भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

पञ्चमोऽध्यायः] कलादिकाख्यानम् 45 पेशी-परिचय मांसपेश्यो बलाय स्युरवष्टम्भाय देहिनाम्। (पिशितमनुप्रविश्य पेशीर्विभजतेऽनिलः ।। 62 ।।) माँसपेशियाँ शरीर-धारियों के बल (शक्ति) एवं अवष्टम्भ (स्थिति या सहारा) के लिए आवश्यक हैं। मांस में ही प्रविष्ट होकर वायु पेशियों का विभाजन करता है। वक्तव्य-मांसधातु ही मांसपेशियों के रूप में शरीर को आच्छादित किये रहता है। कण्डरा-परिचय प्रसारणाऽऽकुञ्चनयोरङ्गानां कण्डरा मताः। (ग्रीवायां पृष्ठदेशे च करयोः पादयोः स्थिताः ।। 63 ।।) बाहु आदि अंगों के फैलाने तथा सिकोड़ने में 'कण्डराएँ' कारण मानी जाती हैं और वे ग्रीवा, पीठ, बाहु एवं टाँगों में स्थित हैं। रन्ध्र-परिचय नासानयनकर्णानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्तिते। मेहनापानवक्त्राणामेकैकं रन्ध्रमुच्यते ।। 64 ।। दशमं मस्तके प्रोक्तं रन्ध्राणीति नृणां विदुः। स्त्रीणां त्रीण्यधिकानि स्युः स्तनयोर्गर्भवर्त्मनः ।। 65 ।। सूक्ष्मच्छिद्राणि चान्यानि मतानि त्वचि जन्मिनाम्। नासिका, नयन एवं कान के दो-दो रन्ध्र होते हैं; मेहन (मूत्रमार्ग), अपान (गुद) तथा मुख के एक-एक रन्ध्र होते हैं और दसवाँ रन्ध्र शिर में होता है। ये दस रन्ध्र होते हैं। स्त्रियों के शरीर में तीन रन्ध्र अधिक हैं-2 स्तनों में और 1 गर्भ मार्ग में। वक्तव्य-'नव स्रोतांसि'-सु० शा० अ० 5 तथा 'नव महान्ति छिद्राणि, सप्त शिरसि द्वे चाधः' ।-च० शा० अ० 7। इस प्रकार सुश्रुत एवं चरक में 9 ही छिद्र माने गये हैं तथा गर्भमार्ग और स्तनमार्ग पुरुषों के अव्यक्त एवं स्त्रियों के व्यक्त होते हैं। गर्भमार्ग का नाम 'भग' और वह दोनों को होता है, अतएव पुरुष को भगवान् और स्त्री को भगवती कहते हैं। यह वह अवयव है, जिसकी उत्तेजना से पुरुष स्त्री का तथा स्त्री पुरुष का भजन या सेवन करती है। 'भज सेवायाम्' धातु से भग शब्द का निर्माण होता है। मल तथा स्रोतस्-परिचय (मनः प्राणात्रपानीयदोषधातूपधातवः ।। 66 ।। धातूनां च मला मूत्रं मलमित्र्यादयस्तनी। सञ्चरन्ति च यैर्मार्गैस्तानि स्रोतांसि सञ्जुगुः ।। 67 ।। यथार्थमूष्मणा युक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत्।) शरीर के भीतर मन, प्राण, अन्न, जल, दोष, धातु, उपधातु, धातुओं के मल और मूत्र आदि जिन मार्गों में से होकर सञ्चार करते हैं उनको 'स्रोतस्' कहते हैं। यथायोग्य ऊष्मा से युक्त होकर वायु स्रोतों को बना देता है। वक्तव्य-देखें-च० वि० अ० 5। धन्वन्तरि ने सु० शा० अ० 5 में बहिर्मुख स्रोतस् 9 तथा योगवाही स्रोतस् 10 कहा है। देखें-सु० शा० 9 में। जाल-परिचय (जालानि तु सिरास्नायुमांसास्थानामुद्भवन्ति हि ।। 68 ।। तानि चत्वारि चत्वारि सर्वाण्येव च षोडश । परस्परं निबद्धानि मणिबन्धादिगुल्फयोः ।। 69 ।। गवाक्षितानि जालानि शरीरस्थानि तत्त्वतः।) सिरा, स्नायु, मांस एवं अस्थियों के चार-चार जाल होते हैं और वे सब मिलकर सोलह हैं। ये परस्पर बँधे हुये परस्पर सटे हुये, परस्पर छिद्रयुक्त और शरीर के केवल गुल्फ तथा मणिबन्ध नामक प्रदेशों में आश्रित होते हैं। कूर्च्च-परिचय (कूर्चाः स्युर्हस्तयोर्द्वौ तु तावन्तौ पादयोरपि ।। 70 ।। ग्रीवायामेक एकस्तु मेढ़े सर्वेऽपि षट् स्मृताः।) हाथों में दो, पाँवों में दो, ग्रीवा में एक तथा मेहन में एक-इस प्रकार छः 'कूर्च' होते हैं। रज्जु-परिचय (पार्श्वतः पृष्ठवंशस्य महत्यो मांसरज्जवः ।। 71 ।। चतस्रो मांसपेशीनां बन्धनं तत्प्रयोजनम्।) पृष्ठवंश (रीढ़ या मेरुदण्ड) के दोनों ओर मोटी-मोटी चार रज्जुएँ होती हैं। उनका कार्य मांसपेशियों को बाँधे रखना है। सेवनी-परिचय (सेवन्यः सप्त तासां तु भवेयुः पञ्च मस्तके ।। 72 ।। एका शेफसि जिह्वायामेका विध्येन्न ताः क्वचित्।) सेवनियाँ सात होती हैं। उनमें पाँच मस्तक में, एक शेफस् (मेहन या लिंग) में तथा एक जीभ में होती है। इनका कभी भी वेध न करे। सङ्घात-परिचय (चतुर्दशास्थां सङ्घाता गुल्फे जानुनि वङ्क्षणे ।। 73 ।। द्वितीये सविक्षा बाह्रोश्चाप्येकैकं शिरसि त्रिके।)