शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें58 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
शुद्ध दुग्ध के लक्षण ( नीरे क्षिप्तं यदेकिं स्यादविवर्णमतन्नुमत्। पाण्डुरं तनु शीतं च तद् दुग्धं शुद्धमादिशेत् ।। 41 ।। ) जो दूध धीरे से जल में डालने पर घुल जाये, जिसका वर्ण बिगड़ा न हो, जो चिपचिपा न हो, श्वेत हो पतला हो तथा शीत हो, वह दूध 'शुद्ध' होता है। बालक की परिचर्या विधि ( बालमङ्के सुखं दध्यान्न चैनं तर्जयेत् क्वचित्। सहसा बोधयेन्नैव नायोग्यमुपवेशयेत् ।। 42 ।। नाकृष्य स्थापयेत् क्रोडे न क्षिप्रं शयने क्षिपेत्। रोदयेन्न क्वचित् कार्ये विधिमावश्यकं विना ।। 43 ।। तच्चित्तमनुवर्त्तेत तं सदैवानुमोदयेत्। निम्नोच्चस्थानतः रक्षेपि बालं प्रयत्नतः ।। 44 ।। ) बालक को गोद में सुखपूर्वक रखे, इसे कभी झिड़की न दे, सोये को झटपट न जगाये, जब तक बैठने के योग्य न हो तब तक नहीं बैठाये, दूसरे से खींचकर गोद में न ले, बिस्तरे पर नहीं पटके, आवश्यक विधि (स्नान-अञ्जन-औषध- पानादि) के बिना कभी भी उसे नहीं रुलाये, उसके मन के अनुकूल वर्त्ताव करे, उसे सदैव प्रसन्न रखे और ऊँचे-नीचे स्थानों से प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करे। **वक्तव्य-**काश्यपसंहिता-जातकर्म्मोत्तराध्याय 12 तथा च० शा० अ० 8 में बालक के लिए बड़े ही सुन्दर खिलौनों का उल्लेख है। उसे देखिये और सम्भव हो तो उन्हें लाने की व्यवस्था करें। बालक का अन्नप्राशन ( यथोक्तविधिना बालं मासे षष्ठेऽष्टमेऽपि वा। अन्नं सम्प्राशयेत् किञ्चित् ततस्तद्वर्द्धयेत् क्रमात् ।। 45 ।। ) शास्त्रोक्त-विधि अथवा कुलाचार के अनुसार बालक का छठे अथवा आठवें मास में 'अन्नप्राशन' संस्कार करे, अर्थात् उसे अन्न खिलाना प्रारम्भ करे। प्रारम्भ में बहुत थोड़ा अन्न खिलाये, तत्पश्चात् क्रमशः बढ़ाते जायें। तीन प्रकार की अवस्था ( वयस्तु त्रिविधं बाल्यं मध्यमं वार्द्धकं तथा। ऊनषोडशवर्षस्तु नरो बालो निगद्यते ।। 46 ।। मध्ये षोडशसप्तत्योर्मध्यमः कथितो बुधैः। ततस्तु सप्ततेरूर्ध्वं वृद्धो भवति मानवः ।। 47 ।। ) 'वयस्' (अवस्था) तीन प्रकार का होता है, यथा-
- बाल्य, 2. मध्यम और 3 वार्द्धक। जन्म से 16 वर्ष तक 'बाल' कहलाता है, अर्थात् 'बाल्य-अवस्था' होती है। 16 और 70 के भीतर 'मध्यम' अवस्था होती है और 70 से ऊपर मनुष्य 'वृद्ध' हो जाता है। वक्तव्य-'शतायुर्वे पुरुषः' के अनुसार पुरुषों की आयु 100 वर्ष का मानी गयी है। उसी के अनुसार उक्त तीन भेद होते हैं। देखें-च० वि० अ० 8। अवस्था-क्रम से दोष-विचार ( बाल्ये विवर्द्धते श्लेष्मा पित्तं स्यान्मध्यमेऽधिकम्। वार्द्धके वर्द्धते वायुर्विचार्यैतदुपक्रमेत् ।। 48 ।। ) बाल्य अवस्था में कफ बढ़ता है, मध्यम अवस्था में पित्त अधिक हो जाता है और वृद्धावस्था में वायु बढ़ता है। इसको विचार कर चिकित्सा की व्यवस्था करनी चाहिये। औषधमात्रा-विचार बालस्य प्रथमे मासि देया भेषजरक्तिका ।। 49 ।। अवलेहीकृतैकैव क्षीरक्षौद्रसिताघृतैः। वर्धयेत् तावदेकैकां यावद् भवति वत्सरः ।। 50 ।। माषैर्वृद्धिस्तदूर्ध्वं स्याद् यावत् षोडशवत्सरः। ततः स्थिरा भवेत् तावद् यावद्वर्षाणि सप्ततिः ।। 51 ।। ततो बालकवन्मात्रा ह्रासनीया शनैः शनैः। मात्रेयं कल्कचूर्णानां कषायाणां चतुर्गुणा ।। 52 ।। बालक को प्रथम मास में काष्ठ औषधि की एक रत्तीभर मात्रा दूध, शहद, चीनी एवं घी के साथ मिला चाटने योग्य बनाकर देनी चाहिये। इसके पश्चात् एक-एक रत्ती मात्रा बढ़ाते जाना चाहिये जब तक एक वर्ष पूर्ण न हो जाये। इसके पश्चात् एक-एक माशा मात्रा बढ़ाना चाहिये, जब तक बालक सोलह वर्ष का न हो जाये। इसके पश्चात् सत्तर वर्ष तक इस मात्रा को स्थिर रखना चाहिये। इसके पश्चात् बालक की मात्रा के समान धीरे-धीरे मात्रा को घटाना चाहिये। यह मात्रा कल्क एवं चूर्ण औषधों की है। कषायों अर्थात् स्वरस, क्वाथ, फाण्ट एवं हिम की मात्रा उक्त मात्रा से चौगुनी होनी चाहिये। **वक्तव्य-**यह संकेत मात्र है। वस्तुतः रोग, रोगी एवं औषध केबल को देखकर देश-कालादि के अनुसार मात्रा की व्यवस्था करना उचित है। बालक को यथासम्भव मधुर, मृद्वीर्य, लघु, सुगन्धियुक्त, शीत एवं कल्याणकारी औषधियों का प्रयोग कराना चाहिये।