर्षणात्। स्नायूनामथ विज्ञेयो व्रणायामोऽरुषा तथा ।। 110 ।। स्थानानामानुरूप्यांश्च लिङ्गैः शेषान् विनिर्दिशेत् । घ्नन्ति वातामया वृद्धाः क्षीणमांसबलानलम् ।। 111 ।। अत्यध्ववाहनविदाह्यन्नादैः सरुषाऽसृजा। युज्यते चेन्मरुद् दुष्टस्तथा स्याद् वातशोणितम् ।। 112 ।। दाहगौरवरुक्तोदकण्डूवैवर्ण्यमण्डलम् । त्वच्युदर्दाङ्गसङ्कोचशोथं वातास्रलक्षणम् ।। 113 ।। वाताधिकेऽतिरुकित्ते दाहो रक्तेऽतिशोणता। कफेऽतिगौरवं चिह्नं द्वित्रिजे द्वित्रिलक्षणम् ।। 114 ।। मोहदाहज्वरास्वञ्पाङ्गु Albera वैकृतम् । मर्मग्रहभ्रमास्फोटा वातस्रोपद्रवा नव ।। 115 ।। युगपत्कुपितावामवातौ स्वीयप्रकोपनैः। आमवातं जनयतः सशोथं सीन्धुरुग्ग्रहम् ।। 116 ।। सर्वाङ्गैकाङ्गसन्धिस्यशोथार्तिगृहगौरवम् ज्वरापाकाग्निमान्द्ये च तृष्णा चामानिलाकृतिः ।। 117 ।। आमवाताधिके वातेऽतिरुग्दाहस्तु पित्ततः । कफात् स्तैमित्यगुरुते सर्वलक्ष्मै त्रिदोषतः ।। 118 ।। जाड्यान्त्रकूजनानाहतृट्छर्दिबहुमूत्रताः । शूलं शयननाशोऽष्टोपद्रवा आमवातजाः ।। 119 ।। एकदेशेऽतिरुक् शूलं शिम्बीधान्यादिसेवनात् । क्रुद्धैः पृथग् द्वन्द्वसर्वैर्दोषैश्चामात्तदष्टधा ।। 120 ।। पित्ते नाभ्यां चलाद्धस्तौ पार्श्वहृत्कुक्षिजं कफात् । द्वित्रिस्थानं द्वित्रिदोषं शूलं चामाशये रसात् ।। 121 ।। वेदनाऽऽनाहमूर्च्छायास्तृट्कृच्छ्रे गौरवारुची। कासः श्वासश्च हिक्का च शूलस्योपद्रवा दश ।। 122 ।। बलासः प्रच्युतः स्थानात् पित्तेन सह मूर्च्छितः । वायुमादाय कुरुते शूलं जीर्यति भोजने ।। 123 ।। वातविण्मूत्रजृम्भाऽश्रुक्षवथोद्गारवमीन्द्रियैः । क्षुत्तृष्णाश्वासनिद्राणां वृत्त्योदावर्तसम्भवः ।। 124 ।। वातस्य रोधादाध्मानमूर्ध्वविट्कं विशोथरुक् । बस्तौ मूत्रस्य जृम्भायाः शिरोरुग्दृग्गुजोज्श्रुणः ।। 125 ।। क्षवथोरिन्द्रियग्लानिरुद्गारस्यानिलार्त्तयः । छर्देः कुष्ठानीन्द्रियत्याश्मरी दृङ् मन्दता क्षुधः ।। 126 ।। तृषोऽतितृष्णा श्वासत्य हृद्रुक् स्वापस्य जृम्भणम्। विड्वान्तिशूलतृड्ग्लानिक्षैणयुक्तं त्यजेदमूम् ।। 127 ।। हृन्नाभ्योरन्तरे ग्रन्थिः सञ्चारी यदि वाऽचलः । वृत्तश्चयोपचयवान् स गुल्मः पञ्चधा मतः ।। 128 ।। तस्य पञ्चविधं स्थानं पार्श्वहृन्नाभिबस्तयः । दोषैर्व्यस्तैः समस्तैश्च स्त्रीणां रक्तेन पञ्चमः ।। 129 ।। जीर्णेऽन्ने वातजः कुप्येत् तस्मिञ्जीर्यति पित्तजः । भुक्ते तु कफजो गुल्मः सर्वदा सर्वदोषजः ।। 130 ।। प्रसवार्त्तवपातानां काले याऽसात्म्यभोजना। वायुस्तद्रक्तमादाय गुल्मं निर्माति पैत्तवत् ।। 131 ।। स्पन्दते पिण्डतो नाङ्गैः सशूलो गर्भचिह्नयुक् । गुल्मोऽसृजश्चिकित्स्योऽसौ मासे तु दशमे गते ।। 132 ।। श्वासशूलपिपासाऽन्नविद्वेषो ग्रन्थिगूढ़ता। जायते दुर्बलत्वं च गुल्मिनो मरणाय वै ।। 133 ।। दूषयित्वा रसं दोषा विगुणा हृदयं गताः । हृदि पीडां प्रकुर्वन्ति हृद्रोगं तं प्रचक्षते ।। 134 ।। स पञ्चधा पृथग्दोषैः समस्तैश्च क्रमेरपि। क्लमः सादो भ्रमः शोषो ज्ञेयास्तेषामुपद्रवाः ।। 135 ।। नालस्य मूले मध्ये वा रुद्धं वाऽग्रे सदाहरुक्। कणशश्चेत् स्रवेन्मूत्रं मूत्रकृच्छ्रं तदुच्यते ।। 136 ।।

294 शार्ङ्गधरसंहिता मूत्रकृच्छ्राण्यष्टदोषाइमरीविट्शल्यशुक्रतः । वातविट्सङ्गदौर्बल्योदरवृद्ध्यग्निमन्दताः । दोषैर्लिङ्गं पृथक्सर्वैः कृच्छ्रे रुग्दाहगौरवम् ।। 137 ।। पच्छेद्वस्तिरुग्दाहाध्मानं सर्वोदराकृतिः ।। 153 ।। द्विधारं मूत्रमश्मर्या विड्क्षोभाद्विङ्विगन्धि तत् । कृष्णपीतार्जुना दोषैः सिराः स्युरुदरे क्रमात् । क्षते हते वा शल्येन कृच्छ्रं स्यान्मूत्रवर्त्मनि ।। 138 ।। दुष्टाम्बुनखविद्लोमार्तवदूषीविषादिभिः ।। 154 ।। तत्र रुद्धे मले शुक्रात् प्राप्तात् कृच्छ्रं परं सरुक् । दूष्योदरं त्रिलिङ्गं स्यान्नाभेरुर्ध्वं चितं सरुक् । वस्तिमेहनरुग्दाहाटोपैः कृच्छ्रं न सिध्यति ।। 139 ।। वामे जीर्णज्वरात् प्लीहा यकृद्दाल्यस्त्रतोऽन्यतः ।। 155 ।। मूत्रादिधृत्या दुष्टेन रुद्ध्वा रुद्ध्वा शनैः शनैः । हृन्नाभिमध्ये निचितं दुष्टं वर्चोऽन्त्रलेपकृत् । मरुतोत्सृज्यते मूत्रं मूत्राघातस्तदा भवेत् ।। 140 ।। वातेन न बहिया॑ति तद्वद्धगुदमार्त्तिकृत् ।। 156 ।। वातो मूत्रगतं शुक्रं कफं वा शोषयेद् यदा । अन्नाद्यागतशल्येन भिन्नमन्त्रे जलं गुदात् । तदाऽश्मरी स्यात् क्रमशो गोपित्तेष्विव रोचना ।। 141 ।। स्रवेन्नाभेरधोवृद्धं परिस्राव्युदरं हि तत् ।। 157 ।। रुङ्नाभिसीवनीवस्तिमूर्द्धिनगोमेदकोपमम् । स्नेहपानाद्गुमेरेकादत्यम्बु पिबतो हिमम् । मूत्रकृच्छ्रं शीर्णधारं ज्वरश्चाश्मरिलक्षणम् ।। 142 ।। अम्बुपूर्णदृतिप्रख्यमधोनाभेदकोदरम् ।। 158 ।। बालानां सा पृथग् दोषैर्नृणां शुक्रभवाऽश्मरी । पक्षाद् बद्धगुदं तूर्ध्वं सर्वं जातोदकं तथा । नाभ्यण्डशोथरुग्बद्धमूत्रात् त्वनया मृतिः ।। 143 ।। प्रायो भवत्यभावाय छिद्रान्त्रं चोदरं नृणाम् ।। 159 ।। आस्यासुखं स्वजसुखं दधीनि अतिक्षाराम्लदुष्टाम्बुविरुद्धदधिमृद्गरैः । ग्राम्योदकानूपरसाः पयांसि । पञ्चकर्मापचाराद्यैर्जायते श्वयथुर्नृणाम् ।। 