शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंभेलसंहिता 'विनोदिनी 'हिन्दीव्याख्या-विमर्श- परिशिष्टादि संवलित श्री अभय कात्यायन भेलसंहिता का प्रस्तुत संस्करण वर्तमान में उपलब्ध विभिन्न संस्करणों के व्यावहारिक पाठ के आधार पर प्रथमतः 'विनोदिनी' हिन्दी व्याख्या एवं विमर्श सहित लिखा गया है। इस ग्रन्थ की प्रमुख विशेषताएँ- मनुष्यों में 'ज्वर' कहे जाने वाले रोग के लिये मनुष्येतर प्राणियों में अन्य संज्ञाओं का प्रयोग है (सूत्रस्थान)। यह विषय चरक तथा सुश्रुत में नहीं है। भेल अपने गुरु पुनर्वसु आत्रेय का नामो-ल्लेख भी कई स्थानों पर करते हैं—'गुरुमेव ब्रवीरूच्यहम' (सूत्र. 5.10), 'यथात्रेयस्य शासनम्' (सिद्धि. 4.28); परन्तु वहीं उन्हें यदि अपने अनुभव में नई जानकारी मिली है तो उन्होंने निःसङ्कोच स्फुट रूप से वह बात भी कह दी है—'सन्निपातोद्भवं ह्येतदहं वक्ष्यामि हेतुभिः' (चि.2.3) 'इति मे निश्चिता मतिः'। (सिद्धि. 1.9)। भेल ने औषधियों के मिश्रणों की मात्रादि के सम्बन्ध में कहा है—'अभुक्त्वामलकं खादेत् भुक्त्वा चापि हरीतकीम्'। परिणामे च भक्तस्य खादेच्चैव विभीतकम्।।' (चि. सू.)। यह बात चरक में नहीं है। भेल ने 'किस समय किस द्रव्य को खाया जाय' इसका कारण भी वहाँ दिया है। इसी प्रकार से भेल ने शा. अ. 4 में आलोचक पित्त के बुद्धि-वैशेषिक तथा चक्षुर्वैशेषिक-ये दो अवान्तर भेद किये हैं; जिनका उल्लेख चरक, काश्यप तथा सुश्रुत में नहीं है। जाठराग्नि के सम्बन्ध में भेल ने जो विवरण दिया है, उसमें नाभि में सूर्यमण्डल का सोममण्डल में होना योगशास्त्र तथा तन्त्र का एक अद्भुत विषय है, वह अन्य संहिताओं में नहीं मिलता है। वहाँ उन्होंने भगवान् पुनर्वसु आत्रेय की सोमसूर्यात्मक जगत् की आवधारणा को विस्तार दिया है। भेल ने विसूची रोगी की चिकित्सा का विस्तार से वर्णन किया है और उसमें उष्ण लवणाम्बु पिलाकर वमन कराने का निर्देश किया है, यह विषय सर्वथा नया है। (चि. 10.63-64) आज से सहस्रों वर्ष पूर्व भेल ने (चि. 8.2) मन (मस्तिष्क) का स्थान शिर में तालु के अन्तर्गत लिखा है— 'शिरस्ताल्वन्तर्गतं सर्वेन्द्रिपरं मनः'। इस प्रकार प्राचीन संहिता ग्रन्थों में भेल संहिता का स्थान महत्त्वपूर्ण है। आशा है यह संस्करण अध्ययन-अध्यापन के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध होगा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation US