भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः ] परिभाषा 3 चिकित्सा-विधि-निर्देश स्वाभाविकागन्तुकायिकान्तरा रोगा भवेयुः किल कर्मदोषजाः। तच्छेदनार्थं दुरितापहारिणः श्रेयोमयान् योगवरान्नियोजयेत् ॥5॥ स्वाभाविक, आगन्तुक, कायिक तथा मानसिक रोग पूर्वजन्म-कृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप अथवा वात आदि दोषों के कारण प्राणिमात्र में निश्चित रूप से होते हैं। उनको नष्ट करने के लिए पापनाशक धर्मशास्त्रोक्त विविध प्रकार के प्रायश्चित्त आदि का अथवा वात आदि दोषों को समभाव में लाने के लिए उत्तमोत्तम (शास्त्रानुमोदित) योगों का प्रयोग करे। वक्तव्य- ऊपर चार प्रकार की व्याधियों का परिगणन किया गया है। उनका परिचय इस प्रकार है- 1. स्वाभाविक- स्वभाव (प्रकृति) के अनुसार होने वाली व्याधियाँ। जैसे-भूख, प्यास, नींद, बुढ़ापा आदि। ध्यान दें, ये भी रोग हैं, क्योंकि इनसे शरीर में पीड़ा होती है और इनकी चिकित्सा है-भोजन, जलपान, शयन तथा रसायन-सेवन। इन उपचारों से तात्कालिक लाभ होता है। 2. आगन्तुक- जो रोग बाहरी कारणों-अभिघात, भूतावेश तथा जहरीले प्राणियों के दंश आदि से उत्पन्न हों, उन्हें आगन्तुक कहते हैं। जैसे-चोट लगना, मारण, मोहन, उच्चाटन, भूत-प्रेतबाधा, साँप, बिच्छू, बर्रे आदि द्वारा डँसा जाना। 3. कायिक- काय=शरीर से सम्बन्धी सभी रोग। जैसे-ज्वर, अतिसार आदि। इनकी उत्पत्ति मिथ्या आहार-विहार के प्रयोग से तथा दूषित वात आदि दोषों से होती है, अतएव इसे 'आन्तरिक' कहा गया है। इन रोगों की परिधि में आने वाले रोग हैं-काम, क्रोध आदि तथा उन्माद, अपस्मार आदि। इनमें पूर्वजन्म में किये गये पापों के फल स्वरूप होने वाले रोग उक्त पापकर्मों के क्षय हो जाने पर अथवा उनको दूर करने वाले उपवासादि प्रायश्चित्तों को करने से उक्त रोगों का शमन हो जाता है। वात आदि दोषों के प्रकुपित (विषम) हो जाने के कारण उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग विधिपूर्वक उत्तम योगों द्वारा चिकित्सा करने से शान्त हो जाते हैं। विशेष- देखें-सु० सू० अ० 1.23 से 27 तक। ग्रन्थ की प्रामाणिकता प्रयोगानागमात् सिद्धान् प्रत्यक्षादनुमानतः। सर्वलोकहितार्थाय वक्ष्याम्यनतिविस्तरात् ॥6॥ प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम (शास्त्र) प्रमाण से सिद्ध (सदैव सफलता को देने वाले) प्रयोगों का मैं (शार्ङ्गधर) प्राणिमात्र के हित के लिए संक्षेप से वर्णन कर रहा हूँ। वक्तव्य- आत्मा, मन तथा बुद्धि के सहयोग से जो यथार्थज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'प्रत्यक्ष' कहते हैं। देखें-च० सू० अ० 11.20। व्याप्तिग्रहण के अनन्तर जिस अव्यभिचारी हेतु से हेतुमान् का ज्ञान होता है, उसे 'अनुमान' कहते हैं। जैसे-धूम के दर्शन से अग्नि का अनुमान तथा गर्भ-दर्शन से स्त्री-पुरुष के सहवास का अनुमान। देखें-च० सू० अ० 11.21-22। आगम शब्द का अर्थ है 'वेद' अथवा आप्त (प्रामाणिक)। ऋषि-महर्षियों द्वारा रचित शास्त्र को भी आगम कहते हैं, क्योंकि आप्त पुरुष रजोगुण तथा तमोगुण से मुक्त होते हैं। अतएव उनका ज्ञान सर्वदा शुद्ध एवं सत्य होता है। वे कभी असत्य भाषण नहीं करते। अतएव उनके रचित शास्त्र आगम कोटि के माने जाते हैं। देखें-च० सू० अ० 11.27। पूर्वखण्ड के अध्याय प्रथमं परिभाषा स्याद् भैषज्याख्यानकं तथा। नाडीपरीक्षाविधिरतस्तो दीपन-पाचनम् ॥7॥ ततः कलादिकाख्यानमाहारादिगतिस्तथा। रोगाणां गणना चैव पूर्वखण्डोऽयमीरितः ॥8॥ इस शार्ङ्गधरसंहिता के पूर्वखण्ड में सात अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय में-परिभाषा (शास्त्र द्वारा निश्चित विषयों का विवरण), दूसरे में-औषध योगों के सेवन का समय एवं रस, गुण आदि का वर्णन, तीसरे में-नाड़ी-परीक्षा-विधि आदि विषयों का वर्णन, चौथे में-दीपन, पाचन, लेखन, भेदन आदि द्रव्यशक्तियों का वर्णन, पाँचवें में-कला, आशय आदि शारीरिक विषयों का वर्णन, छठे में-आहार, पाक आदि की गति का वर्णन और सातवें में-रोगों की गणना की गयी है। मध्यमखण्ड के अध्याय स्वरसः क्वाथफाण्टौ च हिमः कल्कश्च चूर्णकम्। तथैव गुटिकालेहौ स्नेहः सन्धानमेव च॥9॥ धातुशुद्धी रसाश्चैव खण्डोऽयं मध्यमः स्मृतः। मध्यमखण्ड में बारह अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय में-स्वरस बनाने की विधि, उसके भेद एवं कुछ योग दिये गये हैं। दूसरे में-क्वाथ बनाने की विधि, उसके भेद और कुछ योग, तीसरे में-फाण्ट बनाने की विधि तथा उसके अनुरूप कुछ योग, चौथे में-हिम निर्माण-विधि, तत्सम्बन्धित कुछ योग, पाँचवें में-कल्क (चटनी) बनाने की विधि तथा कुछ