160 ।। नवान्नपानं गुडवैकृतं च सिरातनुत्वं वैवर्ण्यं रोमाञ्चोत्सेधगौरवम् । प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ।। 144 ।। ऊष्मानवस्थितत्वं च सर्वं श्वयथुलक्षणम् ।। 161 ।। मूत्रमिश्रं केवलं वा शुक्रं मेहति चेन्मुहुः । नवधा तैः पृथग्द्वन्द्वैः सर्वैर्घताद्विधाच्च सः । स प्रमेहोऽत्र भेदस्तु मूत्रवर्णविभेदतः ।। 145 ।। प्रागुक्तलिङ्गैस्ते ज्ञेया यथाहेतुः स घातजः ।। 162 ।। जलेक्षुसान्द्रासवशुक्रपिष्ट- विषजः सविषप्राणिदंशमूत्रमलादिभिः । लालाशनेः सैकतशीततस्ते । ऊर्ध्वगामी नरं पद्भ्यामधोगामी मुखात् स्त्रियम् । माञ्जिष्ठहारिद्रकनीलकाल- उभयं वस्तिसम्पातः शोथो हन्ति न संशयः ।। 163 ।। क्षारास्रतो मज्जवसेभपौष्यात् ।। 146 ।। छर्दिः श्वासोऽरुचिस्तृष्णा ज्वरोऽतीसार एव च । साध्याः कफोत्था दश पित्तजाः सप्तकोऽयं सदौर्बल्यः शोथोपद्रवसंग्रहः ।। 164 ।। षड् याप्या न साध्याः पवनाच्चतुष्काः । वायुर्वङ्क्षणतः प्राप्य मुष्के मुष्कधराः सिराः । समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्वान्- प्रपीड्य वृद्धिं कुरुते मुष्कयोः स कुरण्डकः ।। 165 ।। महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते ।। 147 ।। दोषास्रमेदोमूत्रान्त्रैः स गदः सप्तधा स्मृतः । दोषप्रकोपचिह्नानि प्रमेहाणामुपद्रवाः । रुग्दाहकण्डूद्दोषेभ्योऽस्रात् कृष्णस्फोटभागशः ।। 166 ।। शरावी कच्छपी पुत्रिन्यलजी च विदारिका ।। 148 ।। मेदोजः कफवन्मूत्रो धृतं तद्यन्त्रणात् सृजेत् । मसूरी विनता जालिन्यपि विद्रधिसार्षपी । आघातादर्मनीत्वा क्षुद्रान्त्रं वङ्क्षणादधः ।। 167 ।। नामानुरूपाः पिडिका दशोमास्तदुपेक्षणात् ।। 149 ।। अन्त्रवृद्धिं करोत्यत्र यन्त्रणात् स्यात् सरुग्ध्वनिः । मेदस्तु वर्धते श्लेष्महेतुभिस्तेन ना भवेत् । वङ्क्षणग्रन्थिमनिलः करोति ब्रध्ननामकम् ।। 168 ।। सर्वकर्मसमर्थोऽतिस्थूलस्फिग्गुदरस्तनः ।। 150 ।। पादशोफः श्लीपदं तैः पृथक् सर्वैः कफोल्बणैः । स्वभावदुर्बलो ह्येकः परो रोगादिदुर्बलः । तत्कर्णकरनेत्रौष्ठशिश्रनासास्वपि क्वचित् ।। 169 ।। स्वभावदुर्बले नास्ति चिकित्साऽस्त्यपरत्र सा ।। 151 ।। प्राग्रूपमरुषः शोथः क्वाप्यङ्गे स्फुटितस्तु सः । मन्दानलेरहितैरन्नैरुदराण्यष्ट तानि तु । रूपं षोढा पृथक् सर्वं दोषास्त्रागन्तुकं च तत् ।। 170 ।। पृथग्दोषैः समस्तैश्च प्लीहबद्धक्षतोदकैः ।। 152 ।।

