भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 356 में से

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पृष्ठ 67

तृतीयोऽध्यायः ] नाडीपरीक्षादिविधिः 31 भेषज का लक्षण (प्रशस्तदेशे सञ्जातं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम्। अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ 26 ॥ दोषघ्नमग्लानिकरमधिकं न विकारि यत्। समीक्ष्य काले दत्तं च भेषजं स्याद् गुणावहम् ॥ 27 ॥) उत्तम स्थान में उत्पन्न हुआ हो, उत्तम दिन में उखाड़ा गया हो, मात्रा थोड़ी और गुण बहुत हों, उचित गन्ध, वर्ण तथा रस से युक्त हो, दोषनाशक हो, ग्लानि न करे, अधिक खा लेने पर भी विकारकारी न हो और उचित समय पर दिया गया हो-ऐसी औषधि (दवा) गुणदायक होती है। चिकित्सा के चार पाद (भिषग् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम्। गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥ 28 ॥) भिषक् अर्थात् चिकित्सक, द्रव्य अर्थात् भेषज या औषधियाँ, उपस्थाता अर्थात् परिचारक तथा रोगी-ये चारों चिकित्सा के पाद कहे जाते हैं। यदि ये अपने-अपने उचित गुणों से युक्त हों तो विकार की शान्ति में कारण होते हैं। विविध प्रकार के दुःस्वप्न स्वप्नेषु नग्नान् मुण्डांश्च रक्तकृष्णाम्बरावृतान्। व्यङ्गांश्च विकृतान् कृष्णान्सपाशान्सायुधानपि ॥ 29 ॥ बध्नतो निघ्नतश्चापि दक्षिणां दिशमाश्रितान्। महिषोष्ट्रखरारूढान् स्त्रीपुंसो यस्तु पश्यति ॥ 30 ॥ स स्वस्थो लभते व्याधिं रोगी यात्येव पञ्चताम्। अधो यो निपत्तत्युच्चाज्जलेऽग्नौ वा विलीयते ॥ 31 ॥ श्वापदैर्हन्यते योऽपि मत्स्याद्यैर्गिलितो भवेत्। यस्य नेत्रे विलीयेते दीपो निर्वाणतां व्रजेत् ॥ 32 ॥ तैलं सुरां पिबेद् वापि लोहं वा लभते तिलान्। पक्वान्नं लभतेऽश्नाति विशेत् कूपं रसातलम् ॥ 33 ॥ स स्वस्थो लभते रोगं रोगी यात्येव पञ्चताम्। जो मनुष्य स्वप्न में नंगे, मूँड़े हुये, लाल तथा काले कपड़ों वाले, अंगहीन, विकृत (कोढ़ी आदि), काले, हथकड़ी या जाल लिये हुये, शस्त्रधारी, किसी को बाँधते हुये या मारते हुये दक्षिण दिशा की ओर खड़े हुये भैंसे, ऊँट एवं गधे पर चढ़े हुये स्त्री-पुरुषों को देखता है, वह स्वस्थ हो तो रोग को प्राप्त होता है और यदि रोगी है तो मृत्यु को प्राप्त होता है। जो मनुष्य स्वप्न में ऊँचे स्थान से गिरता है, जल अथवा आग में विलीन हो जाता है, श्वापद (कुत्ते के समान पाँच पाँव वाले सिंह, चीता आदि) जन्तुओं द्वारा मारा या घायल किया जाता है, मत्स्य (मगर, घड़ियाल) एवं अजगर आदि द्वारा निगला जाता है, जिसकी आँखें नष्ट हो जाती हैं, जलाया हुआ दीपक बुझ जाता है, तैल अथवा शराब पीता है, लोहा अथवा तिलों को प्राप्त करता है, पक्वान्न (पूरी, कचौड़ी आदि) खाता है और कुएँ अथवा पृथ्वी के भीतर (दरार आदि में) प्रवेश करता है; वह यदि स्वस्थ है तो रोग को प्राप्त हो जाता है और रोगी है तो मर जाता है। दुःस्वप्नों के प्रायश्चित्त दुःस्वप्नानेवमादींश्च दृष्ट्वा ब्रूयान्न कस्यचित् ॥ 34 ॥ स्नानं कुर्यादुषस्येव दद्याद्धेमतिलानथ। पठेत् स्तोत्राणि देवानां रात्रौ देवालये वसेत् ॥ 35 ॥ कृत्वैवं त्रिदिनं मर्त्यो दुःस्वप्नात् परिमुच्यते। उपर्युक्त बुरे स्वप्नों को देखकर किसी से न कहे (किन्तु वैद्य जी तथा आचार्य के पास तो कहना ही पड़ेगा और कहना भी चाहिये) और प्रातःकाल स्नान (यदि किसी ज्वर आदि रोग से पीड़ित न हो तो उस दशा में मानसिक स्नान कर लेना चाहिये) तथा सोना अथवा तिलों का दान करे। देवताओं के स्तोत्र (विष्णुसहस्रनाम आदि) पढ़े (अनपढ़ मनुष्य केवल ईश्वर का स्मरण ही करे) और रात्रि को देव-मन्दिर में निवास करे। इस प्रकार तीन दिन पर्यन्त करने से दुःस्वप्नों के दोषों से मुक्त हो जाता है। शुभ स्वप्न स्वप्नेषु यः सुरान् भूपाञ्जीवतः सुहृदो द्विजान् ॥ 36 ॥ गोसमिद्धाग्निटीर्थानि पश्येत् सुखमवाप्नुयात्। जो मनुष्य स्वप्न में देवताओं को, राजाओं को, जीवित मित्रों को, ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों को, गौओं को, हवनकुण्ड में जलती हुई आग को तथा तीर्थ (काशी आदि अथवा नदियों के घाटों) स्थानों को देखता है, वह सुख को प्राप्त होता है। तीर्त्वा कलुषनीराणि जित्वा शत्रुगणानपि ॥ 37 ॥ आरुह्य सौधगोशैलकरिवाहान् सुखी भवेत्। जो मनुष्य स्वप्न में मैले जलों (नालों या गन्दी नालियों) को तैरकर पार कर जाता है, शत्रुओं के झुण्डों या जत्थों को जीत लेता है और सौध (चूने से पुते हुये घर या हवेली) पर, गाय या बैल, पहाड़, हाथी और घोड़े पर चढ़ता है वह सुखी होता है।

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