भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 356 में से

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पृष्ठ 72

३६ शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे मदकारी द्रव्य का लक्षण बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यं मदकारि तदुच्यते ।। २१ ।। तमोगुणप्रधानं च यथा मद्यं सुरादिकम् । जो द्रव्य तमोगुण की अधिकता के कारण बुद्धि (कर्तव्य- अकर्तव्य के ज्ञान) का लोप कर देता है, वह 'मदकारी' कहा जाता है; जैसे-सुरा, वारुणी आदि अनेक प्रकार के मद्य। वक्तव्य- मद्य के बुद्धिवर्द्धन आदि जो गुण लिखे गये हैं और देखे जाते हैं, वे उचित मात्रा में बहुत दिनों तक मद्यपान का अभ्यास करने पर ही पाये जाते हैं। प्रारम्भ में सब की बुद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ता ही है। इसलिये मद्य कभी भी बुद्धिवर्द्धक नहीं कहा जा सकता। विष का लक्षण व्यवायि च विकाशि स्यात् सूक्ष्मं छेदि मदावहम् ।। २२ ।। आग्नेयं जीवितहरं योगवाहि स्मृतं विषम्। जो द्रव्य व्यवायी (कामोद्दीपक), विकाशी, सूक्ष्म (ऊपर २०वाँ श्लोक देखें), छेदी, मदकारी, आग्नेय (अग्निगुणयुक्त या उष्ण), प्राणनाशक और योगवाही (संयोगी द्रव्यों के समान गुण करने वाला) हो, वह 'विष' या 'जहर' कहा जाता है; जैसे-वत्सनाभ और संखिया आदि। वक्तव्य- जिस एक द्रव्य में उक्त सभी गुण हों, वह 'विष' होता है। प्रमाथी द्रव्य का लक्षण निजवीर्येण यद् द्रव्यं स्रोतोभ्यो दोषसञ्चयम् ।। २३ ।। निरस्यति प्रमाथि स्यात् तद्यथा मरिचं वचा। जो द्रव्य अपनी शक्ति से शरीर में से दोषों के सञ्चय को निकाल देता है, वह 'प्रमाथी' कहा जाता है; जैसे-मरिच और वच। अभिष्यन्दी द्रव्य का लक्षण पैच्छिल्याद् गौरवाद् द्रव्यं रुद्ध्वा रसवहाः शिराः ।। २४ ।। धत्ते यद् गौरवं तत् स्यादभिष्यन्दि यथा दधि। जो द्रव्य अपनी पिच्छिलता (चिप-चिपाहट) से तथा गुरुता (भारीपन) से रसवाहिनी शिराओं को रोककर शरीर में भारीपन उत्पन्न करता है, वह 'अभिष्यन्दी' कहा जाता है; जैसे-दही। विदाही द्रव्य का लक्षण (विदाहि द्रव्यमुद्गारमम्लं कुर्यात् तथा तृषाम् ।। २५ ।। हृदि दाहञ्च जनयेत् पाकं गच्छति तच्चिरात्।) जो उद्गार (डकार) को खट्टा करे, प्यास एवं हृदय में दाह को उत्पन्न करे और देर से पचे, वह 'विदाही' द्रव्य होता है। लंघन द्रव्य का लक्षण (लघूष्णतीक्ष्णविशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं द्रवम् ।। २६ ।। कठिनं चैव यद् द्रव्यं प्रायस्तल्लङ्घनं स्मृतम् ।) जो लघु, उष्ण, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर, द्रव एवं कठिन हो, वह द्रव्य लंघन अर्थात् शरीर में लघुता या हल्कापन उत्पन्न करने वाला होता है। देखें-च० सू० अ० 22.12-15। बृंहण द्रव्य का लक्षण (गुरु शीतं मृदु स्निग्धं बहलस्थूलपिच्छिलम् ।। २७ ।। प्रायो मन्दस्थिरं श्लक्ष्णं द्रव्यं बृंहणमुच्यते ।) जो गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, बहल अर्थात् घन, स्थूल, पिच्छिल, मन्द (चिरकारी), स्थिर एवं श्लक्ष्ण होता है, वह द्रव्य 'बृंहण' (शरीर को बड़ा बनाने वाला) होता है। रूक्षण द्रव्य का लक्षण (रूक्षं लघु खरं तीक्ष्णमुष्णं स्थिरमपिच्छिलम् ।। २८ ।। प्रायशः कठिनं चैव यद् द्रव्यं तद्विद् रूक्षणम्।) रूक्ष, लघु, खर, तीक्ष्ण, उष्ण, स्थिर, अपिच्छिल तथा जो द्रव्य प्रायः कठोर होता है, वह द्रव्य रूक्षण (रूखापन उत्पन्न करने वाला) होता है। स्नेहन द्रव्य का लक्षण (द्रवं सूक्ष्मं सरं स्निग्धं पिच्छिलं गुरु शीतलम् ।। २९ ।। मन्दं मृदु च यत् प्रायस्तद् द्रव्यं स्नेहनं मतम्।) द्रव, सूक्ष्म, सर, स्निग्ध, पिच्छिल, गुरु, शीतल, मन्द तथा जो द्रव्य प्रायः मृदु होता है, वह स्नेहन कहा जाता है। स्वेदन द्रव्य का लक्षण (उष्णं तीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।। ३० ।। द्रव्यं गुरु च यत् प्रायः तद्धि स्वेदनमुच्यते।) उष्ण, तीक्ष्ण, सर, स्निग्ध, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव, स्थिर तथा जो द्रव्य प्रायः गुरु गुणों से युक्त होता है, वह द्रव्य 'स्वेदन' या पसीना लाने वाला होता है। श्लक्ष्ण द्रव्य का लक्षण (श्लक्ष्णः स्नेहं विनापि स्यात् कठिनोऽपि हि चिक्कणः ।। ३१ ।।) जो स्निग्धता से रहित तथा कठोर होते हुये भी चिकना होता है, वह 'श्लक्ष्ण' होता है।

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