शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 41 स्वेदो दन्तास्तथा केशास्तथैवौजश्च सप्तमम्।। २९।। इति धातुभवा ज्ञेया एते सप्तोपधातवः। 'स्तन्य' (दुग्ध) रसधातु का तथा 'रस' (मासिक स्राव) रक्तधातु का उपधातु है। ये दोनों स्त्रियों को ही होते हैं और समय-समय पर निकलते हैं। 'वसा' मांस में रहने वाला स्नेह है, जो कि मांस का उपधातु कहा जाता है। 'स्वेद' (पसीना) मेदा का उपधातु है। 'दाँत' अस्थि के उपधातु हैं। 'केश' मज्जा का और 'ओजः' शुक्र का उपधातु है। इस प्रकार धातुओं से उत्पन्न होने वाले ये सात पदार्थ 'उपधातु' कहे जाते हैं। वक्तव्य—स्तन्य (दूध) एवं रजस् पुरुषों में भी होते हैं, ध्यान दें—जब कोई पुरुष से स्त्री बन जाता है अथवा ऑपरेशन करके बना दिया जाता है, तब उक्त दोनों उपधातु पुष्ट होकर समय पर प्रवृत्त होते हैं। आजकल अमेरिका आदि देशों में पुरुष को स्त्री तथा स्त्री को पुरुष बना दिया जाता है। और कभी-कभी स्वयं भी धीरे-धीरे उक्त परिवर्तन होते देखा जाता है। कलकत्ता के अस्पताल में 100 वर्ष के भीतर तीन- चार ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं। स्तन्य का स्वरूप (रसप्रसादो मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः।। ३०।। कृत्स्नदेहात् स्तनौ प्राप्तः स्तन्यमित्यभिधीयते।) आहार परिपक्व होने पर जो स्वच्छ एवं मधुर रस उत्पन्न होता है, वह सम्पूर्ण शरीर का पोषण करने के लिए पूरे शरीर में भ्रमण करता है। जब माता प्रेमपूर्वक शिशु को दूध पिलाने के लिए उत्सुक होती है, तब सम्पूर्ण शरीर से आकर स्तनों में जो रस प्राप्त होता है, वही 'स्तन्य' या दूध कहा जाता है। रजस् का स्वरूप (शशासृक्प्रतिमं यत्तु यद् वा लाक्षारसोपमम्।। ३१।। तदार्तवं प्रशंसन्ति यद् वासो न विरञ्जयेत्।) जो खरगोश के रक्त जैसा हो अथवा लाही के रस जैसा (गहरा लाल) हो और जो सफेद कपड़े को विरूप न करे अर्थात् रजस् से लिपे हुये वस्त्र को धोने पर उसका दाग या धब्बा न पड़े, वह 'आर्तव' (मासिक स्राव) शुद्ध होता है। वसा का स्वरूप (गोसर्पिर्निभा पीता त्वचोऽधः संस्थिता च या।। ३२।। शीतातपसहा स्निग्धा सा वसा परिकीर्तिता।) गाय के घी जैसी पीली, त्वचा के नीचे पूरे शरीर को आच्छादित किये हुये स्थित ('वस् आच्छादने' धातु का रूप वसा शब्द है) अतएव शीत और धूप को सहनेवाली तथा स्निग्ध द्रव्य को 'वसा' कहा जाता है। स्वेद का स्वरूप (त्वचातो लवणः स्रावो व्यक्तोऽव्यक्तोऽनिशं स्रवेत् ।। ३३ ।। स स्वेदश्च समाख्यातः क्लेदत्वङ्मृदुताकरः।) त्वचा से जो नमकीन-सा स्राव प्रत्यक्ष (गर्मियों में) अथवा अप्रत्यक्ष (शीतकाल में) निरन्तर निकलता है वह 'स्वेद' (पसीना) कहलाता है। वह रोमकूपों को आर्द्र एवं त्वचा को मृदु बनाये रखता है। दाँत का स्वरूप (दन्ताः श्वेता दृढाः श्लक्ष्णा द्वात्रिंशत्सङ्ख्यका मताः।। ३४ ।। बालानान्तु चतुर्विंशत् चर्वणच्छेद्नार्थकाः।) दाँत सफेद, दृढ़ या कठोर तथा चिकने होते हैं। ये संख्या में 32 या 28 होते हैं, किन्तु बालकों के दूध के दाँत केवल 24 ही होते हैं। दाँतों का कार्य चबाना और काटना है। केश का स्वरूप (केशाः शीर्षे मुखे श्मश्रु नेत्रे पक्ष्मध्रुवौ मतौ।। ३५ ।। तनौ रोमाणि जायन्ते करपादतले विना।) हाथ, पाँव, तलुओं के अतिरिक्त मनुष्य के सम्पूर्ण शरीर पर बाल होते हैं। जैसे-सिर पर केश, मुख पर श्मश्रु या दाढ़ी-मोछ, नेत्र पर पक्ष्म तथा भौंहें और शेष शरीर पर रोम होते हैं। ओजस् का स्वरूप ओजः सर्वशरीरस्थं शीतं स्निग्धं स्थिरं सरम्।। ३६ ।। सोमात्मकं शरीरस्य बलपुष्टिकं मतम्। ओजस् सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है। यह शीत एवं स्निग्ध है और जीवन भर शरीर में रहता है। सर एवं सौम्य है और शरीर को बलवान् और पुष्ट करता है। त्वचाओं का स्वरूप तथा नाम ज्ञेयावभासिनी पूर्वं सिध्मस्थानं च सा मता।। ३७ ।। द्वितीया लोहिता ज्ञेया तिलकालकजन्मभूः। श्वेता तृतीया सङ्ख्याता स्थानं चर्मदलस्य सा।। ३८ ।। ताम्रा चतुर्थी विज्ञेया किलासश्वित्रभूमिका। पञ्चमी वेदनी ख्याता सर्वकुष्ठोद्भवस्थलः।। ३९ ।। विख्याता रोहिणी षष्ठी ग्रन्थिगण्डापचीस्थितिः। स्थूला त्वक्सप्तमी ख्याता विद्रध्यादेः स्थितिश्च सा।। ४० ।। इति सप्त त्वचः प्रोक्ता स्थूला व्रीहिद्विमात्रया।