भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० १-२ शतपथब्राह्मण / ७ कर देता है। उन्होंने इस वज्र को लिया और उसीकी छत्र-छाया में यज्ञ को ताना। वह भी जल का प्रणयन करके इसी वज्र को लाता है और इसी की छत्र-छाया में यज्ञ को तानता है ॥१७॥ पात्र में थोड़ा-सा जल लेकर गार्हपत्य के उत्तर की ओर रख देता है। आपः (जल) स्त्रीलिङ्ग है और अग्नि पुँल्लिङ्ग। गार्हपत्य घर है। स्त्री-पुरुष मिलकर घर में ही सन्तानोत्पत्ति करते हैं। जो जल का प्रणयन करता है वह वज्र को लाता है। जो भूमि में सुदृढ़ता से खड़ा नहीं होता वह वज्र को नहीं ले सकता, क्योंकि वज्र उसी को हानि पहुँचा देगा ॥१८॥ गार्हपत्य में रखने का यही प्रयोजन है। गार्हपत्य घर है। घर ही प्रतिष्ठा है (खड़े होने की जगह—, प्रति + स्था)। घर में इसकी प्रतिष्ठा करता है। इस प्रकार वज्र उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसीलिये वह जल की गार्हपत्य में स्थापना करता है ॥१९॥ आहवनीय के उत्तर में क्यों ले जाता है ? आपः (जल) स्त्रीलिङ्ग हैं। अग्नि पुँल्लिङ्ग है। स्त्री-पुरुष के मिलने से ही सन्तान होती है। स्त्री, पुरुष के बाईं ओर सोती है ('उत्तर' का अर्थ 'बायां' भी है) ॥२०॥ जल और अग्नि के बीच में होकर न निकले, क्योंकि स्त्री-पुरुष के जोड़े के बीच में नहीं पड़ना चाहिये (उनके सहवास में विघ्न नहीं डालना चाहिये (जल को ठीक उत्तर की ओर रखना चाहिये) न तो सीमा से आगे बढ़ाकर और न सीमा को प्राप्त करने के पहले (न पूर्व की ओर, न पश्चिम की ओर)। यदि सीमा से आगे बढ़ाकर रखेगा तो जल और अग्नि में जो परस्पर-विरोध है उसको बढ़ा देगा और जब जल का स्पर्श होगा तो अग्नि का विरोध बढ़ जायगा। यदि सीमा को प्राप्त किये बिना ही रख देगा तो कामना की पूर्ति नहीं होगी। इसलिये जल का प्रणयन ठीक उत्तर को ही करना चाहिये ॥२१॥ अब तृणों को बिछाता है (अग्नियों को) चारों ओर। पात्रों को दो-दो करके ले जाता है, अर्थात् सूप और अग्निहोत्र-हवणी, स्फ्या और कपाल, शमी और कृष्णमृगचर्म, ऊखल और मूसली, और छोटे-बड़े पत्थर; ये दस हो गये। विराट् छन्द दस अक्षर का होता है। यज्ञ भी विराट् है। इस प्रकार यज्ञ को विराट् रूप दे देता है। दो-दो करके क्यों ले जाते हैं ? इसलिये कि दो में शक्ति होती है। जब दो मिलकर काम करते हैं तो वह काम सुदृढ़ होता है। दो से सन्तान होती है। इस प्रकार यज्ञ को प्रजनन-शील कर देता है ॥२२॥ अध्याय १—ब्राह्मण २ अब सूप और अग्निहोत्र-हवणी को लेता है इस मंत्र से (यजु० १।६)—"कर्म के लिए तुम दोनों को, व्यापकत्व के लिए तुम दोनों को।" यज्ञ कर्म है। कर्म के लिए अर्थात् यज्ञ के लिए। 'व्यापकत्व के लिए तुम दोनों को' क्योंकि यजमान यज्ञ में व्यापक होता है ॥१॥ अब वाणी रोकता है। वाणी यज्ञ है। इस प्रकार यज्ञ को निर्विघ्न पूरा करूँ, यह तात्पर्य है। अब इन दोनों (सूप और हवणी) को आग पर तपाता है यह मंत्र बोलकर (यजु० १।७)— "झुलस गया राक्षस, झुलस गये शत्रु । जल गया राक्षस, जल गये शत्रु" ॥२॥