भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः] दीपनपाचनादिकथनम् 37

स्थिर, सर, पिच्छिल द्रव्य का लक्षण (स्थिरो वातमलस्तम्भी सरस्तेषां प्रवर्त्तकः। पिच्छिलस्तन्तुलो बल्यः सन्धानः श्लेष्मलो गुरुः ।। 32 ।।) 'स्थिर' वायु एवं मल का निरोधक तथा 'सर' उनका प्रवर्त्तक होता है और 'पिच्छिल' चिपचिपा, बलकारक, जोड़ने वाला, कफकारक और गुरु होता है। विशद द्रव्य का लक्षण (क्लेदच्छेदकरः ख्यातो विशदो व्रणरोपणः।) जो क्लेद या आर्द्रता का विनाश करे और व्रण या घाव को भरे वह 'विशद' होता है। स्थूल द्रव्य का लक्षण (स्थूलः स्थौल्यकरो देहे स्रोतसामवरोधकृत् ।। 33 ।।) जो देह में स्थूलता या मोटापा पैदा करे और स्रोतों में रुकावट पैदा करे, वह 'स्थूल' कहा जाता है। द्रव एवं सान्द्र द्रव्य का लक्षण (द्रवः क्लेदकरो व्यापी सान्द्रस्तद् विपरीततः।) जो क्लेदकारक एवं व्याप्तिशील हो, वह 'द्रव' कहा जाता है और जो इसके विपरीत गुणों वाला हो, वह 'सान्द्र' होता है।

तीक्ष्ण एवं मन्द द्रव्य का लक्षण (तीक्ष्णश्चाशुकरी देहे धावत्यम्भसि तैलवत् ।। 34 ।। मन्दः सकलकार्याणि शैथिल्येन करोति हि।) जो शीघ्रकारी हो और जल पर तैल के समान शरीर में फैल जाता हो, वह 'तीक्ष्ण' होता है। जो सब कामों को विलम्ब से करता है, वह 'मन्द' होता है।

मृदु एवं कर्कश द्रव्य का लक्षण (मृदु मार्दवकृद्देहे कर्कशः कर्कशत्वकृत् ।। 35 ।।) इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे दीपनपाचनादिकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ।। 4 ।। जो देह में मृदुता या कोमलता उत्पन्न करे, वह 'मृदु' कहा जाता है और जो कर्कशता (खुरदरापन) पैदा करे, वह 'कर्कश' होता है।


इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का चौथा अध्याय समाप्त ।। 4 ।।