भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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26 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे रात्रि में जागते रहने (समुचित नींद के न आने) से, चोट लगने से, शीतल जल में देर तक डुबकी लगाये रहने या स्नान करने से, रस आदि धातुओं का क्षय हो जाने से, भोजन के पच जाने पर, इन कारणों से प्रदोष (सायंकाल) में वातदोष का प्रकोप होता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन करने से वातदोष का शमन हो जाता है। पित्तदोष का प्रकोप तथा प्रशम विदाहिकटुकाम्लोष्णभोज्यैरत्युष्णसेवनात् । मध्याह्ने क्षुत्तृषो रोधाज्जीर्यत्यत्रेऽर्धरात्रके ।। ४८ ।। पित्तं प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति। दाहकारक, कटु (चरपरे, मिर्च आदि), खट्टे तथा उष्ण भोज्य पदार्थों का सेवन करने से अत्यन्त उष्ण (गर्मी, धूप, तथा पञ्चाग्नि आदि) का सेवन करने से, भूख तथा प्यास को रोकने से मध्याह्न काल (दोपहर) में, भोजन के पचते समय एवं आधी रात में, इन कारणों से तथा उक्त कालों में पित्तदोष प्रकुपित होता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन करने से शान्त हो जाता है। कफदोष का प्रकोप तथा प्रशम मधुरस्निग्धशीतादिभोज्यैर्दिवसनिद्रया ।। ४९ ।। मन्देऽग्नौ च प्रभाते च भुक्तमात्रे तथाऽश्रमात्। श्लेष्मा प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति।। ५० ।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे भेषजव्याख्यानकं नाम द्वितीयोऽध्यायः ।। २ ।। मीठे, चिकने, तथा शीतल, आदि (गुरु, पिच्छिल, गुण वाले) आहार द्रव्यों का सेवन करने से, दिन में सोने से, जठराग्नि के मन्द पड़ जाने से, प्रातःकाल, भोजन कर लेने के तत्काल बाद तथा परिश्रम न करने से कफदोष प्रकुपित हो जाता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन करने से उसकी शान्ति हो जाती है। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्यादि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का दूसरा अध्याय समाप्त ।। २ ।। ⁓⁓⁓⁓⁓⁓ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA