भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 356 में से

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प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 17 सरस (जो सूखी न हो अर्थात् ताजी, हरी, तथा गीली) औषधियों का ग्रहण (संग्रह) करना चाहिये और विरेचन तथा वमन कराने के लिए जिनका उपयोग करना हो, उन्हें वसन्त ऋतु (फाल्गुन-चैत्र) के अन्त में ग्रहण करना चाहिये।

वक्तव्य-वसन्त तथा शरद् ऋतुओं में औषधद्रव्य अपने रस, वीर्य, विपाक आदि से परिपूर्ण पाये जाते हैं, क्योंकि इन दोनों ही ऋतुओं का काल समशीतोष्ण होता है। अतएव इन अवसरों पर औषध-ग्रहण का शास्त्रकार ने निर्देश किया है। तन्त्रान्तर में ऋतु के अनुसार औषधियों में रसस्थिति का वर्णन इस प्रकार मिलता है-ग्रीष्म ऋतु में मञ्जरियों के अग्रभाग में, वर्षा ऋतु में पत्तों तथा त्वचा (छाल) में, वसन्त ऋतु में वृक्षों को जड़ों में रस की स्थिति होती है। इस प्रसंग में शेष ऋतुओं का उल्लेख नहीं किया गया है।

द्रव्यों के अवयवों का ग्रहण अतिस्थूलजटा याः स्युस्तासां ग्राह्यास्त्वचो बुधैः ।। 68 ।। गृह्णीयात् सूक्ष्ममूलानि सकलान्यपि बुद्धिमान्। न्यग्रोधादेस्त्वचो ग्राह्याः सारः स्याद् बीजकादितः ।। 69 ।। तालीसादेश्च पत्राणि फलं स्यात् त्रिफलादितः । धातक्यादेश्च पुष्पाणि स्नुह्यादेः क्षीरमाहरेत् ।। 70 ।। (विदार्यादेश्च कन्द्वानि गुन्दं सर्जरसादितः । मज्जा अक्षोटकादेश्च शेषं वृद्धोपदेशतः ।। 71 ।।) इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे परिभाषा नाम प्रथमोऽध्यायः ।। 1 ।।

जो औषधियाँ अधिक मोटी जड़ों वाली होती हैं, विद्वान् वैद्यों को उनकी जड़ों की छालें ग्रहण करनी चाहिये और जिनकी जड़ें छोटी हैं, उन्हें सम्पूर्ण लेना चाहिये। अर्थात् उनके पंचांग (जड़, शाखा, पत्र, पुष्प तथा फल) का ग्रहण करना चाहिये। बरगद आदि बड़े वृक्षों की भीतरी त्वचा (छाल) लेनी चाहिये (क्योंकि बाहरी छाल. निःसार होती है)। बीजक (विजयसार) आदि वृक्षों का सार (बीच की लकड़ी) लेना चाहिये (यहाँ आदि शब्द से खैर, चीड़, देवदारु, तथा चन्दन जैसे वृक्षों का ग्रहण करना चाहिये)। तालीस आदि (तुलसी, पान, तेजपत्ता, तथा सनाय जैसे द्रव्यों) के पत्र; त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, तथा आँवला) आदि (कालीमिर्च, पीपल, वायविडंग, सौंफ, सोया, मैनफल, प्रियंगु तथा जैसे द्रव्यों) के फल तथा धातकी (धाय) आदि वृक्षों के फूल तथा स्नुही (थूहर) आदि क्षीरी वृक्षों का दूध ग्रहण करना चाहिये। विदारीकन्द आदि (कन्दवर्ग में कहे गये द्रव्यों) के कन्दों का, सर्जरस (राल) आदि के गोंद का तथा अखरोट आदि (काजू, बादाम, तथा पिस्ता जैसे द्रव्यों) की मज्जा का ग्रहण करें। जिन द्रव्यों के ग्राह्य अवयवों का उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है, उनका आयुर्वेदवेत्ता वृद्धों के कथनानुसार ग्रहण करें।

वक्तव्य-ऊपर ग्रन्थकार न औषधद्रव्यों के किन-किन अवयवों का ग्रहण करना चाहिये, इस प्रकार का जो निर्देश किया है, वह सामान्य स्वरूप है। ज्ञातव्य है कि प्रायः सभी औषधद्रव्यों के एकाधिक अवयवों का ग्रहण शास्त्र-निर्देश द्वारा अथवा लोकव्यवहार द्वारा देखा जाता है। जैसे न्यग्रोध (बरगद) की त्वचा भी ली जाती है और क्षीरीवृक्ष होने के कारण उसके दूध का भी ग्रहण किया जाता है, इसी तरह परबल की पत्ती तथा उसके फल दोनों का ग्रहण होता है। इस प्रकार की विसंगतियों अथवा विशेषताओं के सम्यक् ज्ञान के लिए औषध-निर्माण कुशल गुरुजनों की चिरकाल तक उपासना तथा उनका सहवास करना चाहिये। औषध-विक्रेता भी इन विषयों के ज्ञाता होते हैं। उनसे हरड़ माँगेंगे तो वे उसका फल ही देंगे, न कि जड़ या उसकी छाल। इसके विशद विवेचन के लिए देखें-सु० सू० अ० 39 गद्य 3-6 ।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का पहला अध्याय समाप्त ।। 1 ।।

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