अञ्जननिदानम् 295

अञ्जननिदानम् 295

विषमं पच्यते वातात् पित्तस्त्वचिरं चिरम्। कफजः पित्तवच्छोथौ रक्तागन्तुसमुद्भवौ ।। 171 ।। मन्दोष्णताऽल्पशोफत्वं काठिन्यं त्वक्सवर्णता। मन्दवेदनता चैतदामशोथस्य लक्षणम् ।। 172 ।। अतिदाहरुजातोदशोषभेदविवर्णताः। तृष्णा ज्वरश्च शोथस्य पच्यमानस्य लक्षणम् ।। 173 ।। कण्डूर्वल्गुद्भवस्तोदो रूक्शान्त्यारुणयनम्रता। यन्त्रणात् पूयचलनं पक्वशोथस्य लक्षणम् ।। 174 ।। सावर्ण्यं रुक्त्वगाढत्वमस्त्रपाकाकृतिः पुनः। रूक्पाकप्यूयास्तैस्तेनारुःपाके तु त्रिदोषरुक् ।। 175 ।। शारीरागन्तुभेदेनारुर्द्विधाऽऽद्यं तु दोषजम्। परं शस्त्रादिकं तत्र दोषै रुग्दाहगौरवम् ।। 176 ।। रक्तस्रावो रक्तजेऽथागन्तुजं तच्च षड्विधम्। छिन्नं भिन्नं क्षतं विद्धं पिच्चितं घृष्टमित्यपि ।। 177 ।। पातान्त्रभेदस्वल्पारुर्वैधचूर्णेन घर्षणात्। सशल्यं यन्त्रणात् सास्रं बुद्बुदं चट्चटध्वनिः ।। 178 ।। तृड्ज्वरोन्मादरुङ्मॊहरेकहिक्काऽपतानकाः। कम्पच्छर्दिश्वासकासपक्षाघातहनुग्रहाः ।। 179 ।। सिरास्तम्भो विसर्पश्चोपद्रवाः षोडशारुषः। सर्वैरेतैर्व्रणोऽसाध्यो याप्योऽर्धैश्च सुखस्तथा ।। 180 ।। भग्नं द्विधा सन्धिकाण्डभेदात् षोढाऽत्र सन्धिजम्। विवर्तितं च उत्क्षिप्तं तिर्यक्क्षिप्तमथोऽपि च ।। 181 ।। विश्लिष्टमुत्पिष्टमिति काण्डे द्वादशधा तु तत्। अस्थिच्छल्लीकर्कटाश्वकर्णचूर्णितपिच्चितम् ।। 182 ।। काण्डभग्नं द्विधाच्छिन्नं वक्रं चाप्यतिपातितम्। मज्जागतं च स्फुटितं यथास्वं लक्षयेदिदम् ।। 183 ।। उपेक्षाणाद्याति दूरं गतो नाडीं च यो व्रणः। नाडीव्रणः स विज्ञेयः सपूयक्लेददाहरुक् ।। 184 ।। गुदस्य द्व्यङ्गुले क्षेत्रे पार्श्वतः पिडिकाऽऽर्त्तिकृत्। भिन्नो भगन्दरो ज्ञेयः स च पञ्चविधो मतः ।। 185 ।। सरुवक्लेदोऽनेकमुखो वातात् स्याच्छतपोनकः। उष्ट्रग्रीवस्तु पित्तेन परिस्रावी कफेन च ।। 186 ।। शम्बूकावर्त्तकोन्मार्गौ तु स्यातां त्रिदोषजौ। शुक्रमूत्रवह्नौ दुःखी न साध्यौ दूरगौ भृशम् ।। 187 ।। गलैकदेशे श्वयथुरपाको गलगण्डकः। मेदोवातकफैस्त्रेधा कण्डूरुग्गौरवं क्रमात् ।। 188 ।। ग्रन्थिः कुत्राप्यपाकोऽङ्गे दोषास्त्रागन्तुमेदसः। स एव पाक्यर्बुदः स्यात् तद्वृत्तीढो मुहुः स्रवन् ।। 189 ।।

