शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः कलादिकाख्यानम्
शरीर-परिचय कलाः सप्ताशयाः सप्त धातवः सप्त तन्मलाः। सप्तोपधातवः सप्त त्वचः सप्त प्रकीर्तिताः ।। 1 ।। त्रयो दोषा नवशतं स्नायूनां सन्ध्यस्तथा। दशाऽधिकं च द्विशतमस्थ्नां च त्रिशतं तथा ।। 2 ।। सप्तोत्तरं मर्मशतं शिराः सप्तशतं तथा। चतुर्विंशतिराख्याता धमन्यो रसवाहिकाः ।। 3 ।। मांसपेश्यः समाख्याता नृणां पञ्चशतं बुधैः। स्त्रीणां च विंशत्यधिकाः कण्डराश्चैव षोडश ।। 4 ।। नृदेहे दश रन्ध्राणि नारीदेहे त्रयोदश। ( असङ्ख्येयानि स्रोतांसि जालानि चैव षोडश ।। 5 ।। षट् च कूर्चा समाख्याताश्चतस्रो रज्जवः स्मृताः। सेवन्यः सप्त सङ्ख्याताः सङ्घाताश्च चतुर्दश ।। 6 ।। चतुर्दशैव सीमन्ता एका जिह्वा प्रकीर्तिता।) एतत् समासतः प्रोक्तं विस्तरेणाधुनोच्यते ।। 7 ।।
मानव-शरीर में कलाएँ सात, आशय सात, धातुएँ सात, धातुओं के मल सात, उप-धातुएँ सात और त्वचाएँ भी सात कही गयी हैं। दोष तीन, स्नायु नौ सौ (900), सन्धियाँ दो सौ दश (210), हड्डियाँ तीन सौ (300), मर्म एक सौ सात (107), सिराएँ सात सौ (700) और रसवाहिनी धमनियाँ चौबीस (24) कही गयी हैं। मांसपेशियाँ पुरुष के शरीर में पाँच सौ (500) तथा स्त्री के शरीर में पाँच सौ बीस (520) कही जाती हैं और कण्डराएँ सोलह (16) (स्त्री-पुरुष दोनों)। रन्ध्र या छिद्र (बहिर्मुखी स्रोत) पुरुष के शरीर में दस (10) और स्त्री के शरीर में तेरह (13) होते हैं। शरीर के भीतरी स्रोतस् असंख्य या अगणित हैं। जाल सोलह हैं, कूर्च छः हैं, रज्जु चार हैं, सेवनी सात हैं, संघात चौदह हैं, सीमन्त भी चौदह हैं और जीभ एक है। यह संक्षेप में (अर्थात् अवयवों की संख्या मात्र) कहा गया है और विस्तार में आगे कहा जायेगा। देखें-सु० शा० अ० 5 सम्पूर्ण ।
कला का वर्णन मांसासृङ्मेदसां तिस्रो यकृत्प्लीह्नोश्चतुर्थिका। पञ्चमी च तथाऽन्त्राणां षष्ठी चाग्निधरा मता ।। 8 ।। रेतोधरा सप्तमी स्यादिति सप्त कलाः स्मृताः।
मांस, रक्त और मेदा की तीन, यकृत् और प्लीहा को चौथी, अँतड़ियों की पाँचवीं, अग्नि, धरा या पित्त को धारण करने वाली छठी और शुक्र को धारण करने वाली सातवीं, इस प्रकार कलाएँ सात कही गयी हैं।
वक्तव्य- माड़ी लगाकर पालिश किये हुये रेशमी कपड़े के जैसी जो झिल्लियाँ शरीर के भीतर पायी जाती हैं, उन्हें 'कला' कहते हैं। मांसधरा कला वह है, जो प्रत्येक मांसपेशी के ऊपर चढ़ी रहती है। उसी प्रकार रक्तवाही स्रोतों की भीतरी दीवार पर रहने वाली कला रक्तधरा कही जाती है। मेदा को धारण करने वाली 'मेदोधरा', यकृत् और प्लीहा की आवरणभूत 'यकृत्प्लीहाधरा', आमाशय से मलाशय तक के स्रोत के भीतर अन्नधरा, अग्निरस या पित्तरस की थैली में 'अग्निधरा' तथा शुक्र स्रोतों में 'शुक्रधरा' कला है। देखें-सु० शा० अ० 4।
कला-परिचय (धात्वाशयान्तरस्थस्तु यः क्लेदस्त्वधितिष्ठति ।। 9 ।। देहोष्मणा विपक्वश्च सा कलेत्यभिधीयते। स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्ततांश्र्च जरायुणा ।। 10 ।। श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान् विदुः ।)
धातु एवं आशयों के भीतर जो क्लेद (गीलापन, शरीरोपयोगी होकर) रहता है और शरीरव्यापी ऊष्मा (उष्णता)