भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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।। श्रीः।। श्रीशाङ्ग्र्धरेण प्रणीता शाङ्ग्र्धरसंहिता 'दीपिका' व्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च विराजिता पूर्वखण्डे प्रथमोऽध्यायः परिभाषा

मङ्गलाचरणम् श्रियं स दद्याद् भवतां पुरारिर्यदङ्गतैजःप्रसरे भवानी। विराजते निर्मलचन्द्रिकायां महौषधीव ज्वलिता हिमाद्रौ ॥ 1 ॥ टीकाकर्तुः मङ्गलाचरणम् जयति साम्बशिवः सगणेश्वरः सकलरोगहरः सुखशान्तिदः। चरकसुश्रुतसारसदाशया जयति शार्ङ्गधराभिधसंहिता॥ आयुर्वेदमहाम्भोधेः पारगं छिन्नसंशयम्। लालचन्द्रं गुरुं नत्वा दीपिकां सन्तनोम्यहम्॥ पुर नामक असुर के विनाशक वे भगवान् शंकर आप सभी (प्राणियों) को श्री (कल्याण, मंगल, धन-धान्य) प्रदान करें, जिनकी शारीरिक कान्ति के विस्तार में हिमालय पर्वत पर निर्मल चाँदनी में प्रकाशमान दिव्य औषधी के सदृश भगवती भवानी (पार्वती) विशेष रूप से सुशोभित हो रही हैं। वक्तव्य-मंगलाचरण का प्रयोग पाठकों के कल्याण के लिए करने की प्राचीन परम्परा है। आयुर्वेद का उपदेश प्राणिमात्र के कल्याण के लिए होता है। यहाँ शिव (कल्याण-स्वरूप देव) को पुर नामक (अमंगलकारक रोग) का विनाशक कहा गया है। ओषधियों के स्वामी चन्द्रमा के प्रकाश को चन्द्रिका (चाँदनी) कहा जाता है। इसमें रोगशान्ति की अतुलनीय शक्ति है। भवानी को यहाँ महौषधि (दिव्य औषधि) की उपमा दी गयी है। आयुर्वेद में दिव्यौषधियों के अलौकिक प्रभावों की चर्चाएँ सुप्रसिद्ध हैं। इस प्रकार उक्त मंगलाचरण द्वारा लोक-कल्याण की सर्वतोमुखी कामना की गयी है।

महर्षि आत्रेय ने भी यह संकेत किया है कि हिमालय प्रदेश उत्तम औषधियों का आकर (खजाना) है। देखें-‘हिमवान् औषधभूमीनाम्।’-च० सू० अ० 25.40। और भी-‘औषधीनां परा भूमिर्हिमवान् शैलसत्तमः।’-च०चि०अ० 1.38। चन्द्रमा की थोड़ी बहुत चाँदनी सदैव रहती ही है, परन्तु निर्मल चन्द्रिका तभी प्राप्त होती है, जब चन्द्रमा पूर्ण रहता है। तभी औषध द्रव्यों का संग्रह किया जाता है, तभी उनसे पूर्ण गुणों की भी प्राप्ति होती है, क्योंकि चन्द्रमा ही औषधियों का राजा है। उनमें अमृतत्व गुण इसी से प्राप्त होता है। अतएव वेद में कहा है-‘ओषधयः समवदन्त सोमेन सह राज्ञा। यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि’॥-शुक्लयजुर्वेद अ० 12 मं० 96। अर्थात् औषधियाँ अपने राजा चन्द्रमा से कहती हैं-‘विद्वान् चिकित्सक हमारा प्रयोग जिस रोगी के लिए करता है, हम उसे रोगों से मुक्त कर देती हैं।

ग्रन्थ का महत्त्व प्रसिद्धयोगा मुनिभिः प्रयुक्ताश्चिकित्सकैर्ये बहुशोऽनुभूताः। विधीयते शार्ङ्गधरेण तेषां सुसङ्ग्रहः सज्जनरञ्जनाय॥2॥ जो प्रसिद्ध अतएव उत्तम औषधयोग प्राचीन महर्षियों (चरक, सुश्रुत आदि) ने अपनी-अपनी संहिताओं में कहे हैं तथा जिन योगों का चिकित्सकों ने अनेक बार रोगियों पर अनुभव किया है, उन्हीं योगों का भली-भाँति संग्रह सज्जनों (परोपकारी पुरुषों) की प्रसन्नता के लिए श्रीशार्ङ्गधराचार्य ने अपनी इस संहिता में किया है।