गण्डमाला गले नैकैर्गण्डैर्मेदःकफोत्थितैः। चिरपाकिभिरेषैव चिरस्थाऽपचिका भवेत् ।। 190 ।। श्वयथुर्मुष्टिवद्दाहरुगाढ्यो विद्रधिर्द्विधा। बहिरन्तश्च षोढा तैः पृथक्सर्वैरसृकक्षतात् ।। 191 ।। बाह्यः स पक्वोऽरुर्वत्सयादान्तरस्तु करोत्यसौ। बस्तौ कृच्छ्रं क्लोम्युदन्यां पार्श्वबन्धं तु वृक्कयोः ।। 192 ।। पायावपानविड्रोधं कुक्षावनिलजा रुजः। नाभ्यां हिक्कां हृदि श्वासं प्लीह्नि श्वासाप्रवर्त्तनम् ।। 193 ।। यकृत्यजस्रं कसनं वङ्क्षणे तु कटिग्रहम्। स पक्वो वामयेदूर्ध्वं नाभेः सञ्चारयेदधः ।। 194 ।। नाद्यः साध्यश्च मर्मोत्थो विद्रधिर्भूर्युपद्रवः। विद्रधिः स्त्रीस्तने रक्तः शोथरुग्दाहपाककृत् ।। 195 ।। विरुद्धाहारदुष्कर्मपञ्चकर्मापचारतः। दुष्टस्त्रीमद्यमांसाम्बुसेवाह्यैः कुष्ठसम्भवः ।। 196 ।। कपालाद्युद्भवो रक्तदुष्टिरेन्द्रियवैकृतम्। पाङ्गुल्ल्याबल्यकौण्यं च महाकुष्ठाकृतिश्चिरात् ।। 197 ।। कपालं वातवद्रूक्षं पित्तादौदुम्बरं च तत्। कफात्सितं मण्डलं तैर्गुञ्जावत् काकणं सरुक् ।। 198 ।। वातपित्तादृक्षजिह्वं सकम्पमरुणासितम्। कफपित्तात् पुण्डरीकं पुण्डरीकदलोपमम् ।। 199 ।। दद्रूः कण्डूत्थपिडिकायुक् सरन् मण्डलात् ततः। सप्तैतानि महाकुष्ठानीभचर्मेभचर्मवत् ।। 200 ।। किणवत्किटिभं चर्मदलं तु दरणात् त्वचः। पामा पाण्योः कण्ड्डुरुची विचर्चिः सर्वजस्तु तैः ।। 201 ।। तैर्मैद्रूपार्श्वजैः कच्छूः पाददारैर्विपादिका। सिध्मोध्वर्देहे कषणाद् दाल्यलाबूप्रसूनवत् ।। 202 ।। शतारुरुत्पारुभिः स्यादलसं शोणमण्डलम्। एककुष्ठं मत्स्यखण्डोपमं शिवत्रं ततः सितम् ।। 203 ।। हस्तदन्तनखाघातयोनिदोषादिभिर्मलाः। पृथक्सर्वैर्व्रणान् कुर्युर्लिङ्गे वर्त्ति च पञ्चमीम् ।। 204 ।। अस्थिशोथरुजो दाहः सन्धिग्रहमस्रूंषि च। केशलोमप्रपातश्च वैवर्ण्यं चोपदर्शत् ।। 205 ।। वरटीदष्टवच्छोथाः कण्डूच्छर्दिज्वरप्रदाः। शीतपित्तनिमित्ताः स्युरुदर्दा वपुषो बहिः ।। 206 ।। अविपाकक्लमोत्क्लेदतिक्ताम्लोद्गारिगौरवैः। हृत्कण्ठदाहरुचिभिरम्लपित्तं वदेद् भिषक् ।। 207 ।। अतिदाहरुजारागस्रावारुच्यरतिप्रदाः। क्षुद्रव्रणविसर्पाद्याः स सर्वतः परिसर्पणात् ।। 208 ।।

296 शार्ङ्गधरसंहिता

ज्वरच्छर्दिभ्रमाद्याः स्युर्बालानां तु मसूरिकाः। धूलीधूमाक॑शाकाम्लतीक्ष्णस्त्रीजागरादिभिः । पद्धस्ततलदृश्यास्ता न सिध्यन्त्यनलक्षयात् ।।२०९।। गण्डूषाञ्जननस्यादिहीनानां स्युर्दृगामयाः ।।२२३।। अग्निदाहादिव स्फोटा विस्फोटाः स्युर्महारुजः। तिमिरं पटलं काचमभिष्यन्दोऽधिमन्थकः। पृथग्द्वन्द्वसमस्तैस्तै्रस्ताश्चैते विषोपमाः ।।२१०।। पक्ष्मकोपो व्रणकोपश्चेत्याद्या नयनामयाः ।।