शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः] आहारादिगतिकथनम् 57 वक्तव्य-इसकी विस्तृत व्याख्या के लिए 'चन्द्रिका टीका युक्त चरकसंहिता' का सम्बन्धित प्रकरण देखें। स्त्री की देख-रेख (रजोवतीं गर्भवतीं च नारीं प्रसूयमानाम्अथ सम्प्रसूताम्। उपाचरेयुर्बहुशः प्रसूताः स्त्रियः सुशीलाः परिचारदक्षाः ॥30॥) रजस्वला, गर्भवती, प्रसवकाल में एवं प्रसूता स्त्री का उपचार, आहार-विहार एवं ओषधादि की व्यवस्था वे स्त्रियाँ करें, जो वृद्धा हों, जिनको बहुत बार प्रसव हुआ हो, जो सुशील हों और जो परिचार क्रिया में कुशल हों। प्रसूतासंज्ञा (प्रसूता सार्धमासान्ते दृष्टे वा पुनरार्तवे। सूतिका नाम हीना स्यादिति धन्वन्तरेर्मतम् ।।31।।) प्रसूता स्त्री डेढ़ मास के पश्चात् अथवा फिर आर्तव के दिखलायी पड़ने पर 'सूतिका या प्रसूता' संज्ञा से रहित हो जाती है। प्रसूता का आहार-विहार (प्रसूता हितमाहारं विहारं च समाचरेत्। व्यायामं मैथुनं क्रोधं शीतसेवा विवर्जयेत् ॥32॥) प्रसूता स्त्री उचित आहार तथा उचित विहार करे और व्यायाम, मैथुन, क्रोध एवं शीतल आहार आदि का परित्याग करे। बालक की स्तन्यपान विधि (तत्र माता प्रशस्ताङ्गी चारुवस्त्रा पुरोमुखी। उपविश्यासने सम्यक् दक्षिणं स्तनमम्बुना ।। 33 ।। प्रक्षाल्येषत्परिस्राव्य मन्त्राभ्यामभिमन्त्रितम्। उदङ्मुखं शिशुं क्रोडे शनैः सन्धार्थ पाययेत् ॥34॥) माता या धाई स्नानादि से स्वच्छ होकर सुन्दर वस्त्र पहन कर, पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठकर, दाहिने स्तन को जल से भली-भाँति धोकर, थोड़ा दूध चुआकर निम्नलिखित मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर उत्तर की ओर मुख वाले बालक को धीरे से गोद में लेकर दूध पिलाये। अभिमन्त्रण मन्त्र (क्षीरनीरनिधिस्तेऽस्तु स्तनयोः क्षीरपूरकः। सदैव सुभगे बालो भवत्वेष महाबलः ॥35॥ पयोऽमृतसमं पीत्वा कुमारस्ते शुभानने। दीर्घमायुरवाप्नोतु देवा प्राप्यामृतं यथा ॥36॥) हे भाग्यवती ! तुम्हारे स्तनों में क्षीरसागर सदैव दूध भरता रहे, जिसे पीकर यह बालक बलशाली हो। हे सुमुखी ! तुम्हारे अमृत जैसे दूध को पीकर यह कुमार दीर्घायु को प्राप्त करे, जैसे अमृत को पाकर देनतागण दीर्घायु प्राप्त करते हैं। स्तन्य-प्रवृत्ति (नार्याः स्तन्यं त्रिरात्राद् वा चतुरात्रादनन्तरम्। प्रवर्त्तयन्ति विवृता धमन्यो हृदये स्थिताः ।। 37 ।।) प्रसव के तीसरे या चौथे दिन नारी को (पशु जाति को प्रसव के ही दिन) दूध उतरने लगता है और उस दूध को माता के हृदय से सम्बद्ध धमनियां सञ्चालित करती हैं। वक्तव्य-ये धमनियां वे हैं, जिनका 'द्वे स्तन्यं स्त्रिया वहतः स्तनयोः श्रिते'। (सु० शा० अ० 9 में) इस प्रकार वर्णन मिलता है। प्रसव के बाद तीन दिन के भीतर प्रसूता के स्तनों से पीला-सा लसीला द्रव निकलता है। माताओं का विश्वास है कि उसके पीने से बालक मर जाता है। अतः उसे धाय निकालकर स्तनों को धोकर शुद्ध दूध ही बालक को पिलाये। नवजात के लिए पेय (गुडं यवानिकां चैव पक्त्वा नीरे द्वितोलके। पादशेषं परिस्राव्य पिचुना पाययेत् शिशुम् ॥38॥) जब तक दूध न उतरे तब तक गुड़ तथा अजवायन को दो तोला जल में पकायें; चौथायी शेष रहने पर छानकर पिचु (रुई का फाहा) अथवा बत्ती द्वारा बालक को उक्त पेय पिलाये। दूध की कमी का कारण (अवात्सल्याद्भयाच्छोकात् क्रोधादत्यपतर्पणात्। स्त्रीणां स्तन्यं भवेत् स्वल्पं गर्भान्तरविधारणात् ॥ 39 ।।) कभी-कभी स्नेह के अभाव से, भय से, शोक से, क्रोध से, अत्यन्त भूखी रहने से अथवा दूसरा गर्भाधान हो जाने से स्त्रियों का दूध स्वल्प (थोड़ा) होने लगता है, जिससे बच्चे की तृप्ति नहीं होती। माता के दूध का विकल्प (क्षीरसात्म्यतया क्षीरमाजं गव्यमथापि वा। दद्यादास्तन्यपर्याप्तेर्बालेभ्यो वीक्ष्य मात्रया ।। 40 ।।) बालक को दूध ही 'सात्म्य' या अनुकूल होता है, इसलिये जिससे बालक की तृप्ति होती रहे, उतनी मात्रा में बकरी अथवा गाय का दूध देते रहना चाहिये।