शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें6 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे इसके अनुसार श्रीराम ने जो अँगूठी सीताजी के लिए भेजी थी, वह दस माशे की थी। किञ्चित्पाणिश्च-कुछ टीकाकार इसे एक पद, शेष दो पद मानते हैं। दो पद मानने वालों का पक्ष युक्तिसंगत तथा व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है, क्योंकि किञ्चित् और पाणि: ये दोनों पद स्वतन्त्र हैं। आचार्य वृन्द ने भी कर्ष के पर्यायों में 'किञ्चित्' तथा 'पाणि:' को अलग-अलग स्वीकार किया है। देखें-'किञ्चिच्च कर्षपर्यायः शुक्तिरर्धपलं तथा। सान्निध्यान्मधुनो मानं व्योषादेर्मिलितस्य च'।। च० चि० अ० 12.50-52। कंसहरीतकी की टिप्पणी में श्रीजयदेव विद्यालंकार ने इसे उद्धृत किया है। कर्ष-मागधमान के अनुसार 96 रत्ती=1 रुपया का एक तोला होता है। आधा पल तथा पल का मान स्यात् कर्षाभ्यामर्धपलं शुक्तिरष्टमिका तथा। शुक्तिभ्यां च पलं ज्ञेयं मुष्टिराम्रं चतुर्थिका ।। 24 ।। प्रकुञ्चः षोडशी बिल्वं पलमेवात्र कीर्त्यते । दो कर्ष (तोला) का एक 'अर्धपल' होता है। उसी को शुक्ति तथा अष्टमिका भी कहते हैं। दो शुक्ति का एक 'पल' होता है; ऐसा जानना चाहिये। 'पल' के पर्याय ये हैं-मुष्टि, आम्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, षोडशी तथा बिल्व। प्रसृति आदि के मान पलाभ्यां प्रसृतिर्ज्ञेया प्रसृतश्च निगद्यते ।। 25 ।। प्रसृतिभ्यामञ्जलिः स्यात् कुडवोऽर्धशरावकः। अष्टमानं च स ज्ञेयः कुडवाभ्यां च मानिका ।। 26 ।। शरावोऽष्टपलं तद्वज्ज्ञेयमत्र विचक्षणैः । दो पल की एक 'प्रसृति' होती है और उसी को 'प्रसृत' अथवा पसर भी कहते हैं। दो प्रसूत की एक 'अंजलि' होती है। उसी को कुडव, अर्धशरावक तथा अष्टमान कहते हैं। दो कुडव की एक 'मानिका' होती है। उसी को मान-विशेषज्ञ 'शराव' एवं 'अष्टपल' भी कहते हैं। वक्तव्य-'अष्टपल' शब्द की सार्थकता यह है कि इस मान में आठ पल होते हैं। प्रस्थ तथा आढक के मान शरावाभ्यां भवेत् प्रस्थश्चतुःप्रस्थैस्तथाढकम् ।। 27 ।। भाजनं कंसपात्रं च चतुःषष्टिपलं च तत् ।
दो 'शराव' का एक 'प्रस्थ' होता है। चार प्रस्थ का एक 'आढक' होता है। यह चौंसठ पल का होता है। आढक के पर्यायवाचक नाम ये हैं-भाजन और कंसपात्र। द्रोण तथा शूर्प के मान चतुर्भिराधकैर्द्रोणः कलशो नल्वणोन्मनौ ।। 28 ।। उन्मानश्च घटो राशिर्द्रोणपर्यायवाचकाः । द्रोणाभ्यां शूर्पकुम्भौ च चतुःषष्टिशरावकाः ।। 29 ।। चार आढक का एक 'द्रोण' होता है। द्रोण के पर्यायवाचक नाम-कलश, नल्वण, उन्मन, उन्मान, घट तथा राशि हैं। दो द्रोण का एक 'शूर्प' होता है, उसी को 'कुम्भ' भी कहते हैं। 'शूर्प' तथा 'कुम्भ' ये दोनों परिमाण में 64-64 शराव के होते हैं। द्रोणी तथा खारी के मान शूर्पाभ्यां च भवेद् द्रोणी वाहो गोणी च सा स्मृता । द्रोणीचतुष्टयं खारी कथिता सूक्ष्मबुद्धिभिः ।। 30 ।। चतुःसहस्रपलिका षण्णवत्यधिका च सा। दो शूर्प की एक 'द्रोणी' होती है। उसी को 'वाह' तथा 'गोणी' भी कहा जाता है। तीक्ष्ण बुद्धि वाले विद्वानों ने चार द्रोणी की एक 'खारी' कही है। इस एक 'खारी' में चार हजार छियानबे (4096) पल होते हैं। भार तथा तुला के मान पलानां द्विसहस्रं च भार एकः प्रकीर्तितः ।। 31 ।। तुला पलशतं ज्ञेया सर्वत्रैवैष निश्चयः । दो हजार पल का एक 'भार' होता है और एक सौ पल की एक 'तुला' होती है। यही निश्चय सभी को स्वीकार है। क्रमशः चतुर्गुण के मान माषटङ्काक्षबिल्वानि कुडवः प्रस्थमाढकम् ।। 32 ।। राशिर्गोणी खारिकेति यथोत्तरचतुर्गुणाः । माष (माशा), टंक, अक्ष, बिल्व, कुडव, प्रस्थ, आढक, राशि, गोणी तथा खारी ये परिमाण क्रमशः उत्तरोत्तर चौगुने होते हैं। **वक्तव्य-**यहाँ तक जिस मान का वर्णन किया गया है, उसे 'मागधमान' कहते हैं। यह मान बिहार प्रान्त में प्रचलित होने के कारण 'मागधमान' कहा जाता है। सभी प्रकार के मान विद्वानों द्वारा निर्धारित एवं आदृत होते हैं। उनमें से किसी एक मान का विधिवत् प्रयोग करना तथा कराना चाहिये।