२२४।। ये गदा महतामुक्ताः स्युस्त एवार्भकेष्वपि। नेत्रकोपः पृथक्सर्वैस्तै्रस्ताच्चान्येहेतुतः। किन्तु देहाग्निदोषादेर्लाघवाल्लघवः परम् ।।२११।। रुग्श्रुरागशोथाद्यैरामः पक्वस्ततोऽन्यथा ।।२२५।। क्षीरालसः पृथग्दोषैर्लालास्त्रावोऽतिरोदनम्। अव्यक्तं तिमिरी चैकमनेकं पटलीक्षते। गुदपाकास्यपाकौ च दन्तोद्भेदादयः परे ।।२१२।। काची सूक्ष्माम्बरच्छन्नदृगिवोर्ध्वमधो न तु ।।२२६।। ऊर्ध्वं पश्येद्दतः खादेत् क्षिपेद् गात्रं वमेत् पयः। अकालपलितं पीडा सूर्यावर्त्तार्द्धभेदकाः। जागर्ति रोदिति श्यावो ग्रहग्रस्तोऽर्भकः कृशः ।।२१३।। इन्द्रलुप्तं केशपात इत्याद्याः स्युः शिरोगदाः ।।२२७।। स्त्रावो गर्भस्थाचतुर्थान्मासात् पातस्ततः परम्। करोति विगुणो वायुर्मलं सङ्गृह्य कर्णयोः। स मूढगर्भो यः स्थानाच्युतो न बहिरापतेत् ।।२१४।। सकफः पाकबाधिर्यशूलस्त्रावादिकान् गदान् ।।२२८।। गर्भास्पन्दो धीविनाशो मृते गर्भेऽपचारतः। अर्शोऽस्त्रस्त्रावपिडिकाः पूयस्त्रावश्च पीनसः। विरेकशैत्यतृट्कम्पज्वराद्यैः सा न सिध्यति ।।२१५।। प्रतिश्यायश्छल्लिका चेत्याद्या नासाऽऽमयाः स्मृताः ।।२२९।। अङ्गमर्दो ज्वरः कम्पः पिपासा गुरुगात्रता। सरक्तः कुरुते श्लेष्मा दन्तार्शो दन्तचालनम्। दाहः शोथातिसारौ च सूतिकारोगलक्षणम् ।।२१६।। दौर्गन्ध्यपिडिकापाकमूकादींश्च गदान्मुखे ।।२३०।। अस्रस्रुतिः स्यात् प्रदरं योनिः स्त्रीणामनार्तवा। जिह्वामौढ्यशिरोदाहभ्रमोन्मादारुचिज्वरैः । रुगङ्गमर्ददौर्बल्यक्षुत्तृट्पाण्डुत्वदाहकृत् ।।२१७।। श्वासहिक्कादन्तहर्षैर्जानीयात् स्थावरं विषम् ।।२३१।। तच्चतुर्धा पृथक्सर्वैर्दोषैः स्यादार्त्तवं पुनः। दंशवैवर्ण्यशोथाभ्यां सेक्रेकतमोभ्रमैः। शशास्रतुल्यं यच्चोक्तं धौतं वासो न रञ्जयेत् ।।२१८।। निद्राऽक्षिरागरसनामौढ्यैश्चाहिविषं वदेत् ।।२३२।। अतिव्यवायशीलो यो न च वाजीक्रियारतः। विद्धं तु वृश्चिकेनाङ्गं ज्वलदङ्गारभागिव। ध्वजभङ्गमवाप्नोति स शुक्रक्षयहेतुकम् ।।२१९।। सदाहरुङ्मोहमन्दद् यथास्वं विषमुन्नयेत् ।।२३३।। अल्पशीतोष्णतेजःक्षुत्पिपासाश्रमरुट्सहः । अतिविस्तरपुस्तकपाठभया- पिडिकासन्थिशिथिलो हीनबुद्धिबलेन्द्रियः ।।२२०।। दतिह्रस्वतया धृतभूरिधियाम्। पाण्डुरोऽल्परतिस्तोय्तुल्यरेताः श्लथध्वजः । नयनानलदृङ्मितपद्यकृतं भिषजामि- मन्दवह्निश्च दीनश्च क्षीणशुक्रो नरो मतः ।।२२१।। दमञ्जनमस्तु मुदे ।।२३४।। असाध्यं सहजं क्लैब्यं मर्मच्छेदाच्च यद्भवेत्। चकार चतुरोऽञ्जनं तदिदमग्निवेशोऽञ्जनं साध्यानामितरेषां च कार्यो वाजीक्रियाक्रमः ।।२२२।। परोपकृतये हितं परिमितं रुजां ज्ञापकम्। ततः समुदितैस्तदा सुकृतराशिभिस्तूष्यतां तुषारगिरिकन्यकापरिवृढः सयोभित्सुतः ।।२३५।।

