शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः आहारादिगतिकथनम्
[वाम स्तम्भ / Left Column]
आहार-परिचय (आहारः प्रीणनः सद्यो बलकृद् देहधारकः। आयुस्तेजः समुत्साहः स्मृत्योर्जोऽग्निविवर्द्धनः ।। 1 ।।) आहार या भोजन तृप्तिकारक, तत्काल बलकारक, शरीर का धारक एवं पोषक है। यह आयुः, तेजस्, उत्साह, स्मरणशक्ति, ओजस् एवं अग्नि को बढ़ाता है। आहार के भेद (आहारः षड्विधो भोज्यो भक्ष्यश्चर्व्यस्तथैव च। लेह्यश्चोष्यस्तथा पेयस्तदुदाहरणानि च ।। 2 ।। भोज्य ओदनसूपादिर्भक्ष्यो मोदकमण्डकः। चर्व्यश्चिपिटधान्यादी रसालादिस्तु लेह्यते ।। 3 ।। चोष्य आम्रफलेक्ष्वादिः पेयस्तु पानकं पयः।) आहार छः प्रकार का होता है—1. भोज्य, 2. भक्ष्य, 3. चर्व्य, 4. लेह्य, 5. चोष्य तथा 6. पेय। इनके उदाहरण हैं—भात तथा दाल आदि 'भोज्य' कहलाते हैं। लड्डू तथा रोटी आदि 'भक्ष्य' कहे जाते हैं। चिउड़ा एवं भुने चने आदि 'चर्व्य' (चबाने योग्य) कहे जाते हैं। सिखरन, चटनी, च्यवनप्राश आदि 'लेह्य' (चाटने योग्य) कहे जाते हैं। आम के फल एवं ईख आदि 'चोष्य' (चूसने योग्य) तथा पानक (शर्बत) एवं दूध आदि 'पेय' (पीने योग्य) कहे जाते हैं। इन सबका एक नाम 'आहार' भी है। पाचन-प्रकार यात्यामाशयमाहारः पूर्वं प्राणानिलेरितः ।। 4 ।। माधुर्यं फेनभावं च षड्रसोऽपि लभेत सः। अथ पाचकपित्तेन विदग्धश्चाम्लतां व्रजेत् ।। 5 ।। ततः समानमरुता ग्रहणीमभिनीयते। आहार प्राणवायु से प्रेरित होकर पहले मुख एवं आहार-मार्ग द्वारा 'आमाशय' में जाता है और वहाँ छहों रसों
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
युक्त आहार मधुरता (मीठेपन) और फेन-भाव (झाग जैसी अवस्था) को प्राप्त होता है। इसके पश्चात् वह मधुर एवं फेनरूप आहार पाचक पित्त द्वारा पकने लगता है और खट्टा हो जाता है। फिर समान वायु के प्रभाव से वह ग्रहणी में पहुँच जाता है। वक्तव्य—प्राणवायु के प्रकृतिस्थ रहने पर प्राणी आहार का आहरण या ग्रहण कर सकता है अन्यथा नहीं। आमाशय में क्लेदक नामक कफ रहता है। उसके प्रभाव से आहार मधुर हो जाता है और आमाशय में आहार पहुँचने पर आलोडन- विलोडन होने से यह झाग-सा बन जाता है। पाचक पित्त स्वयं विदग्ध होकर खट्टा हो जाता है, अतः उसके मिश्रण से आहार भी खट्टा हो जाता है। पाचक पित्त (जठराग्नि) के साथ ही समान वायु रहता है और वह आहार को 'ग्रहणी' में पहुँचा देता है। ग्रहणी-परिचय (षष्ठी पित्तधरा नाम या कला परिकीर्तिता ।। 6 ।। पक्वामाशयमध्यस्था ग्रहणीत्यभिधीयते।) पाचक पित्त का धारण और पोषण करने वाली जो छठी कला कही जाती है और जो पक्वाशय तथा आमाशय के मध्यभाग में अवस्थित है, वह 'ग्रहणी' कही जाती है। वक्तव्य—आमाशय से प्रारम्भ होकर पक्वाशय-पर्यन्त जो साढ़े तीन 'व्याम' पुरुषों तथा तीन व्याम (एक व्याम = 4 हाथ) स्त्रियों के उदर में जो अवयव है, उसका नाम 'अन्त्र' है। इसी में से होकर आहार आमाशय से मलाशय तक पहुँचता है और इसी में आहार का पाक होता है। अतएव इसे सुश्रुत में 'पित्तधरा', शार्ङ्गधर में 'अग्निधरा' और चरक में 'अग्न्याधिष्ठान' तथा अन्न के पाक के लिए ग्रहण करने के कारण इसे 'ग्रहणी' कहा है।