शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें52 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे स्त्रियों में पुरुषों का एवं पुरुषों में स्त्रियों का जो परस्पर स्नेह होता है, उसे 'काम' कहते हैं। क्रोध का लक्षण (यदूष्मा हृदयाज्जन्तोः समुत्तिष्ठति वै सकृत्। परहिंसात्मकः क्लेशः क्रोध इत्यभिधीयते।।120।।) दूसरे को आघात पहुँचाने के लिए एकाएक प्राणी के हृदय से जो ऊष्मा (गर्मी) उठती है, जिससे क्लेश होता है, उसे 'क्रोध' कहते हैं। लोभ का लक्षण (परार्थं परभोगांश्च परसामर्थ्यमेव च। दृष्ट्वा श्रुत्वा च या तृष्णा जायते लोभ एव सः।।121।।) परायी सम्पत्ति, उपभोग सामग्री एवं शक्ति को देखकर अथवा सुनकर जो लालसा उत्पन्न होती है, उसे 'लोभ' कहते हैं। रोग-आरोग्य के लक्षण आप्नोति बन्धमज्ञानादात्मज्ञानाच्च मुच्यते। तद्दुःखयोगकृद्व्याधिरारोग्यं तत् सुखावहम्।।122।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे कलादिकाख्यानं नाम पञ्चमोऽध्यायः।।5।।
उक्त देहधारी प्राणी अज्ञान के कारण बन्धन को प्राप्त होता है और आत्मज्ञान (तत्त्वज्ञान या सद् विवेक) होने से मुक्त (दुःखों और संकटों से पार) हो जाता है। उस देहधारी को जो दुःख या कष्ट देने वाले भाव हैं, उनको व्याधि या रोग कहते हैं तथा उसको सुख देने वाला आरोग्य है। वक्तव्य-यहाँ विश्व की उत्पत्ति का जो क्रम बतलाया गया है, ठीक यही क्रम मनुष्य की उत्पत्ति का भी है। जिस प्रकार इस विशाल विश्व में ईश्वर व्याप्त है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में आत्मा व्याप्त है। इस प्रकार मनुष्य का शरीर एक छोटा-सा विश्व है और उसमें आत्मा छोटा ईश्वर है। 'पुरुषोऽयं लोकसम्मित इत्युवाच भगवानात्रेयः। यावन्तो हि लोके भावविशेषाः तावन्तः पुरुषे यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके'।। (च० शा० अ० 5)। अर्थात् जितने तत्त्व संसार में हैं, उतने ही पुरुष में भी हैं। इसी प्रकार पञ्चमहाभूत तथा अव्यक्त ब्रह्म का मिश्रण यह संसार है और उक्त छः तत्त्वों का ही मिश्रण यह प्राणी भी है। 'षड् धातवः समुदिताः 'पुरुष' इति संज्ञां लभन्ते' (च० शा० अ० 5)। 'पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' (सु० सू० अ० 1)। इस विषय को पूर्णरूप से समझने के लिए आप च० शा० अ० 5 की चन्द्रिका टीका देखें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का पांचवा अध्याय समाप्त।।5।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA