भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 5 परमाणु-परिचय जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः ।। 16 ।। तस्य त्रिंशत्तमो भागः परमाणुः स कथ्यते । खिड़की या झरोखे में से भीतर की ओर आयी हुई सूर्य की किरणों के प्रकाश में जो सूक्ष्म (छोटे से छोटे) धूलिकण (उड़ते हुये-से) दिखलायी पड़ते हैं, उनमें से किसी एक का तीसवाँ भाग परमाणु कहा जाता है। वक्तव्य-पृथिवी, जल आदि के सबसे छोटे भाग को 'परमाणु' कहते हैं। यह अणु से भी परमलघु होता है, अतएव इसे परमाणु कहते हैं। आत्मतत्त्व को भी 'अणोरणीयान्' कहा गया है। वंशी का मान जालान्तरगतैः सूर्यकरैर्वंशी विलोक्यते ।। 17 ।। जिसे ऊपर त्रसरेणु कहा गया है, उसे ही 'वंशी' भी कहा जाता है। इस परिमाण को झरोखे के भीतर गयी हुई सूर्य-किरणों द्वारा देखा जा सकता है। वक्तव्य-चरक का पौतवमान 'वंशी' या 'ध्वंसी' से प्रारम्भ होता है। खिड़की से भीतर की ओर आयी हुई सूर्य-किरणों में जो उड़ते हुये धूल के कण दिखलायी देते हैं, उन तीस परमाणुओं की एक 'वंशी' (त्रसरेणु) होती है, इसी को 'ध्वंसी' भी कहते हैं। दूसरे आचार्य ध्वंसी का अर्थ धूल करते हैं। देखें-च० क० अ० 12.87। मरीचि आदि के मान षड्वंशीभिर्मरीचिः स्यात् ताभिः षड्भिस्तु राजिका। तिसृभी राजिकाभिश्च सर्षपः प्रोच्यते बुधैः ।। 18 ।। छः त्रसरेणुओं की एक 'मरीचि' होती है; छः मरीचियों की एक राजिका (राई) होती है और तीन राजिकाओं (राइयों) का एक सर्षप (गौरसर्षप या पीली सरसों) होता है। वक्तव्य-तेज धूप में बालू या अभ्रक के जो लघुतम कण दूर से चमकते हुये दिखलायी देते हैं, उनको 'मरीचि' कहते हैं। इसी से सम्बन्धित एक प्रसिद्ध शब्द है- मृग- मरीचिका। इसका अर्थ होता है-मृगतृष्णा। यह मरीचि त्रसरेणु या वंशी से छः गुना भारी होता है। यव आदि के मान यवोऽष्टसर्षपैः प्रोक्तो गुञ्जा स्यात् तच्चतुष्टयम्। षड्भिस्तु रक्तिकाभिः स्यान्माषको हेमधान्यकौ ।। 19 ।। आठ सर्षप (सरसों) का एक 'जौ' होता है, चार 'जौ' की एक 'गुञ्जा' इसी को रत्ती (रक्तिका) या घुंघची भी कहते हैं और छः रत्ती का एक 'माशा' होता है। इसके पर्याय हैं- हेम तथा धान्यक। वक्तव्य-गुञ्जा (घुंघची) वर्णभेद से लाल मुख वाली तथा काले मुख वाली होती है। लोक-व्यवहार में दोनों को ही रत्ती कहते हैं। वास्तव में लाल मुख वाली रत्ती (रक्तिका) को ही सुनार तौल के लिए प्रयुक्त करते हैं। इसकी गणना उपविषों में है। इसे बाहर से सुन्दर तथा भीतर से विषमयं देखकर कवियों ने इसकी तुलना स्त्रियों के हृदयों से की है। यह मान शार्ङ्गधराचार्य-सम्मत है, दूसरे आचार्य 5 रत्ती, 7 रत्ती अथवा 10 रत्ती का एक माशा मानते हैं। शाण आदि के मान माषैश्चतुर्भिः शाणः स्याद्धरणः स निगद्यते । टङ्कः स एव कथितस्तद्द्वयं कोल उच्यते ।। 20 ।। क्षुद्रको वटकश्चैव द्रुङ्क्षणः स निगद्यते । चार माशा का एक 'शाण' होता है, उसे 'धरण' तथा 'टंक' भी कहते हैं। दो शाण का एक 'कोल' कहा जाता है। इसी के पर्याय हैं-क्षुद्रक, वटक तथा द्रंक्षण। कर्ष का मान तथा पर्याय कोलद्वयं च कर्षः स्यात् स प्रोक्तः पाणिमानिका ।। 21 ।। अक्षं पिचुः पाणितलं किञ्चित्पाणिश्च तिन्दुकम् । बिडालपदकं चैव तथा षोडशिका मता ।। 22 ।। करमध्यो हंसपदं सुवर्णं कवलग्रहः । उदुम्बरं च पर्यायैः कर्ष एव निगद्यते ।। 23 ।। दो कोल का एक 'कर्ष' होता है। इसके पर्याय हैं- पाणिमानिका, अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चित्, पाणि, तिन्दुक, बिडालपदक, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलग्रह तथा उदुम्बर। वक्तव्य-मानों के परिमाणों में समय-समय पर अन्तर आये हैं, जिसका इतिहास साक्षी है। इसी प्रकार यहाँ दिये गये कर्ष के पर्यायों में एक 'सुवर्ण' शब्द है। इस 'सुवर्ण' का परिमाण विष्णु, मनु, याज्ञवल्क्य, सुश्रुत तथा कौटिल्य 16 माशा= 1 सुवर्ण मानते हैं। चरक, लीलावती, शार्ङ्गधर, भावप्रकाश आदि में यह सुवर्ण शब्द 1 कर्ष=1 तोला का पर्याय माना गया है। दीपिका व्याख्या युक्त (संवत् 1966 में कलकत्ता से) प्रकाशित हनुमन्नाटक में 'सुवर्ण' शब्द का परिचय देते हुये टीकाकार ने लिखा है-'सुवर्णं दशमाषकम्'।