भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्यायः] भैषज्यव्याख्यान 23 जो अन्य गुणों के कारण नहीं, अपितु अपने 'वीर्य' के कारण कार्य करते हैं। ऐसा विचार अन्यत्र भी कर लेना चाहिये। विपाक-परिचय त्रिधा विपाको द्रव्यस्य स्वाद्वम्लकटुकात्मकः ।। ३० ।। मिष्टः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः । कषायकटुतिक्तानां पाकः स्यात् प्रायशः कटुः ।। ३१ ।। मधुराज्जायते श्लेष्मा पित्तमम्लाच्च जायते । कटुकाज्जायते वायुः कर्माणीति विपाकतः ।। ३२ ।। भिन्न-भिन्न रस वाले द्रव्य का विपाक तीन प्रकार का होता है- 1. मधुर, 2. अम्ल एवं 3. कटु। मधुर तथा लवण रस का विपाक 'मधुर' होता है; अम्ल (खट्टा) रस का विपाक अम्ल ही होता है; कषाय, कटु (सोंठ, मरिच, एवं पिप्पली आदि) तथा तिक्त (नीम, चिरायता जैसे द्रव्यों के रसों) का विपाक प्रायः 'कटु' होता है। मधुर विपाक से कफदोष की, अम्ल विपाक से पित्तदोष की और कटु विपाक से वातदोष की उत्पत्ति होती है। ये विपाकों के कार्य कहे गये हैं। वक्तव्य- अपने-अपने स्थान पर सब का महत्त्व होता है। यही स्थिति द्रव्य एवं उसमें रहने वाले रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव की भी होती है। अर्थात् जिस प्रकार ऊपर द्रव्य, रस, गुण, वीर्य के महत्त्व का वर्णन किया जा चुका है, ठीक उसी प्रकार यहाँ 'विपाक' की प्रधानता स्वीकार की गयी है, क्योंकि इस दृष्टि से द्रव्य में स्थित उसका मूल रस तथा विपाक के बाद उत्पन्न होने वाला रस अपने-अपने समय में प्रभावोत्पादक होता ही है। इस विषय के विशेष विवेचन के लिए आप सुश्रुतसंहिता सू० अ० 40 का अध्ययन करें। विपाक-परिचय (जाठरेणाग्निना योगाद् यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ।। ३३ ।।) मधुर आदि रसों का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ जाने के बाद, जठराग्नि के साथ संयोग होने के अनन्तर जो दूसरे रस की उत्पत्ति होती है वह 'विपाक' कहा जाता है। वक्तव्य- प्रारम्भिक स्थिति में द्रव्य में स्थित रस रसना (जीभ) द्वारा ग्रहण किये जाते हैं। ये प्रारम्भ में पुरुष की प्रकृति के अनुसार अपने सद्गुणों का प्रभाव दिखलाते ही हैं, किन्तु भोजन के रूप में उन-उन द्रव्यों का सेवन कर लेने के बाद जब उनका जठराग्नि से संयोग होता है, तब जिस एक नये रस की उत्पत्ति होती है, उसका रस स्वरूप विपाक के परिणाम से विदित होता है। इस दृष्टि से 'विपाक' की प्रधानता स्वीकार की गयी है। प्रभाव का वर्णन प्रभावस्तु यथा धात्री लकुचस्य रसादिभिः। समापि कुरुते दोषत्रितयस्य विनाशनम् ।। ३४ ।। क्वचित्तु केवलं द्रव्यं कर्म कुर्यात् प्रभावतः। ज्वरं हन्ति शिरोबद्धा सहदेवीजटा यथा ।। ३५ ।। जिस प्रकार रस, गुण, वीर्य, विपाक में बड़हल नामक फल 'आँवला' जैसा ही होता है, किन्तु आँवला त्रिदोषनाशक होता है और उसी के समान कहा गया बड़हल वैसा नहीं होता। यह आँवले का अपना 'प्रभाव' है। कहीं यह भी देखा जाता है, कि केवल द्रव्य अपने प्रभाव से ही कार्य कर डालता है। जैसे 'सहदेवी' की जड़ को सिर पर बाँध देने मात्र से ही वह ज्वर का नाश कर देती है। यह केवल प्रभाव का वर्णन है। वक्तव्य- यह 'प्रभाव' जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है, केवल औषधद्रव्यों में ही नहीं पाया जाता, अपितु मणि, मन्त्र आदि को धारण करने से देव, गुरु, माता, पिता के आशीर्वचनों में भी आस्तिक बुद्धि से देखा तथा पाया जाता है। यह 'प्रभाव' प्रयोगशाला में परीक्षा का विषय नहीं है। इसकी विशेष जानकारी के लिए च० सू० अ० 26 श्लोक 67 से 72 तक तथा सु० सू० अ० 40 श्लोक 19 से 21 तक देखें। प्रभाव का लक्षण (रस-वीर्य विपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते। विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ।। ३६ ।। मणीनां धारणीयानां कर्म यद् विविधात्मकम्। तत् प्रभावकृतं तेषां प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ।। ३७ ।।) जहाँ दो या उससे अधिक द्रव्यों में रस (गुण), वीर्य, विपाक की समानता देखी जाये, (जैसा ऊपर श्लोक 34 में कहा गया है) किन्तु उनके कर्मों में विशेषता (भिन्नता) हो, वह उस-उस द्रव्य का 'प्रभाव' ही माना जाता है। धारण करने योग्य (हीरा, नीलम, तथा पुखराज आदि) मणियों को धारण करने पर जो विविध प्रकार का शुभ-अशुभ कर्म (फल) देखा जाता है, वह उन मणियों का प्रभाव ही है। अतः प्रभाव को अचिन्त्य (अविज्ञेय) कहा जाता है। वक्तव्य- वीर्य, विपाक एवं प्रभाव का ऊपर जो वर्णन किया गया है, यह शास्त्र की दृष्टि से प्रामाणिक है और