शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें2 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे वक्तव्य- उक्त पद्य द्वारा ग्रन्थकार ने यह प्रमाणित कर दिया है कि यह ग्रन्थ प्राचीन आयुर्वेदज्ञ महर्षियों के महत्त्वपूर्ण वचनों का संग्रह है। इसमें उन्हीं योगों का संग्रह किया गया है, जिनको चिकित्सकों ने अनेक बार प्रयोग करते हुए उन्हें सदैव सफल पाया और यह ग्रन्थ सज्जनों के मन को प्रसन्न करने के लिए, न कि किसी प्रकार के अभिमान को प्रकट करने के लिए लिखा गया है। निदान के बाद चिकित्सा-निर्देश हेत्वादिरूपाकृतिसात्म्यजातिभेदैः समीक्ष्यातुरसर्वरोगान् । चिकित्सितं कर्षणबृंहणाख्यं कुर्वीत वैद्यो विधिवत् सुयोगैः ॥ ३ ॥ चिकित्सक का परम कर्तव्य है कि वह निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय तथा सम्प्राप्ति की संख्या, विकल्प आदि भेदों की सहायता से रोगी के सभी रोगों (मूल रोग, सहयोगी रोग तथा उसके उपद्रव-स्वरूप उत्पन्न अन्य रोग इन सभी) को भली-भाँति बुद्धिपूर्वक देख (परीक्षा) कर शास्त्रोक्त विधि से सद्यः फलप्रद उत्तम औषधयोगों द्वारा कर्षण (बढ़े हुए दोष को घटाना) तथा बृंहण (घटे हुये दोष को बढ़ाकर सम स्थिति पर लाना) विधि से चिकित्सा करे। वक्तव्य- निदान आदि से सम्यक् परिचित होने के लिए 'माधवनिदान' का अवलोकन तथा मनन करें। विशेष जानकारी के लिए चरक तथा सुश्रुत के निदानस्थान का परिशीलन करें। यहाँ ग्रन्थकार ने रोग-चिकित्सा की अपेक्षा दोष- चिकित्सा पर अधिक बल दिया है, क्योंकि दोषों की विषमता को ही रोग कहते हैं और दोषों के समान रहने की स्थिति को आरोग्य, नीरोग या स्वस्थ कहा जाता है। यथा-'रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता' ।-अ०हृ०सू०अ० 1.20। उक्त सम्पूर्ण विषय को महर्षि आत्रेय ने इस प्रकार कहा है-'यस्तु रोगमविज्ञाय कर्माण्यरभते भिषक्। अप्यौषधविधानज्ञस्तस्य सिद्धिर्यदृच्छया' ।। च० सू०अ० 20.21। निष्कर्ष यह है कि निदान-विधि से दोषों की स्थिति का भली-भाँति ज्ञान कर लेने के बाद ही तदनुसार सिद्ध एवं सफल योगों द्वारा चिकित्सा प्रारम्भ करनी चाहिये। रोग का निदान करते समय यह भी निर्णय कर लेना चाहिये कि यह दोषजनित है या आगन्तुक है, साध्य है या असाध्य है। कर्षण तथा बृंहण चिकित्सा का वर्णन प्राचीन संहिताओं में विस्तारपूर्वक किया गया है। आप उसका इन सन्दर्भों को देखकर अनुशीलन करें-च० सू० अ० 21, 22, 23। सु० सू० अ० 15, सु० चि० अ० 1 श्लोक 11-13, सु० उ० अ० 39 श्लोक 102-105। अ० सं० सू० अ० 24। अ० हृ० सू० अ० 14। दिव्यौषधियों के प्रभाव दिव्यौषधीनां बहवः प्रभेदा वृन्दारकाणामिव विस्फुरन्ति। ज्ञात्वेति सन्देहमपास्य धीरैः सम्भावनीया विविधप्रभावाः ॥ 4 ॥ देवताओं की विलक्षण शक्तियों के समान दिव्य (लोकोत्तरशक्ति-सम्पन्न) औषधियों की भी अनन्त शक्तियाँ स्फुरित होती (देखी जाती) हैं। यह जानकर तथा सन्देह को छोड़कर अर्थात् विश्वासपूर्वक धीर (धैर्य-सम्पन्न) चिकित्सकों को चाहिये कि वे उन औषधियों की विलक्षण शक्तियों की सम्भावना किया करें। वक्तव्य- आचार्य शार्ङ्गधर निदान के पश्चात् चिकित्सा की दृष्टि से द्रव्यों के गुण-धर्मों की ओर संकेत कर रहे हैं। सम्भवतः उनका दृष्टिकोण यह रहा है कि योग के बीच में परिगणित द्रव्य प्रधान द्रव्य के गुण-धर्म को बढ़ाने में सहयोगी होता है। यदि उसी द्रव्य का स्वतन्त्र प्रयोग किया जाता है, तो वहाँ उसका विशेष महत्त्व होता है, क्योंकि सभी औषधियों का राजा चन्द्रमा सबमें समान रूप से समय पर अमृत की वर्षा किया करता है। यह तो संग्रहकर्त्ता तथा प्रयोगकर्त्ता की योग्यता एवं अयोग्यता पर निर्भर है कि उसके द्वारा संगृहीत द्रव्य अपने पूर्ण गुणों को दे या न दे। स्मरणीय है कि आज भी अष्टवैद्यन् परम्परा में नारायण नम्बूदरीपाद की केरलप्रदेशीय 'एकौषधीयचिकित्सापद्धति' औषधियों के दिव्य प्रभाव का डंका पीट रही है। उक्त पद्य में दिव्य औषधियों की तुलना देवताओं के साथ केवल उनकी शक्तिमत्ता दिखलाने के लिए ही की गयी है। यही कारण है कि तुलसी आदि पौधे तथा पीपल आदि वृक्ष देवता के रूप में अपने गुणों के कारण आज भी पूजे जाते हैं। सन्देह अज्ञानमूलक होता है, अतः शास्त्राध्ययन द्वारा उसे हटा देना चाहिये। देखें-सु० सू० अ० 40 श्लोक 19-20। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA