भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्यायः ] भैषज्यव्याख्यान 21 जो जीभ पर रखने मात्र से घबराहट उत्पन्न करे, जीभ में चुभे या कष्ट पहुँचाये, दाह उत्पन्न करता हुआ मुख, नासिका तथा आँखों से स्राव कराने वाला हो, वह कटुरस कहा जाता है। वक्तव्य-कटुत्रय में सोंठ, मरिच एवं पिप्पली का ग्रहण होता है। इन्हीं गुणों से भरपूर लालमिर्च भी होता है। इनमें से किसी एक को खाकर उक्त लक्षणों से मिलान करें। तिक्त (तीता) रस इससे सर्वथा भिन्न होता है। तिक्तरस के लक्षण (प्रतिहन्ति निपाते यो रसनां स्वदते न च। स तित्तो मुखवैशद्यशोषप्रह्लादकारकः ॥ 21 ॥) जो जीभ पर पड़ने से उसे कष्ट दे, अर्थात् अप्रिय लगे और जो अन्य रसों का स्वाद प्रतीत न होने दे, उसे 'तिक्तरस' कहते हैं। यह मुख की तिक्तता को दूर करके, लार को सुखाकर मन को प्रसन्न कर देता है। वक्तव्य-तिक्तरस-प्रधान द्रव्यों में 'नीम' का ग्रहण किया जाता है। इसकी दातून करने से उक्त सभी गुणों की प्राप्ति होती है। कुटकी भी अत्यन्त तिक्त रस वाली होती है। इसका सेवन करने से मुख का तीतापन दूर हो जाता है। देखें-'मम द्वयं विस्मयमातनोति, तिक्ताकषायो मुखतिक्तताघ्नः ।'- वैद्यजीवनम् । कषायरस के लक्षण (वैशद्यस्तम्भजाड्यैर्यो रसनां योजयेद् रसः। बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥ 22 ॥) जिसके खाने पर जीभ की चिपचिपाहट तो दूर हो जाये, किन्तु जीभ स्तब्ध तथा जड़ अर्थात् दूसरे रसों का अनुभव करने में असमर्थ हो जाये, कण्ठ (गला) बँधता या रुकता हुआ-सा प्रतीत हो तथा जो विकासी (पिच्छिल) गुण का नाशक हो, वह कषाय (कसैला) रस कहा जाता है। रसों का उत्पत्ति-क्रम धराम्बुक्ष्मानलजलज्वलनैनाकाशमारुतैः । वावग्निक्ष्मानिलैर्भूतद्वयै रसभवः क्रमात् ॥ 23 ॥ प्रस्तुत क्रम से दो-दो महाभूतों के परस्पर मिलने से निम्न प्रकार रसों की उत्पत्ति होती है-धरा (भूमि) तत्त्व, जलतत्त्व से मधुररस; क्ष्मा (भूमि) तत्त्व, अनल (अग्नि) तत्त्व से अम्ल (खट्टा) रस; जलतत्त्व, ज्वलन (अग्नि) तत्त्व से लवणरस; आकाशतत्त्व, मरुत् (वायु) तत्त्व से कटुरस; वायुतत्त्व, अग्नितत्त्व से तिक्तरस तथा क्ष्मा (भूमि) तत्त्व, अनिल (वायु) तत्त्व से कषाय रस की। वक्तव्य-सामान्य दृष्टि से रसों का क्रम यह है-1. मधुर, 2. अम्ल, 3. लवण, 4. कटु, 5. तिक्त, तथा 6. कषाय। इस दृष्टि से जब हम ऊपर के श्लोकोक्त क्रम को देखते हैं, तो उसका अनुवाद जैसा ऊपर दिया गया है, उसी प्रकार का होगा, किन्तु वास्तविकता इससे भिन्न है। अतः हम ग्रन्थकार की उक्ति का सम्मान करने के लिए उक्त रसादि क्रम में 'तिक्तरस' को प्रथम स्थान देकर उसके बाद 'कटुरस' का स्थान स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि आप देखें कि चरक तथा सुश्रुत दोनों ही संहिताकारों ने वायु तथा अग्निगुण की अधिकता से 'कटुरस' और वायु एवं आकाशगुण की अधिकता से 'तिक्तरस' की उत्पत्ति को स्वीकार किया है। विशेष विवेचन के लिए देखें-च० सू० अ० 36 तथा सु० सू० अ० 42। पञ्चमहाभूतों के गुण गुरुः स्निग्धश्च तीक्ष्णश्च रूक्षो लघुरिति क्रमात्। धराम्बुवह्विपवनव्योम्नां प्रायो गुणाः स्मृताः ॥ 24 ॥ एष्वेवान्तर्भवन्त्यन्ये गुणेषु गुणसञ्चयाः। गुरु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, रूक्ष, तथा लघु ये पाँच गुण क्रमशः (पृथिवी), अम्बु (जल), वह्नि (अग्नि), पवन (वायु) तथा व्योमन् (आकाश) नामक महाभूतों के माने गये हैं। अन्य सभी प्राचीन संहिताकारों द्वारा अपनी-अपनी संहिताओं में वर्णित गुण-समूह का अन्तर्भाव इन्हीं पाँच गुणों में हो जाता है। वक्तव्य-चरक आदि संहिताओं में गुणों की संख्या बीस है। ये गुण परस्पर विरोधी अथवा विपरीत स्वभाव वाले होते हैं। आप इन्हें ध्यान से देखें-'गुरु, लघु, मन्द, तीक्ष्ण, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, श्लक्ष्ण, खर, सान्द्र, द्रव, मृदु, कठिन, स्थिर, तथा चल। शीत तथा उष्ण गुणों के द्रव्य-विवेचन प्रसंग में 'वीर्य' की संज्ञा दी गयी है। इन उपर्युक्त गुणों से युक्त द्रव्यों का अधिक सेवन करने से उस-उस द्रव्य का प्रभाव शरीर पर स्पष्ट दिखलायी देता है। जैसे-घी-तेल स्निग्ध गुण वाले होते हैं। इनका सेवन करने से शरीर में स्निग्धता आ जाती है और रूक्ष द्रव्यों के सेवन से रूक्षता आ जाती है। शार्ङ्गधराचार्य ने जिन पाँच गुणों का चयन किया है, उनमें उक्त सभी गुणों का समावेश किया जा सकता है।