भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 63

वक्तव्य-शरीर में साधारण से अधिक गर्मी या ताप का बढ़ जाना 'ज्वर' कहलाता है। रोगी के अनुभव से, स्पर्श एवं 'थर्मामीटर' (धर्ममितर) नामक प्रसिद्ध यन्त्र (पारद-पूर्ण काँच-नलिका) से ज्वर रोग की सत्ता जान ली जाती है। प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक साधारण गर्मी 97 से 98½ डिग्री होती है। विशेष देखें-च० नि० अ० 1 'चन्द्रिका-टीका'। अतिसार-ग्रहणी-प्रवाहिका-गणना पृथक् त्रिदोषैः सर्वैश्च शोकादामाद् भयादपि ।।7।। अतीसारः सप्तधा स्याद् ग्रहणी पञ्चधा मता। पृथग्दोषैः सन्निपातात् तथा चामेन पञ्चमी ।।8।। प्रवाहिका चतुर्धा स्यात् पृथग्दोषैस्तथास्रतः। पृथक्-पृथक् तीन दोषों से तीन, सन्निपात से एक, शोक से एक, और भय से एक इस प्रकार 'अतिसार' (दस्त) सात प्रकार का होता है। 'ग्रहणी' पाँच प्रकार की होती है-तीनों दोषों से तीन, सन्निपात से चौथी और आम से पाँचवीं। 'प्रवाहिका' चार प्रकार की होती है-तीन दोषों से तीन और रक्त से चौथी। वक्तव्य-शरीर के तरल पदार्थों का गुदमार्ग से निकलना या पतला पाखाना होना ही 'अतिसार' कहा जाता है। कभी सूखे और कभी पतले पीड़ा युक्त अतिसार की परम्परा का नाम 'ग्रहणी' या 'संग्रहणी' है और ऐंठन या मरोड़ के साथ आँव का निकलना 'प्रवाहिका' या 'पेचिस' कहा जाता है। इसी कारण मूत्र के अधिक होने को 'मूत्रातिसार' भी कहते हैं। अजीर्ण-अलसक-विसूची-दण्डालसक-विलम्बिका-गणना अजीर्णं त्रिविधं प्रोक्तं विष्टब्धं वायुना मतम् ।।9।। पित्ताद् विदग्धं विज्ञेयं कफेनामं तदुच्यते। विषाजीर्णं रसादेकं दोषैः स्यादलसस्त्रिधा ।।10।। विसूची त्रिविधा प्रोक्ता दोषैः सा स्यात् पृथक्पृथक्। दण्डकालसकश्चैव एकैव स्याद् विलम्बिका।।11।। अजीर्ण (अनपच) तीन प्रकार का होता है-1. वायु से विष्टब्ध, 2. पित्त से विदग्ध और 3. कफ से आम नामक अजीर्ण होता है। रस से एक अजीर्ण होता है-विषाजीर्ण। तीनों दोषों से 'अलसक' तीन प्रकार का होता है। विसूची (हैजा या कालरा) पृथक्-पृथक् दोषों से तीन प्रकार की होता है। 'दण्डालसक' एवं विलम्बिका एक-एक प्रकार के होते हैं। वक्तव्य-उक्त सभी रोग अनपच के ही रूपान्तर हैं। रस का पूर्णतया परिपाक न होने से शरीर में विष के से लक्षण उत्पन्न होने के कारण एक 'विषाजीर्ण' संज्ञा भी दी गयी है। अलसक को 'गुम हैजा' भी कहते हैं। 'दण्डालसक' में रोगी का शरीर दण्ड के समान अकड़ जाता है। अर्श-गणना अर्शांसि षड्विधान्याहुर्वातपित्तकफास्रतः। सन्निपाताच्च संसर्गात् तेषां भेदो द्विधा स्मृताः ।। 12।। सहजोत्तरजन्मभ्यां तथा शुष्कार्द्रभेदतः। त्रिधैव चर्मकीलानि वातात् पित्तात् कफादपि ।। 13।। बवासीर छः प्रकार के होते हैं-1. वायु से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. रक्त से, 5. सन्निपात से और 6. दो-दो दोषों के संसर्ग से, ये दो प्रकार के होते हैं-1. सहज (शरीर के साथ ही उत्पन्न होने वाले) और 2. जन्म के पश्चात् उत्पन्न होने वाले। 'शुष्कार्श' (सूखी या वादी) तथा 'आर्द्र (स्राव युक्त या खूनी) के भेद से दो प्रकार के होते हैं। चर्मकील (मस्से) तीन प्रकार के होते हैं-1. वायु से, 2. पित्त से और 3. कफ से। वक्तव्य-गुद-प्रदेश में जो मांस के 'अंकुर' उत्पन्न हो जाते हैं, उन्हें 'अर्श' या बवासीर कहते हैं और त्वचा पर जो मस्से निकल आते हैं, उन्हें 'चर्मकील' कहते हैं। कृमि-गणना एकविंशतिभेदेन कृमयः स्युर्द्विधा च ते। बाह्यास्तथाभ्यन्तराः स्युस्तेषु यूका बहिश्चराः ।।14।। लिक्षाश्चान्येऽन्तरचराः कफात्ते हृदयादकाः। अन्नादा उदरावेष्ठाश्चूरवश्च महागुहाः ।। 15।। सुगन्धा दर्भकुसुमास्तथा रक्ताच्च मातरः। सौरसा लोमविध्वंसा रोमद्वीपा उदुम्बराः।। 16।। केशादाश्च तथैवान्ये शकृज्जाता मकेरुकाः। लेलिहाश्च सलूनाश्च सौसुरादाः ककेरुकाः ।। 17।। तथान्यः कफरक्ताभ्यां सञ्जातः स्नायुकः स्मृतः। व्रणस्य क्रिमयश्चान्ये विषमा बाह्ययोनयः ।। 18।। कृमि बीस प्रकार के होते हैं और वे सब 'बाह्य' (बाहर होने वाले) तथा 'आभ्यन्तर' (भीतर होने वाले) के भेद से दो प्रकार के होते हैं। उनमें 'यूका' (जूएँ) तथा 'लिक्षा' CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA