शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 356 में से
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सप्तमोऽध्यायः रोगगणना
[बायाँ स्तम्भ]
रोगभेद-परिचय रोगाणां गणना पूर्वं मुनिभिर्या प्रकीर्तिता। मयात्र प्रोच्यते सैव तद्भेदा बहवो मताः॥१॥ महर्षियों ने पूर्वकाल में (ग्रन्थों में) रोगों की जो गणना (संख्या) कही है, मैं इस ग्रन्थ में उसी (गणना) को कहता हूँ, किन्तु उसके बहुत से भेद माने गये हैं। वक्तव्य- ग्रन्थकर्त्ता ने इस अध्याय में केवल रोगों की संख्या मात्र का उल्लेख किया है कि अमुक रोग इतने प्रकार का होता है; और रोग का अपना लक्षण तो उसके नाममात्र से जान लिया जा सकता है। अतः किसी रोग का लक्षण लिखना अनावश्यक समझ कर छोड़ दिया है। इसीलिए हमने भी रोगों के विशिष्ट लक्षण लिखने का विचार छोड़ दिया। रोगों का निश्चय करने के लिए प्रत्येक वैद्य के पास माधव-निदान आदि पुस्तकें रहती ही हैं। यहाँ एक बात स्मरण रखनी चाहिये कि आर्षग्रन्थों में रोगों की संख्या का निर्देश भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से किया गया है। यही कारण है कि किसी ग्रन्थ में ज्वर आठ प्रकार का और किसी में पच्चीस प्रकार का, इसी प्रकार किसी ग्रन्थ में अतिसार 6 है, तो किसी में सात इत्यादि। इस प्रकार के भेदों को तात्त्विक भेद नहीं समझना चाहिये। उदाहरण के लिए देखें—'एकम् एव रोगानीकं दुःखसामान्यात्।' अर्थात् दुःखदायी होने के कारण सभी रोग एक से ही हैं, इनका भेद भी नहीं है। 'द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन साध्यं चासाध्यं च'। अर्थात् साध्य और असाध्य भेद से रोग दो प्रकार के होते हैं (च० वि० अ० ३)। दस प्रकार के भेदों का कारण केवल यही है कि किसी ने किसी प्रकार से गणना की और किसी ने किसी प्रकार से। इसी विषय को आचार्य शार्ङ्गधर ने 'तद्भेदा बहवो मताः' कहकर व्यक्त किया हैं।
[दायाँ स्तम्भ]
ज्वर-संख्या पञ्चविंशतिरुद्दिष्टा ज्वरास्तद्भेद उच्यते। पृथग्दोषैस्तथा द्वन्द्वभेदेन त्रिविधः स्मृतः ॥२॥ एकश्च सन्निपातेन तद्भेदा बहवः स्मृताः। प्रायशः सन्निपातेन पञ्च स्युर्विषमज्वराः ॥३॥ सन्ततः सततश्चैव अन्येद्युष्कस्तृतीयकः। चातुर्थकश्च पञ्चैते कीर्तिता विषमज्वराः ॥४॥ तथागन्तुज्वरोऽप्येकस्त्रयोदशविधो मतः। अभिचारग्रहावेशशापैरागन्तुकस्त्रिधा ॥५॥ श्रमाच्छेदात् क्षताद्दाहाच्चतुर्धाऽऽघातजो ज्वरः। कामाद्भीतेः शुचो रोषाद् विषादौषधगन्धतः ॥६॥ अभिषङ्गज्वराः षट् स्युरेवं ज्वरविनिश्चयः। ज्वर पच्चीस होते हैं। उनका भेद कहा जाता है— पृथक्-पृथक् दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन और सन्निपात से एक; और सन्निपात के अनेक भेद होते हैं। तीनों दोषों के सन्निपात से पाँच तो विषम ज्वर होते हैं। यथा—1. सन्तत, 2. सतत, 3. अन्येद्यु, 4. तृतीयक (तिजारी) और 5. चातुर्थक (चौथैया)। ये पाँचों 'विषमज्वर' भी कहे जाते हैं। इसी प्रकार 'आगन्तु' ज्वर भी एक ही होता है, किन्तु उसके तेरह भेद होते हैं। यथा—1. अभिचार (मारण, मोहन आदि क्रियाओं से), 2. ग्रहावेश (ग्रहपीड़ा) से तथा 3. शाप से। अभिघात (चोट आदि) से चार ज्वर होते हैं—1. श्रम (थकावट) से, 2. छेद (अंग कटने) से, 3. क्षत (घाव) से और 4. दाह (जलने) से। 1. काम (मैथुनाभिलाष) से, 2. भीति (भय या डर) से, 3. शोक से, 4. क्रोध से, 5. विष से और औषधियों (जहरीली) के गन्ध से—ये 6 ज्वर 'अभिषंग' से होते हैं। इस प्रकार ज्वरों की संख्या का निश्चय किया गया है।