शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ
पृष्ठ 61, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 61
द्वितीयोऽध्यायः] भैषज्याख्यान 25 वातादि दोषों की चय, प्रकोप, प्रशम तालिका
| दोष | वात | पित्त | कफ |
|---|---|---|---|
| संचय | ग्रीष्म ऋतु <br> मेष, वृष <br> (वैशाख, ज्येष्ठ) <br> मध्याह्न काल | वर्षा ऋतु <br> सिंह, कन्या <br> (भाद्रपद, आश्विन) <br> दिन का चौथा प्रहर | हेमन्त ऋतु <br> धनु, मकर <br> (पौष, माघ) <br> उषःकाल |
| प्रकोप | प्रावृड् ऋतु <br> मिथुन, कर्क <br> (आषाढ़, श्रावण) <br> अपराह्न काल | शरद् ऋतु <br> तुला, वृश्चिक <br> (कार्तिक, मार्गशीर्ष) <br> अर्धरात्रि काल | वसन्त ऋतु <br> कुम्भ, मीन <br> (फाल्गुन, चैत्र) <br> पूर्वाह्न काल |
| प्रशम | शरद् ऋतु <br> तुला, वृश्चिक <br> (कार्तिक, मार्गशीर्ष) <br> अर्धरात्रि काल | वसन्त ऋतु <br> कुम्भ, मीन <br> (फाल्गुन, चैत्र) <br> पूर्वाह्न काल | प्रावृड् ऋतु <br> मिथुन, कर्क <br> (आषाढ़, श्रावण) <br> अपराह्न काल |
| वक्तव्य-यह भारतवर्ष का ही सौभाग्य है कि यहाँ बारह | |||
| महीने, छः ऋतुएँ और दो अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन) | |||
| होते हैं। यह व्यवस्था अन्यत्र नहीं है। इन परिवर्तनशील ऋतुओं | |||
| तथा काल का प्रभाव प्राणिमात्र पर पड़ता है। कालप्रभाव के | |||
| लिए देखें-सु० सू० अ० 6.14। इन्हीं ऋतुओं में वातादि दोषों | |||
| का संचय, प्रकोप तथा प्रशम होता है, जैसा कि ऊपर वर्णन | |||
| किया गया है। चिकित्सा की दृष्टि से इस प्रकार होने वाले | |||
| दोषों के संचय, प्रकोप आदि का ज्ञान परम आवश्यक होता | |||
| है। इसे जानने वाला व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा भी कर | |||
| सकता है। विशेष विवेचन के लिए देखें-सु० सू० अ० 6। | |||
| यमदंष्ट्रा काल-परिचय | |||
| कार्तिकस्य दिनान्यष्टावष्टावाग्रयणस्य च। | |||
| यमदंष्ट्रा समाख्याता स्वल्पभुक्तो हि जीवति।।44।। | |||
| कार्तिक मास के अन्तिम आठ दिन तथा अगहन | |||
| (मार्गशीर्ष) मास में प्रारम्भ के आठ दिन, (कुल मिलाकर ये | |||
| सोलह दिन), यमदंष्ट्रा (यमराज की दाढ़) कहे जाते हैं। इन | |||
| दिनों कम खाने वाला ही जीवित (सुखपूर्वक) रह सकता है। | |||
| चय आदि पर आहार-विहार का प्रभाव | |||
| चयकोपशमा दोषा विहाराऽऽहारसेवनैः। | |||
| समानैर्यान्त्यकालेऽपि विपरीतैर्विपर्ययम् ।। 45 ।। | |||
| ऊपर वात आदि दोषों के संचय, कोप, प्रशम के | |||
| स्वाभाविक कालों (ऋतुओं) का वर्णन किया गया है, किन्तु | |||
| उपर्युक्त कालों के विपरीत काल में भी समान गुण वाले | |||
| (वात, पित्त, एवं कफकारक) आहारों तथा विहारों (रहन- | |||
| सहन) का सेवन करने से भी उक्त दोषों का संचय तथा | |||
| प्रकोप हो जाता है और इन दोषों के विपरीत गुण वाले आहार- | |||
| विहारों का सेवन करने से उन दोषों का शमन हो जाता है। | |||
| वक्तव्य-उक्त श्लोक प्रायः सभी संस्करणों में इसी प्रकार | |||
| का देखा जाता है। हमारे विचार से इसका प्रथम पाद इस | |||
| प्रकार होना चाहिये-'चयकोपौ समा दोषाः'। ऐसा पाठ | |||
| स्वीकार कर लेने पर इसका अन्वय इस प्रकार होगा-'समाः | |||
| दोषाः समानैः विहाराहारसेवनैः अकाले अपि चयकोपौ यान्ति'। | |||
| क्या इतना सुस्पष्ट भाव उक्त पाठ से प्राप्त हो सकता है? कभी | |||
| नहीं। 'विपरीतैर्विपर्ययम्' इस पद्यांश में पठित 'विपर्यय' | |||
| शब्द 'चय-कोप' के विपरीत 'शम' शब्द की अभिव्यक्ति | |||
| कराने में स्वयं समर्थ है। इस प्रसंग को विस्तृत रूप से | |||
| समझने के लिए आप च० सू० अ० 1.43, च० वि० अ० | |||
| 1.7 तथा च० शा० अ० 6.10 का अवलोकन करें। आपको | |||
| स्वयं प्रसंगोचित तथ्यों की प्रतीति होने लगेगी। | |||
| यदि हम समान गुण वाले आहार-विहार का सेवन करने | |||
| से यह चाहें कि उस दोष का शम (शमन या शान्ति) हो जाये | |||
| तो क्या यह कभी सम्भव हो सकता है? जैसे-रूक्षताकारक | |||
| आहार-विहारों से वायु की वृद्धि तो होती है, क्या कोई | |||
| विचारशील पुरुष यह भी स्वीकार कर सकता है कि ऐसे | |||
| आहार-विहारों से वातदोष का शमन भी हो सकता है? फिर | |||
| 'शम' शब्द का यहाँ क्या तात्पर्य है? आप ध्यान दें! वातदोष | |||
| का संचय-काल ग्रीष्म ऋतु तथा इसका प्रकोप-काल प्रावृड् | |||
| ऋतु है। इन दिनों यदि आप रोगी को वातनाशक आहार-विहारों | |||
| का सेवन करायेंगे, तो वातदोष का संचय तथा प्रकोप नहीं हो | |||
| पायेगा। इसी प्रकार अन्य दोषों के सम्बन्ध में भी समझ लेना | |||
| चाहिये। | |||
| वातदोष का प्रकोप तथा प्रशम | |||
| लघुरूक्षमिताहारादतिशीताच्छ्रमात् तथा। | |||
| प्रदोषे कामशोकाभ्यां भीचिन्तारात्रिजागरैः ।। 46 ।। | |||
| अभिघातादपां गाहाज्जीर्णेऽन्ने धातुसङ्क्षयात्। | |||
| वायुः प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति ।। 47 ।। | |||
| लघु (भार में हल्के या शीघ्र पचने वाले) तथा रूक्ष | |||
| (स्नेहरहित) आहार द्रव्यों का सेवन करने से, मिताहार (थोड़ा | |||
| अर्थात् मात्रा से कम भोजन) करने से, अत्यन्त शीतल पदार्थों | |||
| का सेवन करने से, शक्ति से अधिक परिश्रम करने से, | |||
| कामवासना की पूर्ति न होने से, शोक से, भय से, चिन्ता से, |