शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें22 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे गुरु गुण के लक्षण ( गुरु वातहरं पुष्टिश्लेष्मकृच्चिरपाकि च ॥ २५ ॥ ) गुरु नामक गुण वात दोष का नाश करता है, शरीर को पुष्ट करता है, कफ को बढ़ाता है और चिरपाकी (देर में पचने वाला) होता है। स्निग्ध गुण के लक्षण ( स्निग्धं वातहरं श्लेष्मकारि वृष्यं बलावहम् । ) स्निग्ध नामक गुण वातदोष का नाश करता है, कफदोष को बढ़ाता है, वृष्य (वीर्य को बढ़ाने वाला) है तथा बल की वृद्धि करने वाला होता है। तीक्ष्ण गुण के लक्षण (तीक्ष्णं पित्तकरं प्रायो लेखनं कफवातहृत् ॥ २६ ॥) तीक्ष्ण नामक गुण पित्तकारक (पित्त के बढ़ाने वाला), प्रायः लेखन (आँतों में सटे हुये कफदोष को खुरचकर निकालने वाला), कफ एवं वात दोष का विनाशक होता है। रूक्ष गुण के लक्षण ( रूक्षं समीरणकरं परं कफहरं मतम् । ) रूक्ष नामक गुण वातदोष को बढ़ाने वाला और कफदोष को दूर करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। लघु गुण के लक्षण ( लघु पथ्यं परं प्रोक्तं कफघ्नं शीघ्रपाकि च ॥ २७ ॥ ) लघु नामक गुण अत्यन्त पथ्य (हित करने वाला), कफदोष का विनाशक तथा शीघ्र पच जाने वाला होता है। **वक्तव्य—**उक्त गुरु, स्निग्ध आदि पाँच गुण जिन-जिन द्रव्यों में रहते हैं, ये सभी वर्णन उन-उन द्रव्यों के हैं। पृथिवी, जल आदि भूतों के रूप में इन गुणों का प्रयोग नहीं देखा जाता। आप इस प्रसंग का प्रयोग आहार-विहार तथा पथ्यापथ्य के क्षेत्र में करके स्वयं अनुभव करें। वीर्य का वर्णन वीर्यमुष्णं तथा शीतं प्रायशो द्रव्यसंश्रयम्। तत्सर्वमग्नीषोमीयं दृश्यते भुवनत्रये ॥ २८ ॥ अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति वीर्याण्यन्यानि यान्यपि। उष्ण तथा शीत भेद से प्रायः वीर्य दो प्रकार का होता है। ये दो भिन्न-भिन्न प्रकार के द्रव्यों में रहते हैं। इसीलिए संसार के सभी द्रव्य अग्नि (आग्नेय = उष्ण) तथा सोम (सौम्य = शीत) वीर्य प्रधान तीनों लोकों में देखे जाते हैं। अन्य वीर्यों (स्निग्ध, रूक्ष आदि) का भी अन्तर्भाव इन्हीं के अन्तर्गत कर लिया जाता है या कर लिया जाना चाहिये। **वक्तव्य—**आचार्य शार्ङ्गधर के सामने प्राचीन आयुर्वेदीय संहिताएँ रहीं, अतएव उन्होंने अपना 'द्विविध वीर्य सम्बन्धी' मत पहले देकर मतभेद युक्त दूसरों के मतों को 'अन्यानि यानि अपि' कहकर किसी को छोड़ा नहीं। इस प्रसंग में हम अन्य आचार्यों द्वारा स्वीकृत अष्टविध वीर्यों को यहाँ उद्धृत कर रहे हैं। चरक के अनुसार वीर्य के भेद—'मृदु, तीक्ष्ण, गुरु, लघु, स्निग्ध, रूक्ष, उष्ण, तथा शीतल'। सुश्रुत के अनुसार वीर्य के भेद—शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मृदु, तीक्ष्ण, पिच्छिल, तथा विशद। इन प्रसंगों को आप क्रमशः च० सू० अ० 26. 64-65 में तथा सु० सू० अ० 42.5 एवं 11 में देखें। वास्तव में द्रव्य में रहने वाली 'वीर्य' वह शक्ति है, जिसके बल पर वह समस्त कार्य करता है। देखें—'एतानि वीर्याणि स्वबल-गुणोत्कर्षाद् रसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति'। सु०सू०अ० 40.5। उष्ण, शीत वीर्य के लक्षण ( शीतं तु ह्लादनं स्तम्भि मूर्च्छातृट्स्वेददाहनुत् ॥ २९ ॥ उष्णं भवति शीतस्य विपरीतं च पाचनम् । ) शीत नामक वीर्य आह्लाद (प्रसन्नता)कारक, रक्त, मल, तथा मूत्र आदि की अतिप्रवृत्ति (अधिक निकलने) को रोकने वाला, मूर्च्छा, तृट् (प्यास), स्वेद (पसीना) तथा दाह (जलन) को दूर करने वाला होता है। उष्ण नामक वीर्य शीतवीर्य से विपरीत गुणों वाला तथा पाचनकारक होता है। **वक्तव्य—**जिस प्रकार संहिताकार आचार्यों ने द्रव्य-प्रकरण में द्रव्य की प्रधानता का वर्णन किया था, उसी प्रकार प्रस्तुत वीर्य के प्रकरण में इसकी प्रधानता स्वीकार की गयी है, क्योंकि वीर्य के क्षेत्र में द्रव्य में रहने वाले अन्य गुणों को महत्त्व देना क्रम प्राप्त नहीं है। यहाँ उष्ण तथा शीत दो प्रकार के वीर्यों का उल्लेख किया गया है। अतः उक्त दो वीर्यों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत है—
- **कुलथी—**यह कषाय तथा कटु रस होने पर भी वातदोष की वृद्धि नहीं करती है, क्योंकि यह 'उष्णवीर्य' है। उष्णवीर्य होने के कारण यह वातनाशक है।
- **ईख का रस—**यह रस में मधुर होता है, फिर भी वातदोष का शमन नहीं करता है, क्योंकि यह 'शीतवीर्य' होता है। शीतवीर्य होने के कारण ही यह वातदोष को बढ़ाता है। यहाँ उदाहरण के लिए ऐसे दो द्रव्यों का उल्लेख किया है,