भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः ] दीपनपाचनादिकथनम् 35 वाजीकरण द्रव्य का लक्षण यस्माद् द्रव्याद्भवेत् स्त्रीषु हर्षो वाजीकरं च तत् ।। 14 ।। यथा नागबलाद्याः स्युर्बीजं च कपिकच्छुजम्। जिस द्रव्य (के सेवन) से स्त्रियों के सहवास (मैथुन-क्रिया) में अधिक हर्ष की प्राप्ति या उत्साह होता है, उसे 'वाजीकर' कहते हैं; जैसे-नागबला (खिरैंटी) तथा किवाँच आदि के बीज। वक्तव्य-ये द्रव्य नपुंसकता को दूर कर वीर्य की वृद्धि भी कर सकते हैं। शुक्रल द्रव्य का लक्षण यस्माच्छुक्रस्य वृद्धिः स्याच्छुक्रलं हि तदुच्यते ।। 15 ।। यथाऽश्वगन्धा मुसली शर्करा च शतावरी। जिस द्रव्य से वीर्य (शुक्रधातु) की वृद्धि होती है, वह 'शुक्रल' कहा जाता है; जैसे-नागौरी असगन्ध, सफेद एवं काली मुसली, खाँड़ या चीनी और शतावर। शुक्र के प्रवर्तक तथा जनक द्रव्यों के लक्षण दुग्धं माषाश्च भल्लातफलमज्जामलानि च ।। 16 ।। प्रवर्तकानि कथ्यन्ते जनकानि च रेतसः। दूध, उड़द, भिलावा (शुद्ध), फलों (बादाम, अखरोट आदि) की मज्जा या गिरी तथा आँवले, ये द्रव्य वीर्य के प्रवर्तक (प्रवृत्त करने वाले) और उत्पन्न करने वाले होते हैं। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से मैथुन में शीघ्र तथा अधिक वीर्य निकलता है। प्रवर्तक आदि द्रव्यों के लक्षण प्रवर्तनी स्त्री शुक्रस्य रेचनं बृहतीफलम् ।। 17 ।। जातीफलं स्तम्भकं च शोषणी च हरीतकी। स्त्री (अभीष्ट स्त्री के दर्शन, स्पर्शन आदि) शुक्र को प्रवृत्त या चलित करती है। वनभंटा का फल शुक्र को रिक्त या च्युत करता (गिरा देता) है, जायफल उसे रोकता (स्तम्भन-शक्ति बढ़ाता) है और हरड़ शुक्र को सुखाती है। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से शुक्र पर पड़ने वाले ये भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव कहे गये हैं। इन्हें भली-भाँति समझ लेना चाहिये। आवश्यकता पड़ने पर उन-उन द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये। कुछ ऐसे मनुष्य देखे गये हैं, जो अपने आपको नपुंसक समझते थे, किन्तु जब उन्हें अभीष्ट स्त्री मिली तो पूर्ण पुरुष सिद्ध हुये। एक ऐसे मनुष्य भी देखे जो परस्त्री में सफल नहीं होता था, किन्तु वह घर में पूर्ण पुरुष था। बहुत से तो प्रथम प्रसंग में असफल, किन्तु स्नेह बढ़ने पर सफल होते हैं, इत्यादि अनेक प्रकार की बातें देखी जाती हैं। बहुतों को प्रयत्न करने पर भी वीर्यपात नहीं होता, बहुत से शीघ्रपतन के कारण स्तम्भन की खोज में लगे रहते हैं और बहुतों का वीर्य पतला होता है। इन तीनों को क्रमशः रेचन, स्तम्भन और शोषण द्रव्यों की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म द्रव्य का लक्षण देहस्य सूक्ष्मच्छिद्रेषु विशेद् यत्सूक्ष्ममुच्यते ।। 18 ।। तद्यथा सैन्धवं क्षौद्रं निम्बतैलं रुबूद्भवम्। जो द्रव्य शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म स्रोतों में प्रवेश करता है, उसे 'सूक्ष्म' कहते हैं। जैसे-सेंधानमक, मधु, नीम और एरण्ड का तैल। वक्तव्य-यों तो सभी द्रव्य पचने पर शरीर में व्याप्त होते ही हैं, परन्तु जो द्रव्य शीघ्र अपना प्रभाव दिखलाता है, वह 'सूक्ष्म' कहा जाता है। नमक खाते ही व्रण आदि में खुजली होने लगती है। एरण्ड के तैल को पेट पर लगाने मात्र से दस्त हो जाता है, इत्यादि। व्यवायी द्रव्य का लक्षण पूर्वं व्याप्याखिलं कायं ततः पाकं च गच्छति ।। 19 ।। व्यवायि तद् यथा भङ्गा फेनं चाहिसमुद्भवम्। जो द्रव्य पहले सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर (अपना प्रभाव दिखलाकर) फिर पाक को प्राप्त होता (पचता) है, उसे 'व्यवायी' कहते हैं; जैसे-भाँग तथा अफीम। वक्तव्य-भाँग आदि के सेवन करने पर पहले ही नशा हो जाता है और पचने पर उतर जाता है। बस यही इनका 'व्यवायी' नामक प्रभाव है। विकासी द्रव्य का लक्षण सन्धिवन्धांस्तु शिथिलान् यत्करोति विकासि तत् ।। 20 ।। विश्लेष्यौजश्च धातुभ्यो यथा क्रमुककोद्रवाः। जो द्रव्य धातुओं से ओज (क्रियाशक्ति) को पृथक् करके सन्धियों के बन्धनों को शिथिल (दुर्बल या ढीले) कर देता है, वह 'विकाशी' कहा जाता है; जैसे-सुपारी एवं कोदों के चावल। वक्तव्य-उक्त द्रव्यों के सेवन से शरीर में शिथिलता और कृशता आती है।