शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः भैषज्याख्यान
औषध-सेवन-काल भैषज्यमभ्यवहरेत् प्रभाते प्रायशो बुधः। कषायांश्च विशेषेण तत्र भेदस्तु दर्शितः॥१॥ बुद्धिमान् रोगी का कर्तव्य है कि वह प्रायः (अधिकांश, विशेष निर्देश के अभाव में) औषध का सेवन प्रातःकाल ही करे। विशेष करके कषायों (स्वरस, कल्क, क्वाथ, हिम, तथा फाण्ट) का सेवन तो अवश्य ही प्रातःकाल करे। औषध- सेवन के सम्बन्ध में जो भेद (मतभेद) है, वह आगे दिखलाया गया है। वक्तव्य-इस पद्य में कषाय शब्द को बहुवचनान्त प्रयुक्त किया गया है। इसका तात्पर्य है कि कषाय शब्द से पंचकषायों का ग्रहण किया जाता है। देखें-शा० सं० म० खं० अ० 1.1। औषध-सेवन के पाँच काल ज्ञेयः पञ्चविधः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम्। किञ्चित् सूर्योदये जाते तथा दिवसभोजने॥२॥ सायन्तने भोजने च मुहुश्चापि तथा निशि। मनुष्यों के लिए औषध-सेवन के पाँच कालों का निर्देश किया गया है-1. कुछ सूर्य के उदय होने पर (यह अरुणोदय से सूर्योदय होने तक की मध्य अवधि है), 2. दिन के भोजन के समय में, 3. सायंकाल के भोजन के समय में, 4. बार-बार और 5. रात्रि में (सोने के समय)। वक्तव्य-उक्त औषध-सेवन के पाँचों कालों का विशद विवेचन आगे किया जा रहा है। औषध-सेवन का प्रथम काल प्रायः पित्तकफोद्रेके विरेकवमनार्थयोः॥३॥ लेखनार्थं च भैषज्यं प्रभाते तत् समाहरेत्। एवं स्यात् प्रथमः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम्॥४॥
पित्त अथवा कफ दोष की वृद्धि होने पर विरेचन या वमन कराने के लिए और दोषों को विशेष करके कफदोष को अपने स्थान से खुरच कर बाहर निकालने के लिए प्रायः (अधिकांश) प्रातःकाल औषधयोग का प्रयोग करना चाहिये। इस प्रकार यह मनुष्यों के लिए औषध-सेवन का प्रथम काल कहा गया है। वक्तव्य-साहित्यिक लेखन-कार्य से आयुर्वेदिक लेखन- कार्य सर्वथा भिन्न है। यद्यपि दोनों स्थानों के लेखन शब्द की मूल प्रवृत्ति समान है। आज जिसे साहित्यिक भाषा में लेखन कहा जाता है, वह वास्तव में लेपन (लीपना) है। लेखन शब्द का सही प्रयोग शिलालेख के रूप में होता है। आप देखें कि जिस प्रकार शिला पर लिखने के लिए उसे खुरचना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार कफ अपने आशय के उन-उन अवयवों में सटा रहता है, अतः उसका लेखन किया जाता है। उद्रेक-वमन तथा विरेचन कराने के पूर्व कफ तथा पित्त को अपने स्थान से विचलित करा दिया जाता है, जिससे उसका उचित प्रकार से निर्हरण किया जा सके। औषध-सेवन का द्वितीय काल भैषज्यं विगुणेऽपाने भोजनाग्रे प्रशस्यते। अरुचौ चित्रभोज्यैश्च मिश्रं रुचिरमाहरेत्॥५॥ समानवाते विगुणे मन्देऽग्नावग्निदीपनम्। दद्याद् भोजनमध्ये च भैषज्यं कुशलो भिषक्॥६॥ व्यानकोपे च भैषज्यं भोजनान्ते समाहरेत्। हिक्काऽऽक्षेपककम्पेषु पूर्वमन्ते च भोजनात्॥७॥ एवं द्वितीयकालश्च प्रोक्तो भैषज्यकर्मणि। अपानवायु की विकृति से होने वाले (मलाशय, वस्ति तथा गर्भाशय सम्बन्धी) रोगों में भोजन करने के पहले औषध- सेवन करना उत्तम होता है। भोजन के प्रति अरुचि हो जाने