भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ८, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / १६१ पृथिवी है, इसलिए वह इसे इस प्रकार खाता है ॥४१॥ जब होता आशीर्वाद देता है तब इस मन्त्र का जप करता है, “मयीदमिन्द्रऽइन्द्रियं दधात्वस्मान् रायो मघवानः सचन्ताम्। अस्माकँ सन्त्वाशिषः सत्या नः सन्त्वाशिषः” (यजु० २।१०)—“इन्द्र मुझमें इन्द्र की शक्ति दे। हमको बहुत-सा धन प्राप्त हो। आशिष हमारे लिए हो। सच्चीं आशिषें हमारे लिए हों।” यह आशिष का परिग्रह (लेना) है। यहाँ ऋत्विज् जो आशिष यजमान के लिए देता है वह उनको ग्रहण करके अपनी बना लेता है ॥४२॥ अब दोनों पवित्रों से मार्जन करते हैं, क्योंकि अब उन्होंने इडा को पाक-यज्ञिया दे दिया। अब वे दोनों पवित्रों से इसलिए मार्जन करते हैं कि अब जो यज्ञ का भाग बच रहा है उसको हम पवित्रों से मार्जन करके पूरा करेंगे ॥४३॥ वह (अध्वर्यु) दोनों पवित्रों को प्रस्तर पर छोड़ देता है। यजमान ही प्रस्तर है। प्राण और अपान पवित्रे हैं। इस प्रकार वह यजमान में प्राण और अपान को धारण कराता है। इसलिए उन पवित्रों को प्रस्तर पर छोड़ता है ॥४४॥ अध्याय ८—ब्राह्मण २ अब वे (आहवनीय अग्नि में से) दो जलती हुई समिधायें निकालते हैं। यह अग्नि अनुयाजों के लिए व्यर्थ-सी हो जाती है, क्योंकि देवों के लिए यज्ञ को ले जाती है। (वे सोचते हैं कि) ऐसी आग में अनुयाज करें जो यातयामा (बुझी या व्यर्थ-सी) न हो। इसलिए दो जलती हुई समिधाओं को निकालते हैं ॥१॥ वे फिर उनको (आग के) पास लाते हैं। इस प्रकार वे आग को फिर बढ़ा देते और ताजा कर देते हैं। (वे सोचते हैं कि) जो कुछ यज्ञ में से शेष रह गया है उसको ऐसी अग्नि में करें जो यातयामा न हो। (जिस अग्नि से एक बार काम ले चुके वह मानो थक-सी गई। उसे यातयामा कहा। अब दो समिधाओं को पहले निकालकर फिर उसी में रखने से मानो वह ताजा हो गई।) इसीलिये वे उनको फिर पास लाते हैं ॥२॥ अब (अग्नीध्र) समिधा रखता है। इससे वह अग्नि को प्रज्वलित करता है। (वह सोचता है कि) जो यज्ञ की शेष क्रिया रह गई है उसको प्रज्वलित अग्नि में करूँ। अतः वह समिधा रखता है ॥३॥ होता इस मन्त्र को पढ़कर उसका अनुमन्त्रण (पवित्रीकरण) करता है, “एषा तेऽअग्ने समित् तथा वर्द्धस्व चा च प्यायस्व। वर्द्धिषीमहि च वयमा च प्यासिषीमहि” (यजु० २।१४)—“हे अग्नि! ये तेरी समिधा हैं। इनके द्वारा बढ़ और प्रज्वलित हो, और हम भी बढ़ें और प्रतापी हों।” जैसे पहले समिधा लगाते हुए जिस प्रकार मन्त्र पढ़ा था, उसी प्रकार अब भी पढ़ता है। यह होता का कर्म है। परन्तु यदि समझे कि होता नहीं जानता तो यजमान स्वयं ही अनुमन्त्रण करे ॥४॥ अब वह उसका सम्मार्जन करता है, अर्थात् उसे इकट्ठा कर देता है, जैसे इधर-उधर से चिमटे द्वारा बुझती हुई आग को इकट्ठा करके फिर ताजा कर देते हैं। ‘इस प्रकार इकट्ठा होकर यह जो कुछ यज्ञ में शेष रहा है उसको भी (देवताओं के लिए) ले जावे।'-इसलिए उसका सम्मार्जन करता है। (प्रत्येक समिधा को) एक-एक बार सम्मार्जित करता है। इससे पहले देवों के लिए उन्होंने फिर से तीन-तीन बार सम्मार्जन किया था। 'ऐसा न हो कि जैसा देवों के लिए किया था वैसा ही हो जाय'-इसलिए एक-एक बार सम्मार्जन करता है। यदि तीन बार पहले करे, फिर तीन बार करे तो दुहराने का दोष लगे। इसलिए एक-एक बार ही सम्मार्जन करता है ॥५॥ वह इस मन्त्र से सम्मार्जित करता है, “अग्ने वाजजिद् वाजं त्वा ससृवाꣲसं वाजजित्ँ, सम्मार्ज्मि” (यजु० २।१४)—“हे अन्न को जीतनेवाले अग्नि, अन्न लिये हुए और अन्न को जीतने- वाले, तुझको सम्मार्जित (इकट्ठा) करता हूँ।” पहले कहा था 'सरिष्यन्तम्' अर्थात् लेते हुए,

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