भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 356 में से

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60 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे


[वाम स्तम्भ / Left Column]

प्रकृति का कारण (शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः। प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ।। 63 ।।) गर्भाधान के समय शुक्र एवं शोणित के संयोग में जो दोष (वात, पित्त एवं कफ) उत्कट अर्थात् बढ़ा हुआ होता है, उसके प्रभाव से 'प्रकृति' उत्पन्न होती है। उसका लक्षण मुझसे सुनो।

वात-प्रकृति का लक्षण अल्पकेशः कृशो रूक्षो वाचालश्चलमानसः। आकाशचारी स्वप्नेषु वातप्रकृतिको नरः।। 64 ।। जिसके केश छोटे-छोटे हों, शरीर कृश तथा रूक्ष हो, जो वाचाल या बकवादी हो, जिसका मन चञ्चल हो और स्वप्नों में आकाश में उड़ा करे, वह पुरुष 'वातप्रकृति' होता है।

पित्त-प्रकृति का लक्षण अकालपलितैर्व्याप्तो धीमान् स्वेदी च रोषणः। स्वप्नेषु ज्योतिषां द्रष्टा पित्तप्रकृतिको नरः।। 65 ।। जिसके बाल (केश एवं दाढ़ी-मूँछ) अकाल या युवावस्था में ही श्वेत हो जायें, जो बुद्धिमान् हो, जिसे पसीना अधिक हो, जो क्रोधी हो तथा स्वप्नों में ज्योति या चमकने वाले तारे, बिजली आदि को देखा करे, वह मनुष्य 'पित्तप्रकृति' होता है।

कफ-प्रकृति का लक्षण गम्भीरबुद्धिः स्थूलाङ्गः स्निग्धकेशो महाबलः। स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्मप्रकृतिको नरः।। 66 ।। जिसकी बुद्धि गम्भीर हो, शरीर मोटा हो, केश चिकने हों, जो बलवान् हो और स्वप्नों में जलाशयों (झील, तालाब आदि) को देखा करे, वह पुरुष 'कफप्रकृति' होता है।

मिश्रित प्रकृति का लक्षण ज्ञातव्या मिश्रचिह्नैश्च द्वित्रिदोषोल्बणा नराः। उपरिलिखित चिह्नों के मिश्रण से द्विदोष-प्रकृति तथा त्रिदोष-प्रकृति जानी जाती है।

निद्रा, मूर्च्छा, भ्रम एवं तन्द्रा का कारण तमः कफाभ्यां निद्रा स्यान्मूर्च्छा पित्ततमोभवा ।। 67 ।। रजःपित्तानिलैर्भ्रान्तिस्तन्द्रा श्लेष्मतमोनिलैः। तमोगुण एवं कफ की अधिकता से 'निद्रा' या 'नींद' पित्त तथा तमोगुण की अधिकता से 'मूर्च्छा' या बेहोशी; रजोगुण, पित्त एवं वायु की अधिकता से 'भ्रान्ति' या भ्रम


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

और कफ, तमोगुण तथा वायु की अधिकता से 'तन्द्रा' या 'उँघायी' उत्पन्न होती है।

ग्लानि और आलस्य का लक्षण ग्लानिरोजःक्षयाद्दुःखादजीर्णाच्च श्रमाद्भवेत्।। 68 ।। यः सामर्थ्येऽप्यनुत्साहस्तदालस्यमुदीर्यते। ओजस् के क्षय से, दुःख से, अनपच से एवं थकावट से ग्लानि या सुस्ती होती है। सामर्थ्य (शक्ति) होने पर भी जो किसी काम को करने का उत्साह (हौसला) नहीं होता, उसे 'आलस्य' कहते हैं। वक्तव्य—'ग्लानि' हर्ष (उल्लास) के क्षय का नाम है।

जृम्भा का लक्षण चैतन्यशैथिल्यत्वाद् यः पीत्वैकं श्वासमुद्गमेत्।। 69 ।। विदीर्णवदनः श्वासं जृम्भा सा कथ्यते बुधैः। चेतनाशक्ति के शिथिल होने से मुँह खोलकर जो एक लम्बा साँस लेकर फिर छोड़ा जाता है, उसे 'जृम्भा' या 'जँभाई' कहते हैं।

छींक का कारण और लक्षण उदानप्राणयोरूर्ध्वयोगान्मौलिखस्रवात् ।। 70 ।। शब्दः सञ्जायते नस्तः क्षुतं तत् कथ्यते बुधैः। उदानवायु तथा प्राणवायु का ऊर्ध्वभाग (शृंगाटक मर्म) में संयोग होने के कारण शिर में स्थित कफ का स्राव होने से नाक द्वारा जो छीं-छीं ऐसा शब्द होता है, उसे 'क्षुत' या छींक कहते हैं।

उद्गार का कारण तथा लक्षण उदानकोपादाहारसुस्थिरत्वाच्च यद् भवेत्।। 71 ।। पवनस्योर्ध्वगमनं तमुद्गारं प्रचक्षते। उदानवायु के कोप के कारण अथवा आमाशय में भोजन के स्थित होने से वायु को जो ऊर्ध्वगमन (ऊपर को उठना और मुखमार्ग से निकलना) होता है, उसे 'उद्गार' या डकार कहते हैं।

निद्रा का कारण और लक्षण (यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः ।। 72 ।। विषयेभ्यो निवर्त्तन्ते तदा स्वपिति मानवः।) मन के क्रियाहीन हो जाने पर जब चक्षुः आदि इन्द्रियाँ अपने-अपने रूप आदि विषयों को ग्रहण करने से निवृत्त हो जाती हैं, तब मानव सोता है, यही 'निद्रा' कही जाती है।

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