।। इति श्रीमदग्निवेशमहर्षिविरचितमञ्जननिदानं समाप्तम् ।।

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रोगपरक-सूची

1. अंगपाक रोगचित्रकादि चूर्ण 1257. अजीर्ण रोग
रक्तस्राव-विधि274वडवानल चूर्ण 125निदिग्धिकादि क्वाथ 94
2. अण्डवृद्धि रोगयवानीखाण्डव चूर्ण 126नारायण चूर्ण 123
चन्द्रप्रभा बटी133सितोपलादि चूर्ण 127हपुषादि चूर्ण 124
नारायण तैल153लवणभास्कर चूर्ण 127सञ्जीवनी बटी 132
निरूहण वस्ति237चित्रकादि चूर्ण 125मण्डूर बटक 133
वमन221–224सूरण-बटक 132अग्नितुण्डीबटी रस 204
3. अन्त्रवृद्धि रोगपिप्पली मोदक 133लोकनाथ रस 192
रास्नापञ्चक क्वाथ97चन्द्रप्रभा बटी 133अजीर्णकण्टक रस 204
रास्नासप्तक क्वाथ97योगराज गुग्गुलु 135कनकसुन्दर रस 205
( कुरंड रोग )कैशोर गुग्गुलु 1368. अतिसार रोग
अंडवृद्धिहर लेप267कूष्माण्डावलेह 141बब्बूलादि स्वरस 86
4. अंसरोगपिप्पल्यादि घृत 146कुटज पुटपाक 88
बृंहण नस्य247पानीयकल्याणक घृत 148चावल का धोवन 88
5. अग्निदग्ध रोगकुमार्यासव 167अरलूत्वक् पुटपाक 88
अग्निदग्धहर लेप267लोहासव 168तित्तिर पुटपाक 88
6. अग्निविकार रोगकुटजारिष्ट 169कुटजाष्टक क्वाथ 95
हपुषादि चूर्ण124दशमूलारिष्ट 171ह्रीबेरादि क्वाथ 96
( मन्दाग्नि रोग )लोकनाथ रस 192धातक्यादि क्वाथ 96
अरलूत्वक् पुटपाक88हेमगर्भपोट्टली रस 195इन्द्रयवादि क्वाथ 96
गुडूच्यादिगण क्वाथ91अग्नितुण्डीवटी रस 204अंकोट कल्क 114
त्रिफला चूर्ण117लोह रसायन 208लघुगङ्गाधर चूर्ण 121
हरीतक्यादि चूर्ण121वमन 221–224वृद्धगङ्गाधर चूर्ण 121
महाखाण्डव चूर्ण123अभयादि मोदक 227कपित्थाष्टक चूर्ण 121
दाडिमाष्टक चूर्ण121दीपन-वस्ति 240दाडिमाष्टक चूर्ण 121
लवङ्गादि चूर्ण122( भस्मक रोग )लवंगादि चूर्ण 122
मरिचादि चूर्ण121वसास्नेहपान 213मरिचादि चूर्ण 121
नारायण चूर्ण123( दीप्ताग्नि रोग )यवानीखांडव चूर्ण 126
लवणत्रितयादि चूर्ण124मज्जा स्नेहपान 213तालीसादि चूर्ण 127

298 शार्ङ्गधरसंहिता

