भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 356

↠ महत्त्वपूर्ण प्रकाशन ↞ कविराज श्रीगोविन्ददाससेनविरचिता भैषज्यरत्नावली 'सिद्धिप्रदा'-हिन्दीव्याख्योपेता प्रो. सिद्धिनन्दन मिश्र भैषज्यरत्नावली आयुर्वेदीय औषध निर्माण-हेतु सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसे इतना बड़ा सम्मान सम्पूर्ण भारत में प्राप्त हुआ है । रसशास्त्र एवं भैषज्यकल्पना के क्षेत्र में 50 वर्षों से अधिक अनुभवी विद्वान् प्रोफेसर सिद्धिनन्दन मिश्रकृत 'सिद्धिप्रदा' हिन्दी व्याख्या द्वारा 'भैषज्य-रत्नावली' की उपयोगिता और भी अधिक हो गई है । प्रोफेसर मिश्र ने इसमें वर्णित प्रायः सभी योगों का मूल स्रोत ढूँढ निकाला है तथा तत्तद् योगों को किन-किन आचार्यों ने पहली बार उद्धृत किया है-इसका उल्लेख भी मिश्र जी ने अपनी व्याख्या में किया है । इस व्याख्या में औषधि-निर्माण की सरल प्रक्रिया का वर्णन तथा आदेशात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है, जिससे औषधि-निर्माता उस प्रक्रिया को आसानी से समझ सके । इसके अतिरिक्त सभी स्तरों पर सर्वत्र नये मानों (Metric Method Measurement जैसे-किलोग्राम, मिलीलीटर, मिलीमीटर आदि) का प्रयोग किया गया है तथा औषधि-सेवन की मात्रा, अनुपान, औषधि-ग्रन्थ, औषधि- स्वाद, महत्त्वपूर्ण रोगों में उपयोग आदि का भी उल्लेख सभी योगों के साथ दिया गया है । चरकसंहिता 'चरक-चन्द्रिका'-हिन्दीव्याख्या-विशेष वक्तव्य आदि से संवलित व्याख्याकार डॉ. ब्रह्मानन्द त्रिपाठी प्राक्कथन लेखक डॉ. गङ्गासहाय पाण्डेय एवं डॉ. जनार्दन देशपाण्डे सम्प्रति उपलब्ध चरक-संहिता 8 स्थानों तथा 120 अध्यायों में विभक्त है । प्रस्तुत संहिता काय-चिकित्सा का सर्वमान्य ग्रन्थ है । जैसे समस्त संस्कृत-वाङ्मय का आधार वैदिक साहित्य है, ठीक वैसे ही काय-चिकित्सा के क्षेत्र में जितना भी परवर्ती साहित्य लिखा गया है, उन सब का उपजीव्य चरक है । चरकसंहिता के अन्त में ग्रन्थकार की प्रतिज्ञा है—'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्' । इसका अभिप्राय यह है कि काय-चिकित्सा के सम्बन्ध में जो साहित्य व्याख्यान रूप में अथवा सूत्र रूप में इसमें उपलब्ध है, वह अन्यत्र भी प्राप्त हो सकता है, और जो इसमें नहीं हैं, वह अन्यत्र भी सुलभ नहीं है । चरक का यह डिण्डिमघोष तुलनात्मक दृष्टि से सर्वदा देखा जा सकता है । दूसरी विशेषता महर्षि चरक की यह रही है—'पराधिकारे न तु विस्तरोक्तिः' । इन्होंने अपने तन्त्र के अतिरिक्त दूसरे विषय के आचार्यों के क्षेत्र में टाँग अड़ाना पसन्द नहीं किया, अतएव उन्होंने कहा है—'अत्र धान्वन्तरीयाणाम् अधिकारः क्रियाविधौ' । इस प्रकार के आदर्श ग्रन्थ पर भट्टारहरिचन्द्र आदि अनेक स्वनामधन्य मनीषियों ने टीकाएँ लिखकर इसके सहस्रों का उद्घाटन समय-समय पर किया है । इसके पूर्व भी चरक की कतिपय व्याख्याएँ लिखी गयी हैं, वे विषय का बोध भी कराती हैं । चरकसंहिता की चरक-चन्द्रिका टीका के रूप में लेखक का इस दिशा में यह स्तुत्य प्रयास है । इसमें यथासम्भव चरक के रहस्यमय गूढ़ स्थलों का सरस भाषा में आशय स्पष्ट किया गया है । स्थल विशेष पर पर पारिभाषिक शब्दों के अंग्रेजी नाम भी दे दिये गये हैं । आवश्यकतानुसार प्रकरण विशेष पर आधुनिक चिकित्सा-सिद्धान्तों का तुलनात्मक दृष्टि से भी समावेश कर दिया गया है, जिससे पाठकों को विषय को समझने में सुविधा हो । साथ ही कठिन स्थलों को विशेष वक्तव्य तथा टिप्पणियों द्वारा प्राञ्जल किया गया है । प्रथम भाग - ( सूत्र-निदान-विमान-शारीर-इन्द्रियस्थान ) द्वितीय भाग - ( चिकित्सा-कल्प सिद्धिस्थान ) चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन-वाराणसी