भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 43


पित्त के गुण, स्थान तथा नाम

पित्तमुष्णं द्रवं पीतं नीलं सत्त्वगुणोत्तरम् ।। 47 ।। कटुतिक्तरसं ज्ञेयं विदग्धं चाम्लतां व्रजेत् । अग्न्याशये भवेत् पित्तमग्निरूपं तिलोन्मितम् ।। 48 ।। त्वचि कान्तिकरं ज्ञेयं लेपाभ्यङ्गादिपाचकम् । दृश्यं यकृति यत् पित्तं तद्रसं शोणितं नयेत् ।। 49 ।। यत् पित्तं नेत्रयुगले रूपदर्शनकारि तत् । यत् पित्तं हृदये तिष्ठेन्मेधाप्रज्ञाकरं च तत् ।। 50 ।। पाचकं भ्राजकं चैव रञ्जकालोचके तथा। साधकं चेति पञ्चैव पित्तनामान्यनुक्रमात् ।। 51 ।।

पित्त उष्ण (गर्म) है, द्रव (पतला या तरल) है, पीला है, नीला है, सत्त्वगुण-प्रधान है, चरपरा और कड़वा है। जब वह विकृत हो जाता है तो खट्टा हो जाता है। अग्न्याशय में जो पित्त है, वह अग्निरूप है और तिलपरिमित है। त्वचा में जो पित्त है, वह शरीर की कान्ति (चमक) का उत्पादक तथा लेप और अभ्यंग (मालिश का स्नेह) का पाचक या शोषक है, यकृत में जो पित्त है, वह वमन (खट्टी और कड़वी कै के रूप) में दिखलायी पड़ता है एवं रस को रक्त बनाता है। जो पित्त दोनों आँखों में है, वह रूप का दर्शन कराता है और जो पित्त हृदय में रहता है, वह मेधा (बुद्धि) तथा प्रज्ञा (सोचने-विचारने को शक्ति) का हेतु है। इसी प्रकार स्थानों के अनुक्रम से पित्त के ये पाँच नाम हैं। यथा-1. पाचक, 2. भ्राजक, 3. रञ्जक, 4. आलोचक और 5. साधक।

वक्तव्य—ताप या सन्तापजनक पदार्थ का नाम पित्त है। देखें अमरकोष-अपि+दो+क्त, वायु के समान एक ही पित्त के कार्यभेद तथा स्थानभेद से पाँच नाम रखे गये हैं जो कि सार्थक हैं। यथा-‘पचति आहारम् इति पाचकम् ’=आहार को पकाता है। ‘भ्राजयति प्रकाशयति वर्णम् इति भ्राजकम्’ = वर्ण को प्रकाशित करता है। ‘रञ्जयति रक्तीकरोति रसम् इति रञ्जकम्’ = रस को रक्त बनाता है। ‘आलोचयति दर्शयति रूपम् इति आलोचकम्’ = रूप को दिखाता है और ‘साधयति कार्याणि इति साधकम्’ = कार्यों को सिद्ध करता है।


कफ के गुण, स्थान तथा नाम

कफः स्निग्धो गुरुः श्वेतः पिच्छिलः शीतलस्तथा। तमोगुणाधिकः स्वादुविदग्धो लवणो भवेत् ।। 52 ।। कफश्चामाशये मूर्ध्नि कण्ठे हृदि च सन्धिषु । तिष्ठन् करोति देहस्य स्थैर्यं सर्वाङ्गपाटवम् ।। 53 ।। क्लेदनः स्नेहनश्चैव रसनश्चावलम्बनः। श्लेष्मकश्चेति नामानि कफस्योक्तान्यनुक्रमात् ।। 54 ।।

कफ या श्लेष्मा स्निग्ध है, गुरु है, श्वेत है, पिच्छिल (चिपचिपा) है, शीतल है, तमोगुणयुक्त है और मीठा है। वह जब विदग्ध या दूषित हो जाता है, तो नमकीन हो जाता है (खखार या बलगम में यही निकलता है)। कफ आमाशय में शिर के भीतर, कण्ठ (और फुस्फुसों) में, हृदय में तथा शरीर की सम्पूर्ण सन्धियों में रहता हुआ शरीर में स्थिरता या सामर्थ्य (जिसके कारण शरीर के सभी अवयव यथास्थान स्थित रहते हैं) और सम्पूर्ण अंगों की पटुता (क्रियाशील या गति) को करता है। वायु और पित्त के समान कफ के भी उक्त स्थानों में क्रम से ये पाँच नाम हैं—1. क्लेदन, 2. स्नेहन, 3. रसन, 4. अवलम्बन और 5. श्लेष्मक।

वक्तव्य—वात और पित्त के समान कफ के भी स्थानभेद से पाँच नाम हैं और वे भी सार्थक हैं। यथा-‘क्लेदयति क्लिद्यते वा अनेन अन्नम् इति क्लेदनः’ = आहार को क्लिन्न या आर्द्र या गीला करता है। ‘स्नेहयति स्निह्यते अनेन वा शिरः, इति स्नेहनः’ = यह शिर या मस्तिष्क को स्निग्ध या तर करता है। ‘रसयति रसं ज्ञापयति अथवा रस्यते रसो मधुरादिः अनेन इति रसनः’ = रस का अनुभव कराता है; इसकी विकृति से ही रसज्ञान का लोप हो जाता है। ‘अवलम्बयति धारयति हृदयम् अथवा अवलम्ब्यते धार्यते वा हृदयम् अनेन इति अवलम्बनः’ = यह हृदय-यन्त्र को धारण करता है; इसके घट जाने से हृदय धड़कने लगता है और ‘श्लेषयति योजयति सन्धीन् इति श्लेष्मकः’ = सन्धियों को सटाता या जोड़ता है। तीनों दोषों का पूर्व विवेचन सु० सू० अ० 21 में देखें।


(स्नायवो बन्धनं प्रोक्ता देहे मांसास्थिमेदसाम्। सन्धीनामपि यत्तास्तु शिराभ्यः सुदृढ़ाः स्मृताः ।। 55 ।।)

‘स्नायु’ शरीर में मांसपेशियों, हड्डियों, मेदस तथा सन्धियों के बन्धन (अर्थात् उन्हें बाँधने वाले) कहे जाते हैं और वे शिराओं की अपेक्षा अधिक दृढ़ होते हैं।

वक्तव्य—‘स्नायु’ डोरी या बटे हुये धागे जैसी अत्यन्त दृढ़ होती हैं, इनसे धनुष की डोरी और शिकार के जाल बनाये जाते हैं।


सन्धि-परिचय

सन्ध्यश्चाङ्गसन्धानाद् देहे प्रोक्ताः कफान्विताः। (अस्थ्नां ते द्विविधाः सन्ति चेष्टावन्तः स्थिरास्तथा ।। 56 ।।