भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97

षष्ठोऽध्यायः ] आहारादिगतिकथनम् 61 वक्तव्य—इससे भिन्न मूर्च्छा होती है। देखें-माधवनिदान तथा च० सू० अ० 24। उत्क्लेश का कारण और लक्षण (उत्क्लिश्यान्नं न निर्गच्छेत् प्रसेकष्ठीवनेरितम् ।। 76 ।। हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्क्लेशं विनिर्दिशेत्।) जिससे उदर में से अन्न निकलना चाहता है, किन्तु निकलता नहीं, मुख में पानी जाता है, बार-बार थूक आता है एवं हृदय में पीड़ा होती है, उसे 'उत्क्लेश' (जी मिचलाना या मिचली आना) कहते हैं। भ्रम का कारण और लक्षण (चक्रवद् भ्रमतो लोकान् स्वात्मानं मन्यते तथा ।। 73 ।। उत्थाने चाऽसमर्थः स्यात् यस्मात्स वै भ्रमः स्मृतः ।) जिससे संसार के सभी पदार्थ चक्र के समान घूमते से दिखलायी पड़ें और मनुष्य अपने को भी वैसा ही माने तथा जिससे मनुष्य खड़ा रहने में भी असमर्थ हो जाये, उसका नाम 'भ्रम' या चक्कर आना है। तन्द्रा का कारण और लक्षण (इन्द्रियार्थेष्वसंवित्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः ।। 74 ।। निद्रार्त्तस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत्।) जिसको रूपादि विषयों का सम्यक् ज्ञान न हो, शरीर में भारीपन हो, जम्भाइयाँ आ रही हों, सुस्ती हो तथा उँघाई आती हो, उसकी इस व्याधि को 'तन्द्रा' कहते हैं। ग्लानि का कारण और लक्षण (वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्वेष्टनं भ्रमः ।। 77 ।। न चान्नमभिकाङ्क्षेत ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत्।) जिससे मुख में मीठापन, तन्द्रा, हृदय में ऐंठन, भ्रम एवं अन्न में अरुचि हो, उसे 'ग्लानि' कहते हैं। गौरव का कारण और लक्षण (आर्द्रचर्मावनद्धं हि यो गात्रमभिमन्यते । तथा गुरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद् विनिर्दिशेत् ।। 78 ।।) इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे आहारादिगतिकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः ।। 6 ।। जिससे रोगी शरीर को आर्द्र चर्म (गीला चमड़ा) से बँधा हुआ-सा और शिर को अत्यन्त भारी-सा अनुभव करता हो, उसे 'गौरव' कहते हैं। क्लम का कारण और लक्षण (योजनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः ।। 75 ।। क्लमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रबाधकः ।) जिससे बलपूर्वक कार्य किये बिना शरीर में 'श्रम' (थकावट) बढ़ जाता है, किन्तु श्वास में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता, इन्द्रियों द्वारा विषयों के ग्रहण में बाधा पड़ती है, उसे 'क्लम' जानना चाहिये। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का छठा अध्याय समाप्त ।। 6 ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 97, कुल 356 में से · BharatKosha