शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें42 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
पहली या बाहर की त्वचा का नाम 'अवभासिनी' (कृष्ण, गौर, पीत और रक्त वर्ण को अवभासित करने वाली) है, सिध्म या सेहुँआ इसी में होता है। दूसरी का नाम 'लोहिता' यहाँ तक रक्त-कोशिकाएँ आयी रहती हैं) यह तिल और झांई का स्थान है। तीसरी का नाम 'श्वेता' (सफेद होने के कारण) है, यह चर्मदल या चम्मल का स्थान है। चौथी 'ताम्रा' (अत्यन्त लाल) है, यह किलास (लाल वर्ण का श्वेतकुष्ठ) एवं श्वेतकुष्ठ या फुलबहरी का स्थान है। पाँचवीं 'वेदनी' (स्पर्शज्ञान का विशिष्ट स्थान) है, यहाँ पर सब प्रकार के कुष्ठ होते हैं। छठी 'रोहिणी' (प्ररोहों या अंकुरों वाली होने के कारण) कही जाती है, यह ग्रन्थियों (बिना मुख के फोड़े), गलगण्ड (घेंघा) और अपची (गण्डमाला) का स्थान है और सातवीं 'स्थूला' (मोटी) नामक त्वचा है, जो विद्रधि आदि का स्थान है। इस प्रकार ये सात त्वचाएँ कही गयी हैं। ये सब दो मांसल स्थानों पर जौ के बराबर मोटी होती हैं। वक्तव्य-त्वचा शब्द 'त्वच् संवरणे' धातु से बना है, जिसका अर्थ है-शरीर का संवरण करना या उसे ढँकना। विशेष जानने के लिए देखें-सु० शा० अ० 4.4 और च० शा० अ० 7.4। 'षट् त्वचः'-च० चि० 15.17। दोषों का वर्णन वायुः पित्तं कफो दोषा धातवश्च मलास्तथा ।। 41 ।। तत्रापि पञ्चधा ख्याताः प्रत्येकं देहधारणात् । वायु, पित्त और कफ ये दोष, धातु और मल माने जाते हैं। शरीर के भिन्न-भिन्न अवयवों में रहकर शरीर को धारण करने के कारण ये एक-एक तथा पाँच-पाँच प्रकार के कहे जाते हैं। दोष आदि संज्ञाओं का हेतु (शरीरदूषणाद् दोषा धातवो देहधारणात् ।। 42 ।। वातपित्तकफा ज्ञेया मलिनीकरणान्मलाः ।) ये वात, पित्त तथा कफ शरीर को दूषित (दुःखित) करने के कारण 'दोष' कहे जाते हैं, शरीर को धारण (स्वस्था- वस्था में सुखी) करने के कारण 'धातु' और शरीर को मलिन या मैला (रुग्ण) करने के कारण 'मल' कहे जाते हैं। दोषों में वायु की प्रधानता पित्तं पङ्गुः कफः पङ्गुः पङ्गवो मलधातवः ।। 43 ।। वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत् । पित्त पंगु (परतन्त्र) है, कफ पंगु है, मल और धातु भी पंगु हैं। इनको वायु जहाँ ले जाती है, वहीं ये मेघ (बादल) के समान चले जाते हैं। वक्तव्य-इस पाठ से वायु की वह महत्ता बतलायी है, जिसका विस्तृत वर्णन चरकसंहिता सू० अ० 12 तथा सु० नि० अ० 1 में किया गया है। वात के गुण, स्थान तथा नाम पवनस्तेषु बलवान् विभागकरणान्मतः ।। 44 ।। रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः । मलाशये चरेत् कोष्ठे वह्निस्थाने तथा हृदि ।। 45 ।। कण्ठे सर्वाङ्गदेशेषु वायुः पञ्च प्रकारतः । अपानः स्यात् समानश्च प्राणोदानौ तथैव च ।। 46 ।। व्यानश्चेति समीरस्य नामान्युक्तान्यनुक्रमात् । तीनों दोषों में वायु ही बलवान् है, क्योंकि वह शरीर के प्रत्येक अवयवों का विभाग करता है। वह रजोगुणयुक्त है, सूक्ष्म है, शीत है, रूक्ष है, लघु (हल्का) है और चल (गीतशील) है। वह मलाशय में, अग्न्याशय में, हृदय में, कण्ठ (सामीप्यात् फुफ्फुस तक में) तथा समस्त शरीर में विचरता रहता है। अतएव इसके पाँच भेद माने जाते हैं और इन स्थानों में विचरने वाले वायु के क्रमशः पाँच नाम ये हैं-1. अपान, 2. समान, 3. प्राण, 4. उदान और 5. व्यान। वक्तव्य-यद्यपि वायु एक ही है, तथापि स्थान और कर्म के भेद से पाँच प्रकार का कहा गया है। तदनुसार ही इसके पाँच नाम भी रखे गये हैं-वायु शब्द 'वा गतिगन्धनयोः' धातु से बना है, जिसका अर्थ है-'वाति गच्छति इति वायुः' अर्थात् यह सर्वदा चलता रहता है, इसी प्रकार इसके पाँच नाम अत्यन्त विचारपूर्वक रखे गये हैं। यथा-'अप अधस्तात् अनिति प्राणिति गच्छति (अन् प्राणे-अ० प० से०) इति अपानः' अर्थात् जो नीचे की ओर चलता है। यही मल-मूत्रादि का त्याग कराता है और अधोवायु के रूप में निकलता है। समान-'सम्यक् अनिति इति समानः' जो पाचन क्रिया का सम्पादन करता है। प्राण-'प्रकर्षेण अनिति इति प्राणः' अर्थात् जो हृदय का सञ्चालन करता है। उदानः-'उद् ऊर्ध्वम् अनिति इति उदानः' अर्थात् जो ऊपर को प्रश्वास के रूप में आता-जाता है और व्यानः-'विशेषेण आसमन्तात् सर्वतः अनिति इति व्यानः', अर्थात् जो विशेष रूप से सम्पूर्ण शरीर में गति करता है, वह व्यान कहा जाता है। इस प्रकार वायु ही जीवन का प्रधान कारण माना जाता है।