भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 356 में से

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पृष्ठ 80

शाखाहनुषु कट्यां च चेष्टावन्तो भवन्ति हि। शेषास्तु सन्धयः सर्वे स्थिरास्तज्ज्ञैरुदाहृताः।। 57।।) शरीर में जिस स्थान पर अंगों का सन्धान या जोड़ होता है, उस स्थान को 'सन्धि' कहते हैं। ये स्थान 'श्लेष्मक' नामक कफ से युक्त होते हैं। प्रायः हड्डियों के जोड़ों को ही सन्धि कहते हैं और वे दो प्रकार की होती हैं-1. चेष्टावान् अर्थात् चल और 2. स्थित अर्थात् अचल। शाखाओं (टांगों और बाहों) में, हनु तथा कमर में 'चेष्टावान्' सन्धियाँ होती हैं और शेष सभी सन्धियाँ 'स्थिर' मानी जाती हैं। वक्तव्य-ये सन्धियाँ केवल हड्डियों की ही हैं। मांसपेशी, स्नायु एवं सिराओं की सन्धियों की संख्या अनन्त होने के कारण वे असंख्येय हैं। अस्थि-परिचय आधारश्च तथा सारः कायेऽस्थीनि बुधा जगुः। (आभ्यन्तरगतः सार आधारो भूरुहां यथा।।58।।) आयुर्वेद के ज्ञाता विद्वान् अस्थियों या हड्डियों को शरीर का वैसा आधार एवं सार (शरीर भर में सबसे ठोस) कहते हैं। जैसे वृक्षों का भीतरी सार उनका आधार होता है। वक्तव्य-अस्थियों की संख्या के सम्बन्ध में शास्त्रकारों का मतभेद है। यथा-वेद, धर्मशास्त्र एवं चरक आदि कायचिकित्सा की संहिताएँ 360, सुश्रुत या शल्यतन्त्र 300, यूनानी चिकित्साशास्त्र 242 तथा आधुनिक प्रत्यक्षाभिमानी 200 (प्रत्यक्षशारीर अ० 3) एवं (हमारे शरीर की रचना वाले) 206 मानते हैं। इसका कारण अपना-अपना दृष्टिकोण ही है। मर्म-परिचय (सन्निपातान् सिरास्नायुसन्धिमांसास्थिसम्भवान्।) मर्माणि जीवाधाराणि प्रायेण मुनयो जगुः।। 59।। सिरा, स्नायु, सन्धि, मांस एवं अस्थियों में होने वाले 'सन्निपातों' या संयोगों को कर्म कहते हैं। माननीय मुनियों का कथन है कि वे जीव के विशिष्ट स्थान हैं। वक्तव्य-विशेष जानने के लिए देखें-सु०शा०अ० 6। सिरा-परिचय सन्धिबन्धनकारिण्यो दोषधातुवहाः सिराः। (नाभ्यां सर्वा निबद्धास्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ।। 60।।) ये 'सिरा' सन्धियों को बाँधने का कार्य भी करती हैं और दोष तथा धातुओं का वहन या प्रापण (शरीर में पहुँचाना रूपी कार्य) भी करती हैं। वे सब नाभि में उत्पन्न होकर समस्त शरीर में फैली हुई रहती हैं। वक्तव्य-यह 'नाभि' ढूँड़ी या धुत्री नामक उदर के बहिर्भाग का दृश्यमान गढ्ढा नहीं है, अपितु आमाशय एवं पक्वाशय का मध्यभाग अन्न या अँतड़ी नामक अवयव है, जिसमें भुक्त अन्न का पाक (पाक होकर उससे 'रस' पृथक्) हो जाता है। इस 'रस' को उक्त सिराएँ शरीर में पहुँचाती रहती हैं। इस 'रस' में दोष (वातादि) तथा धातुओं (रक्तादि) के उपादान विद्यमान रहते हैं। जिनसे उनकी पुष्टि होती रहती है। अवशिष्ट सारहीन या रसहीन मलद्रव्य पक्वाशय अर्थात् मलाशय में चला जाता है। इसका वर्णन पूर्वखंड अध्याय 6 में देखें। 'आमपक्वाशयोर्मध्यं नाभिनिर्म मर्म' (सु० शा० अ० 6)। धमनी-परिचय धमन्यो रसवाहिन्यो धमन्ति पवनं तनौ। (तदधीनाः क्रियाः सर्वा देहेन्द्रियमनोभवाः ।।61।।) धमनियों के ध्मान के कारण ही रस का 'वहन' होता है, अर्थात् स्थानान्तर में पहुँचता है। वे ही पवन अर्थात् (प्राण, अपान, समान, उदान एवं व्यान नामक) पञ्चविध वायु को शरीर में सञ्चालित करती हैं। अतएव शारीरिक, ऐन्द्रियक एवं मानसिक सभी क्रियाएँ उन्हीं के अधीन हैं। वक्तव्य-'धमनी' नामक पदार्थ प्रत्यक्षगोचर नहीं है। वह 'शव' में नहीं देखी जा सकतीं। अतएव महर्षि सुश्रुत ने (सु० शा० अ० 9 में) 'पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले' कहा है। महर्षि सुश्रुत एवं आचार्य शार्ङ्गधर धमनियों के उत्पत्ति- स्थान नाभि की संख्या 24 एवं उनके कार्य के विषय में एकमत हैं और चरक उनकी संख्या 10 बतलाते हैं तथा उत्पत्ति-स्थान 'हृदय' मानते हैं। इसका कारण भी मात्र दृष्टिकोण का भेद ही है। प्राण के सञ्चार का आदि स्थान 'नाभि' है, अतः महर्षि सुश्रुत तथा तदनुयायी आचार्य शार्ङ्गधर ने 'नाभि' को धमनियों का मूल माना है और महर्षि चरक ने धमनियों के ध्यान को ध्यान में रखकर 'हृदय' को मूल मान लिया है, जो अत्यन्त उपयुक्त एवं युक्तिसंगत है; और आधुनिक प्रत्यक्षवादी 'हृदय' से निकलने वाली रक्तवाहिनी को तथा उसकी शाखा-प्रशाखाओं को 'धमनी' कहते हैं। उनकी इस धारणा का क्या कारण है, इसके लिए देखें-सु० शा० अ० 9, च० सू० अ० 12 तथा 30 और प्रत्यक्षशारीर एवं 'हमारे शरीर की रचना' और सम्पूर्ण आयुर्वेदीय वाङ्मय।

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