भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० ६, ब्रा० १-२, क० २६-२९ व १-६ शतपथब्राह्मण / १७६ उस संस्था को धारण करें जो बृहस्पति के पुत्र शंयु ने धारण की थी ॥२६॥ अब कहता है—"गातुं यज्ञाय गातुं यज्ञपतये।"—"यज्ञ के लिए जय, यज्ञपति के लिए जय।" जो यज्ञ की संस्था को चाहता है वह यज्ञ के लिए और यज्ञपति के लिए जय चाहता है। "स्वस्तिरस्तु नः स्वस्तिर्मानुषेभ्यः।"—"स्वस्ति हमारे लिए, स्वस्ति मनुष्यों के लिए।" इसका तात्पर्य है कि देवों में हमको स्वस्ति हो और मनुष्यों में स्वस्ति हो। "ऊर्ध्वं जिगातु भेषजम्।" —"भेषज या मुक्ति का साधन ऊपर जावे।" इससे तात्पर्य है कि हमारा यज्ञ देवलोक को जीते ॥२७॥ अब कहता है—"शं नोऽस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे।" अर्थात् "हमारे दुपायों और चौपायों के लिए कल्याण हो।" ये दुपाये और चौपाये ही सब संसार हैं। यज्ञ को समाप्त करके वह यजमान के लिए कल्याण माँगता है, इसलिए कहता है कि 'हमारे दुपायों और चौपायों के लिए कल्याण हो' ॥२८॥ अब उस (अँगुली) से (पृथिवी को) छूता है। जब उसका ऋत्विज के कर्म के लिए वरण होता है तो वह अमानुष (मनुष्यों से ऊपर) हो जाता है। यह पृथिवी ही प्रतिष्ठा (सुरक्षित स्थान) है, इसलिए यहीं अच्छी तरह खड़ा होता है। और वह फिर (यज्ञ करने के बाद) मनुष्य हो जाता है। इसीलिए इस अँगुली से पृथिवी को छूता है ॥२६॥ अध्याय ६--ब्राह्मण २ वे पत्नी-संयाज करने के लिए (गार्हपत्य अग्नि के पास) लौटते हैं। अध्वर्यु जुहू और स्रुवा को लेता है, होता वेद (कुशों का गुच्छ) और आग्नीध्र आज्य-विलापनी (घी पिघलाने की कटोरी) को ॥१॥ यहाँ कुछ लोगों के मतानुसार अध्वर्यु आहवनीय के पूर्व की ओर जाता है। परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह वहाँ जायगा तो यज्ञ के बाहर हो जायगा ॥२॥ कुछ के मत में अध्वर्यु (यजमान की) पत्नी के पीछे-पीछे चलता है। उसको ऐसा भी न करना चाहिए, क्योंकि अध्वर्यु यज्ञ का पूर्वार्द्ध है और पत्नी यज्ञ का पिछला आधा। यदि ऐसा करेगा तो मानो वह अपने शिर को पीछे फेर ले और (अध्वर्यु) यज्ञ से बहिष्कृत हो जायगा ॥३। कुछ के मत में अध्वर्यु पत्नी और गार्हपत्य के बीच में चलता है। परन्तु उसको ऐसा भी न करना चाहिए, क्योंकि यदि वह ऐसा करेगा तो यज्ञ से पत्नी को अलग कर देगा। इसलिए गार्हपत्य के पूर्व को और आहवनीय के भीतर को जाता है। इस प्रकार वह यज्ञ के बाहर नहीं होता, और चूंकि पहले (आहवनीय तक जाते हुए) वह भीतर की ओर होकर गया था, वैसा ही अब भी करना चाहिए ॥४॥ अब पत्नी-संयाज करते हैं। यज्ञ से निश्चय ही सन्तान उत्पन्न होती है और यज्ञ से जो होती है, जोड़े से उत्पन्न होती है। जोड़े से जो उत्पन्न होती है वह यज्ञ के अन्त में उत्पन्न होती है। इसलिए यज्ञ की समाप्ति पर जोड़े से प्रजा उत्पन्न की जाती है। इसलिए पत्नी-संयाज किया जाता है ॥५॥ चार देवताओं के लिए यज्ञ करता है। चार जोड़ा है। दो का जोड़ा होता है। दो-दो मिलकर चार होते हैं। इससे उत्पन्न करनेवाला जोड़ा हो गया। इसलिए चार देवताओं के लिए यज्ञ करता है ॥६॥