शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 316, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें280 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे [बायाँ स्तम्भ] पिण्डिकाविधान पिण्डी कवलिका प्रोक्ता बध्यते पट्टवस्त्रकैः ॥२१॥ नेत्राभिष्यन्दयोग्या सा व्रणेष्वपि निबध्यते । अभिष्यन्देऽधिमन्थे च सञ्जाते श्लेष्मसम्भवे ॥२२॥ स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य शिरस्तीक्ष्णैर्विरेचयेत् । अधिमन्थेषु सर्वेषु ललाटे वेधयेच्छिराम् ॥२३॥ अशान्ते सर्वथा मन्थे भ्रुवोरुपरि दाहयेत् । अभिष्यन्देषु सर्वेषु बध्नीयात् पिण्डिकां बुधः ॥२४॥ पिण्डी तथा कवलिका ये दो नाम पोट्टली के हैं। इसकी विधि यह है-औषधि के चूर्ण की रेशमी कपड़े में बाँधकर 'नेत्राभिष्यन्द' (दुखती आँख) पर प्रयुक्त किया जाता है (इस पोट्टली को गुलाबजल अथवा जल में भिगाकर प्रयोग करते हैं) और यह व्रणों पर भी बाँधी जाती है। कफजनित अभिष्यन्द तथा अधिमन्थ में शिर पर स्नेहन तथा स्वेदन करके तीक्ष्ण द्रव्यों द्वारा (नस्य देकर) शिरोविरेचन करना चाहिये और सभी प्रकार के अधिमन्थों में मस्तक की शिरा का वेध करें। यदि किसी प्रकार भी अधिमन्थ शान्त न हो तो भ्रू (भौंह) के ऊपर दाह क्रिया करे और सब प्रकार के अभिष्यन्दों में पिंडी का प्रयोग करें। वक्तव्य-पिण्डी का प्रयोग अधिमन्थ रोग की सफल चिकित्सा है। देहातों में आज भी चिकित्सक इसका प्रयोग करते हैं। पिण्डी के योग (१) वाताभिष्यन्दशान्त्यर्थं स्निग्धोष्णा पिण्डिका भवेत्। एरण्डपत्रमूलत्वङ्निर्मिता वातनाशिनी ॥२५॥ वातजनित अभिषन्द की शन्ति के लिए स्निग्ध तथा उष्ण द्रव्यों की पिण्डी उपयुक्त होती है और एरण्ड के पत्ते, मूल तथा छाल की बनायी हुई पिण्डी वातजनित अभिष्यन्द को नष्ट कर देती है। पिण्डी के योग (२) पित्ताभिष्यन्दनाशाय धात्रीपिण्डी सुखावहा । महानिम्बफलोद्भूता पिण्डी वा पित्तनाशिनी ॥२६॥ पित्तजनित अभिष्यन्द का नाश करने के लिए आँवलों की पिण्डी सुखद होती है और बकायन के फलों की पिण्डी भी पित्ताभिष्यन्द को नष्ट करती है। पिण्डी के योग (३) शिग्रुपत्रकृता पिण्डी श्लेष्माभिष्यन्दनाशिनी । निम्बपत्रकृता पिण्डी श्लेष्मपित्तहरा भवेत् ॥२७॥ [दायाँ स्तम्भ] सहजन के पत्तों का पिण्डी कफजनित अभिष्यन्द को नष्ट करती है और नीम के पत्तों की पिण्डी कफजनित अभिष्यन्द को हरती है। पिण्डी के योग (४) त्रिफलापिण्डिका प्रोक्ता नाशने श्लेष्मपित्तयोः । पिष्ट्वा काञ्जिकतोयेन घृतभृष्टा च पिण्डिका ॥२८॥ लोध्रस्य हरति क्षिप्रमभिष्यन्दमसृग्भवम् । शुण्ठी निम्बदलैः पिण्डी सुखोष्णा स्वल्पसैन्धवा ॥२९॥ धार्या चक्षुषि संयोगाच्छ्वोथकण्डूव्यथापहा । त्रिफला की पिण्डी कफपित्तजनित अभिष्यन्द को नष्ट करती है और लोध्र को काँजी में पीसकर एवं थोड़े से घी में तलकर बनायी हुई पिण्डी रक्तजनित अभिष्यन्द को शीघ्र ही हरती है। सोंठ तथा नीम के पत्तों में थोड़ा सा नमक मिलाकर तथा सबको पीसकर तथा गर्मकर आँख के ऊपर रखने सेजन, खुजली तथा व्यथा का नाश होता है। वक्तव्य-इन द्रव्यों की पोटली बाँधकर गुलाबजल अथवा जल में भिगोकर उससे बार-बार आँखों को भिगोते रहते हैं। इससे शीघ्र लाभ होता है। विडालक-विधि बिडालको बहिर्लेपो नेत्रे पक्ष्मविवर्जितः ॥३०॥ तस्य मात्रा परिज्ञेया मुखलेपविधानवत् । पक्ष्म (बरौनियों) को छोड़कर नेत्र के बहिर्भाग में वर्मों (पलकों) पर जो लेप किया जाता है, उसका नाम 'बिडालक' है। इसकी मात्रा (मोटाई तथा धारणकाल) मुखलेप के समान ही होती है। विडालक के योग (१) यष्टीगैरिकसिन्धूत्थदार्वाताक्ष्र्यैः समांशकैः ॥३१॥ जलपिष्टैर्बहिर्लेपः सर्वनेत्रामयापहः। मुलेठी, गेरू, सेंधा नमक, दारुहल्दी तथा रसवत को समभाग लेकर और जल में पीसकर आँखों के बाहर (चारों ओर) लेप करने से नेत्रों में होने वाले (अभिष्यन्द आदि) सम्पूर्ण रोगों का नाश हो जाता है। वक्तव्य-इस योग में नेत्र-चिकित्सक कपूर, हरड़ तथा अफीम भी मिला देते हैं। यह दुखती आँखों की उत्तम औषधि है। विडालक के योग (२) रसाञ्जनेन वा लेपः पथ्याविश्वदलैरपि ॥३२॥