कुटजावलेह 142 | पञ्चकोल चूर्ण 117 | महाखांडव चूर्ण 123 कुटजाष्टकावलेह 143 | त्रिगन्ध चातुर्जात चूर्ण 118 | नारायण चूर्ण 123 मसूर घृत 147 | कट्फलादि चूर्ण 120 | हपुषादि चूर्ण 124 बब्बूलारिष्ट 170 | बृहत्कट्फलादि चूर्ण 120 | पञ्चसम चूर्ण 124 लोकनाथ रस 192 | दाडिमाष्टक चूर्ण 121 | लवणत्रितयादि चूर्ण 124 हेमगर्भपोट्टली रस 195 | लवंगादि चूर्ण 122 | हिंग्वादि चूर्ण 126 वमन 221-224 | जातीफलादि चूर्ण 122 | यवानीखांडव चूर्ण 126 ( आमातिसार रोग ) | चित्रकादि चूर्ण 125 | लवणभास्कर चूर्ण 127 शुण्ठी पुटपाक 89 | हिंग्वादि चूर्ण 126 | चित्रकादि चूर्ण 125 वत्सकादि क्वाथ 95 | यवानीखांडव चूर्ण 126 | बाहुशाल गुड़ 130 शुण्ठ्यादि चूर्ण 120 | तालीसादि चूर्ण 127 | गुड़ के चार योग 132 हरीतक्यादि चूर्ण 121 | सितोपलादि चूर्ण 127 | वृद्धदारुक मोदक 132 ( त्रिदोषज अतिसार ) | व्योषादि बटी 132 | सूरण पिण्डी 132 आनन्दभैरव रस 196 | चन्द्रप्रभा बटी 133 | सूरण बटक 132 ( रक्तज अतिसार ) | योगराज गुग्गुलु 135 | मण्डूर बटक 133 जम्ब्वादि पत्र-स्वरस 86 | अगस्त्यहरीतकी अवलेह 142 | चन्द्रप्रभा बटी 133 मुस्तकादि प्रमथ्या 104 | कुटजावलेह 142 | कांकायन बटी 134 बदरीमूल कल्क 114 | पिप्पल्यादि घृत 146 | योगराज गुग्गुलु 135 वमन 221-224 | कुमार्यासव 167 | त्रिफला गुग्गुलु 137 9. अपस्मार रोग | लोहासव 168 | कूष्माण्डावलेह 141 द्वितीय रसोन कल्क 113 | रोहीतकारिष्ट 171 | अगस्त्यहरीतकी अवलेह 142 योगराज गुग्गुलु 135 | दशमूलारिष्ट 171 | कुटजावलेह 142 त्रिफला घृत 150 | लोकनाथ रस 192 | कुटजाष्टकावलेह 143 लाक्षादि तैल 152 | मृगांकपोट्टली रस 194 | चाङ्गेरी घृत 146 चन्दनादि तैल 161 | हेमगर्भपोट्टली रस 195 | महापञ्चतिक्त घृत 148 कुमार्यासव 167 | वमन 221-224 | कासीसादि तैल 157 वमन 221-224 | विरेचन 225-229 | उशीरासव 167 विरेचन नस्य 245 | विरेचन नस्य 245 | पिप्पल्यासव 168 10. अम्लपित्त रोग | ( हल्लास = जी मिचलाना ) | लोहासव 168 कुटजावलेह 142 | गुडूच्यादिगण क्वाथ 91 | देवदार्वादि अरिष्ट 169 वसन्तकुसुमाकर रस 198 | 12. अर्बुद ( कैंसर ) रोग | रोहीतकारिष्ट 171 निरूहण वस्ति 237 | चन्द्रप्रभा बटी 133 | दशमूलारिष्ट 171 11. अरोचक रोग | काञ्चनार गुग्गुलु 137 | लोकनाथ रस 192 आर्द्रक-स्वरस 86 | खदिरारिष्ट 170 | अभयादि मोदक 227 गुडूच्यादिगण क्वाथ 91 | वमन 221-224 | पूर्व स्वेदनीय रोगी 216 निदिग्धिकादि क्वाथ 94 | अपचीनाशक लेप ( 2 ) | विरेचन योग्य रोगी 226 वर्द्धमानपिप्पली कल्क 112 | रक्त निर्हरण 272 | ( रक्तार्श = खूनी बवासीर ) आमलकादि चूर्ण 117 | 13. अर्श ( बवासीर ) रोग | अपामार्गबीज कल्क 113 त्र्यूषण चूर्ण 117 | मरिच्यादि चूर्ण 124 | तिल कल्क 114 | | महापञ्चतिक्त घृत 148