भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

षष्ठोऽध्यायः ] आहारादिगतिकथनम् 59 बालकोचित-उपचार अञ्जनं च तथा लेपः स्नानमभ्यङ्गकर्म च। वमनं प्रतिमर्शश्च जन्मप्रभृति शस्यते।।53।। अञ्जन अर्थात् सुरमा एवं काजल, लेप (उबटन), स्नान, अभ्यङ्ग (मालिश), वमन, प्रतिमर्श नामक नस्य (देखें-उ० खं० अ० 8) का प्रयोग जन्मकाल से ही किया जा सकता है। प्रमुख उपचारों में काल की अवधि कवलः पञ्चमाद् वर्षादष्टमान्नस्यकर्म च। विरेकः षोडशाद् वर्षाद विंशतेश्चैव मैथुनम्।।54।। कवल एवं गण्डूष का प्रयोग पाँचवें वर्ष के पश्चात्, नस्यकर्म का प्रयोग आठवें वर्ष के पश्चात्, विरेचन का प्रयोग सोलहवें वर्ष के पश्चात् और मैथुन का सेवन बीसवें वर्ष के पश्चात् करना उचित होता है। अञ्जन-प्रयोग (सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेत्। पञ्चरात्रेऽष्टरात्रे वा स्त्रावणार्थे रसाञ्जनम्।।55।।) काला तथा सफेद सुरमा आँखों के लिए लाभदायक होता है। अतः प्रतिदिन उसका सेवन करना चाहिये, क्योंकि आँख को श्लेष्मा से उत्पन्न होने वाले (मोतिया) रोग से भय रहता है। अतः श्लेष्मा के स्रावण के लिए पाँचवें तथा आठवें दिन रात के समय रसवत का सेवन अवश्य करना चाहिये। उबटन (उर्द्धत्तनं कफहरं मेदसः प्रविलापनम्। स्थिरीकरणमङ्गानां त्वक् प्रसादकरं परम्।।56।।) उबटन कफ को हरता है, मेदा को घटाता है, अङ्गों को स्थिर (सबल) करता है और त्वचा को अत्यन्त प्रसन्न अर्थात् कान्तियुक्त बनाता है। स्नान (पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम्। शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम्।।57।।) स्नान अन्तर्रात्मा को पवित्र करता है, वीर्य तथा आयु को बढ़ाता है, थकावट, पसीना एवं मल को नष्ट करता है। शरीर में बल देता है और ओजस् को बढ़ाने में सर्वोत्तम है। अभ्यङ्ग (अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जरा-श्रमवातहा। दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुः स्वप्नसुत्वक्त्वदार्ढ्यकृत्।।58।।) अभ्यङ्ग (तैल की मालिश) प्रतिदिन करनी चाहिये,


वह जरा (बुढ़ापा), थकावट और वायु को नष्ट करता है, दृष्टि की प्रसन्नता, पुष्टि, आयु, निद्रा, त्वचा की सुन्दरता एवं शरीर की दृढ़ता को बनाये रखता है। व्यायाम (लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः। विभक्तघनगात्रत्वं व्यायामादुपजायते।।59।।) उचित व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, काम करने की शक्ति, जठराग्नि की वृद्धि, मेदा का क्षय तथा प्रत्येक अंग सुडौल एवं सुगठित हो जाता है। मैथुन (वयोरूपगुणोपेतां तुल्यशीलां गुणान्विताम्। अभिकामोऽभिकामां तु हृष्टो हृष्टामलङ्कृताम्।।60।। सेवेत प्रमदां युक्त्या वाजीकरणबृंहितः। अतिस्त्रीसम्प्रयोगाच्च रक्षेदात्मानमात्मवान्।।61।।) मैथुनाभिलाषी पुरुष प्रसन्नचित्त तथा वाजीकरण (शक्तिवर्द्धक) द्रव्यों का सेवन करके युक्तिपूर्वक स्त्री-सहवास करे। स्त्री कैसी हो? वयस् तथा रूप आदि गुणों से युक्त समान स्वभाव वाली, सद्गुणों से युक्त, मैथुनाभिलाषिणी, प्रसन्नचित्त, भूषणों से भूषित तथा प्रमदा हो। किन्तु आत्मवान् (आत्मबल से युक्त संयमी) पुरुष अपने को अधिक स्त्री- सहवास से बचाता रहे। ह्रास-क्रम बाल्यं वृद्धिश्चर्विर्मेधा त्वग्दृष्टिः शुक्रविक्रमौ। बुद्धिः कर्मेन्द्रियं चेतो जीवितं दशतो हसेत्।।62।। जन्म से प्रति दस वर्ष के अनन्तर निम्नलिखित भावों का ह्रास होता जाता है। यथा-बाल्य (बालकपन), वृद्धि (शरीर का बढ़ना), वपुः (आकृति का सौन्दर्य), मेधा (धारणाशक्ति), त्वचा की सद्गुणता, दृष्टि (दर्शनशक्ति), शुक्र अर्थात् मैथुन- सामर्थ्य या गर्भधान-सामर्थ्य, विक्रम, पराक्रम, बुद्धि, हस्तपादादि कर्मेन्द्रियाँ, चेतस् या 'मनस्' और जीवित (जीवन) का। वक्तव्य-भावमिश्र ने अपने ग्रन्थ में उक्त 'दशतः' के स्थान पर 'क्रमतः' पद उद्धृत किया है। उक्त विधि से मानव की आयु 120 वर्ष की हो जाती है, किन्तु 'शतायुर्वे पुरुषः' 'जीवेम शरदः शतम्'-इस प्रकार वेदों में तथा 'वर्षशतं खलु आयुषः प्रमाणम्' (च० शा० अ० 6)। चरकसंहिता में मानव की आयु 100 वर्ष ही कही गयी है। आप भी विचार करें।