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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 39


[बायाँ स्तम्भ]

से जो पक जाती है, वह 'कला' कही जाती है। कला का स्वरूप-स्नायु सूत्रों से बुने हुये, जरायु से भली-भाँति व्याप्त और श्लेष्मा से लिपटे हुये भागों को 'कला' जानना चाहिये।

**वक्तव्य—**माड़ी लगाकर पालिश किये हुये रेशमी कपड़े की-सी अथवा मोमी कागज की-सी झिल्लियाँ 'कला' कही जाती हैं।

आशय-परिचय

श्लेष्माशयः स्यादाुरसि तस्मादामाशयस्त्वधः ।। 11 ।। ऊर्ध्वमग्न्याशयो नाभेर्वामभागे व्यवस्थितः। तस्योपरि तिलं ज्ञेयं तदधः पवनाशयः ।। 12 ।। मलाशयस्त्वधस्तस्माद् वस्तिर्मूत्राशयस्त्वधः। जीवरक्ताशय्यमुरो ज्ञेयाः सप्ताशयास्त्वमी ।। 13 ।। पुरुषेभ्योऽधिकाश्चान्ये नारीणामाशयास्त्रयः। धरा गर्भाशयः प्रोक्तः स्तनौ स्तन्याशयौ मतौ ।। 14 ।।

मध्यकाय के भीतर सात आशय हैं। यथा-1. उरःस्थल के भीतर श्लेष्माशय (फुफ्फुस)। 2. उसके नीचे आमाशय। 3. आमाशय के ऊपर नाभि के बायीं ओर अग्न्याशय, अग्न्याशय के ऊपर तिल अर्थात् क्लोम है। 4. आमाशय के नीचे पवनाशय है। 5. पवनाशय के नीचे मलाशय है। 6. उसके नीचे मूत्राशय है, जिसका नाम 'वस्ति' है। और 7. जीव तथा रक्त का या जीवरक्त का आशय उर अर्थात् हृदय है। इस प्रकार ये सात 'आशय' हैं, जो पुरुष, स्त्री, नपुंसक सभी में होते हैं और पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के मध्यकाय में तीन आशय अधिक होते हैं-1. गर्भाशय जिसे धरा कहते हैं और 2. स्तन्याशय जो स्तन कहे जाते हैं। स्तन दो होते हैं, अतः ये तीन आशय कहे जाते हैं।

**वक्तव्य—**आशय का अर्थ है—'आ = आश्रित्य शेते द्रव्यं अस्मिन्, इति आशयः'। अर्थात् जिसमें द्रव्य शयन करे वह 'आशय' कहलाता है। देखें—सु० सू० 21 तथा सु० शा० 5।

धातुओं का उत्पत्ति-क्रम

रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः। जायन्तेऽन्योन्यतः सर्वे पाचिताः पित्ततेजसा ।। 15 ।।

शरीर में रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि (हड्डी), मज्जा और शुक्र ये सात धातुएँ होती हैं और ये पित्त के तेज (उष्णता) से पके हुये एक-दूसरे से उत्पन्न होते हैं।

**वक्तव्य—**आहार में उक्त सातों ही धातुओं के मूल कारण या उत्पादक तत्त्व विद्यमान होते हैं। आहार के परिपाक होने


[दायाँ स्तम्भ]

पर सारभूत जो पदार्थ आहार से पृथक् होता है, वह रस 'धातु' कहा जाता है। यह रसवाहिनियों द्वारा सम्पूर्ण धातुओं का पोषण करता है। 'धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः गुणसमानभूयिष्ठैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति' तथा 'तस्मान्मांसं मांसेन, लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थ्ना, मज्जा मज्ज्ञा, शुक्रं शुक्रेण'। च० शा० अ० 6। रस धातु का जितना भाग रञ्जक, पित्त द्वारा रंग दिया जाता है, वह 'रक्तधातु' कहलाता है। वह भी धमनियों द्वारा सम्पूर्ण धातुओं का पोषण करता है। इसी प्रकार सभी धातु पुष्ट होते रहते हैं। मांस मांसपेशियों के रूप में रहता है, मेदा जमे हुये घी जैसा पदार्थ है, जो त्वचा के नीचे पाया जाता है, अस्थि या हड्डी प्रसिद्ध ही है, मज्जा हड्डियों के भीतर पाया वाला स्नेह है और शुक्र या वीर्य 'रेतस्' नाम से प्रसिद्ध है।

धातुओं के नाम

(रसाद् रक्तं ततो मांसं मांसात् मेदः प्रजायते। मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसम्भवः ।। 16 ।।)

रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेदा, मेदा से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र उत्पन्न होता है।

**वक्तव्य—**आयुर्वेदिक ग्रन्थों में धातुओं की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दो प्रकार के वचन मिलते हैं-1. वे जो उपर्युक्त श्लोक के वक्तव्य में दिखलाये गये हैं और 2. 'पूर्वः पूर्वोऽतिवृद्धत्वात् वर्धयेद्धि परं परम्'। तथा 'रसाद्रक्तं ततो मांसम्' इत्यादि (सु० सू० अ० 15.18) विचार करने पर दोनों ही क्रम युक्तियुक्त प्रतीत होते हैं, क्योंकि सभी धातुओं में सभी धातुओं के मूल कारण विद्यमान रहते हैं। अतएव आचार्य महोदय ने दोनों ही क्रमों को सूत्र रूप से व्यक्त कर दिया है। तथा—'तत्रैतेषां धातूनाम् अन्नपानरसः प्रीणयिता एवं तेषां (धातूनां) क्षयवृद्धी शोणितनिमित्ते'। (सु०सू० अ० 14)।

धातुओं के मुख्य कार्य

प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणे। गर्भोत्पादश्च कर्माणि धातूनां कथितानि च ।। 17 ।।

रस का कर्म-सन्तोष या तृप्ति तथा दूसरी सभी धातुओं का पोषण करना है। रक्त का कर्म-जीवन, प्राणी को जीवित रखना है। मांस का कर्म-सिरा, स्नायु तथा अस्थियों का संवरण या आच्छादन करना है। मेदा का कर्म-सम्पूर्ण शरीर को स्निग्ध रखना है। अस्थि का कर्म-शरीर को धारण करना है। मज्जा का कर्म-अस्थियों को पूर्ण रखना और शुक्र का