शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४ | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे |
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[बायाँ स्तम्भ]
योग, छठे में-चूर्ण बनाने का विधि, कुछ प्रसिद्ध चूर्णयोग, सातवें में-गुटिका (गोलियाँ) तथा कतिपय योग, आठवें में-अवलेह निर्माण-विधि, कुछ प्रसिद्ध च्यवनप्राश आदि अवलेह योग, नवें में-स्नेह (घी-तेल आदि) पाक-विधि तथा कुछ चिकित्सोपयोगी स्नेह योग, दसवें में-सन्धान-विधि, आसव, अरिष्ट, सिरका आदि के निर्माण की विधि तथा कुछ प्रसिद्ध आसव-अरिष्टयोग एवं परस्पर भेद-विवरण, ग्यारहवें में-विविध प्रकार की धातुओं के शोधन तथा मारण की विधि और बारहवें में-रस (पारद), गन्धक का शोधन-मारण तथा सिद्ध रसयोगों का वर्णन किया गया है।
उत्तरखण्ड के अध्याय
स्नेहपानं स्वेदविधिरुर्वमनं च विरेचनम् ॥ १० ॥ ततस्तु स्नेहवस्तिः स्यात् ततश्चापि निरूहणम्। ततश्चाप्युत्तरो वस्तिस्ततो नस्यविधिर्मतः ॥ ११ ॥ धूमपानविधिश्चैव गण्डूषादिविधिस्तथा। लेपादीनां विधिः ख्यातस्तथा शोणितविस्रुतिः ॥ १२ ॥ नेत्रकर्मप्रकारश्च खण्डः स्यादुत्तरस्त्वयम्।
उत्तरखण्ड में तेरह अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय में-स्नेहपान-विधि, स्नेहपाक-विधि और कुछ स्नेहयोग; दूसरे में-स्वेदन (शरीर से पसीना निकालने की) विधि, स्वेदन के विविध भेद; तीसरे में-वमन (उलटी कराने की) विधि, वामक (वमनकारक) योगों का वर्णन, वमन के लक्षण; चौथे में-विरेचन (दस्त कराने की) विधि, विरेचक योगों का वर्णन, विरेचन के लक्षण; पाँचवें में-अनुवासनवस्ति, उसकी विधि; अनुवासन योग; छठे में-निरूहणवस्ति, उसकी विधि, निरूहण योग; सातवें में-उत्तरवस्ति (यह वस्ति पुरुषों के मूत्रमार्ग में और स्त्रियों की योनि में दी जाती है), उत्तरवस्ति-विधि, उत्तरवस्ति में प्रयुक्त होने वाले योग; आठवें में-नस्य (नाक द्वारा ली जाने वाली औषधि) विधि, विविध नस्य योग; नवें में-धूमपान-विधि तथा उसके विविध योग; दसवें में-गण्डूष (कुल्ले करने की) विधि, विविध गण्डूष योग, कवल-धारण-विधि, अनेक प्रकार के कवल योग; ग्यारहवें में-लेप का विधि, विविध प्रकार के रोगों में प्रयुक्त होने वाले लेपयोग; बारहवें में-रक्तस्राव-विधि, रक्त-परिचय, रक्तस्रावहर योग तथा तेरहवें में-नेत्ररोगों की चिकित्सा-विधि नेत्ररोग-नाशक विविध योग आदि दिये गये हैं।
[दायाँ स्तम्भ]
अध्यायों तथा श्लोकों की गणना
द्वात्रिंशत्सम्मिताध्यायैर्युक्तेयं संहिता स्मृता ॥ १३ ॥ षड्विंशतिशतान्यत्र श्लोकानां गणितानि च।
प्रस्तुत शार्ङ्गधरसंहिता में बत्तीस अध्याय हैं (पूर्वखण्ड में ७, मध्यमखण्ड में १२ और उत्तरखण्ड में १३) और श्लोकों की संख्या २६०० (छब्बीस सौ) है।
वक्तव्य- इसका स्पष्टीकरण आलेख में देखें।
मान-परिभाषा
न मानेन विना युक्तिर्द्रव्याणां जायते क्वचित् ॥ १४ ॥ अतः प्रयोगकार्यार्थं मानमत्रोच्यते मया।
मान (परिमाण, नाप या तौल) के बिना औषधद्रव्यों की युक्ति (प्रयोग या व्यवहार) कहीं भी नहीं की जा सकती है। इसलिये प्रयोग करने के लिए मेरे द्वारा यहाँ विविध मानों का वर्णन किया जा रहा है।
वक्तव्य- आयुर्वेदीय आर्षसंहिताओं में दिये गये मागध तथा कालिङ्ग मानों की तुलना आधुनिक मानों के साथ हो सके, इसके लिए उक्त प्राचीन मानों का परिचय यहाँ दिया जा रहा है। वैसे आर्षग्रन्थों में दिये गये इन आर्यमानों की सत्ता मुगलशासन काल में ही समाप्त हो चली थी। आज जिन नाप-तौलों का व्यवहार है, उनसे हमें प्राचीन मानों का समन्वयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिये। आचार्य भावमिश्र ने इस प्रकरण को शार्ङ्गधरसंहिता से प्रायः उद्धृत किया है-आप जरा मिला कर देखें-भा० प्र० निघण्टु मानपरिभाषा-प्रकरण।
मागधमान-परिभाषा
त्रसरेणुर्बुधैः प्रोक्तस्त्रिंशता परमाणुभिः ॥ १५ ॥ त्रसरेणुस्तु पर्यायेनाम्ना वंशी निगद्यते।
विद्वानों ने तीस परमाणुओं का एक त्रसरेणु स्वीकार किया है। 'त्रसरेणु' का ही पर्याय 'वंशी' कहा जाता है।
वक्तव्य- यद्यपि यहाँ तीस परमाणु परिमित एक परिमाण का नाम 'त्रसरेणु' है, तथापि इसका पारिभाषिक अर्थ इस प्रकार है-त्रस=चर या चल या चलायमान जो रेणु=धूल का कण। 'त्रसः च असौ रेणुः च=त्रसरेणुः'। इसका अन्यत्र परिचय इस प्रकार है-'जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः। प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते' ॥ -मनुस्मृति ८.१३२। तथा याज्ञवल्क्यस्मृति १.३६१।